‘बिन लड़े कुछ भी यहां मिलता नहीं ये जानकर

अब लड़ाई लड़ रहे हैं लोग मेरे गांव के

ले मशालें चल पड़े हैं, लोग मेरे गांव के

अब अंधेरा जीत लेंगे, लोग मेरे गांव के’

बीते गुरुवार की शाम हम दिल्ली के रामलीला मैदान पहुंचे तो देखा कि बल्ली सिंह चीमा के इस मशहूर जनगीत के जरिए हजारों किसानों के मन में उम्मीद की किरण पैदा करने की कोशिश की जा रही है. यह मार्च अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के तहत देश के 200 से अधिक किसान संगठनों की ओर से बुलाया गया था. कई ऐतिहासिक आंदोलनों का गवाह रह चुके इस मैदान को छोड़कर चारों ओर ‘दिल्ली’ रोशनी से जगमगा रही थी. मैदान के सिर्फ एक हिस्से में ही रोशनी थी. वहां, जहां से इस गीत की आवाज आ रही थी. कई लोग यह गीत गा रहे थे और कुछ इस पर थिरक भी रहे थे.

गीताराम ठाकुर (बीच में) के साथ हिमाचल प्रदेश के अन्य किसान
गीताराम ठाकुर (बीच में) के साथ हिमाचल प्रदेश के अन्य किसान

किसानों के इस ‘मुक्ति मार्च’ के दौरान हमारी मुलाकात कई राज्यों से आए किसानों से हुई. इनमें से एक थे हिमाचल प्रदेश के मंडी से आने वाले 36 वर्षीय गीताराम ठाकुर. गीताराम हिंदी से पोस्ट ग्रेजुएट हैं लेकिन, नौकरी न मिलने की वजह से उन्हें खेतों में उतरना पड़ा. उनके मुताबिक उन्होंने बैंकों से कर्ज नहीं लिया है लेकिन, वे किसानों का साथ देने के लिए यहां तक पहुंचे हैं. हालांकि, इसके आगे वे अपनी तकलीफों पर भी आए. गीताराम जिस इलाके से आते हैं, वह हिमाचल प्रदेश के ऊपरी हिस्से में पड़ता है. उनका कहना था, ‘खेती अब फायदेमंद नहीं रह गई. अभी किसानों से सेब 25-30 रुपये खरीदा जाता है. इसी सेब की कीमत बाजार में पहुंचते-पहुंचते 100 रुपये किलो हो जाती है.’

फल-सब्जी के साथ ही गीताराम ने दूध की कीमतें कम होने का भी जिक्र किया. गीताराम ने बताया, ‘दूध की कीमत कम से कम 30 रुपये लीटर होनी चाहिए. लेकिन हमें केवल 12 से 20 रुपये तक मिलते हैं. बाजार में भी दूध 40 से 45 रुपये दुकानदारों के पास बिक जाता है. लेकिन, अपर हिमाचल में होने की वजह से हमें दूध मिल्क फेडरेशन के पास ही बेचना पड़ता है.’ बीते अगस्त में राज्य के किसानों ने दूध की सही कीमत के लिए सड़क पर विरोध प्रदर्शन किया था. गीताराम का कहना है कि 24 दिसंबर को एक बार फिर मिल्क फेडरेशन के खिलाफ सड़क पर उतरने की तैयारी है.

क्या बार-बार विरोध प्रदर्शन करने और खेती-किसानी के मुद्दों पर संसद के विशेष सत्र होने से कृषि संकट खत्म हो जाएगा? इस पर गीताराम का कहना था, ‘पूरी तरह तो खत्म नहीं होगा. लेकिन, थोड़ी बहुत राहत मिल सकती है. कीमत सही मिल जाए और कर्जमाफी हो जाए. यही उम्मीद है. किसान के पास उम्मीद के अलावा है भी क्या!’

देश में आज भी आधे से अधिक किसान खेतों में सिंचाई के लिए आसमान की ओर उम्मीद भरी नजरों से देखते हैं, लेकिन अक्सर उनकी उम्मीद पूरी नहीं होती है. गीताराम को इस बात से परेशानी है कि सरकार ने पानी को नहरों और नदियों से उनके खेतों तक नहीं पहुंचाया है तो बिहार के खेत-मजदूर रामनिवास राम की भी यही शिकायत है.

रामलीला मैदान में रात के 10 बजे किसान
रामलीला मैदान में रात के 10 बजे किसान

बिहार का लेनिनग्राद कहे जाने वाले बेगूसराय के 50 वर्षीय रामनिवास के पास केवल एक बीघा जमीन है. इस पर वे अपने परिवार के लिए कुछ अनाज उपजा लेते हैं. लेकिन बाकी अन्य जरुरतों के लिए उन्हें दूसरों के खेतों में मजदूरी करते हैं. रामनिवास ने बताया, ‘इस साल सूखे की वजह से खेत में एक दाना भी नहीं उपजा है. सिंचाई का सुविधा नहीं है. 6,000 रुपये बैंक से कर्ज लिए थे. उसमें से घर का खर्चा चलाए. कुछ बेटी की शादी में खर्च किए.’

पूरे देश के किसानों के इस जमघट में केवल रामनिवास ही नहीं जिन्होंने कृषि कर्ज का इस्तेमाल अन्य चीजों या जरूरतों पर किया हो. उनसे कुछ ही दूरी पर हमें उत्तर प्रदेश के उन्नाव की मनोरमा अवस्थी मिलीं. उन्होंने भी खेती के नाम पर बैंक से 50,000 रुपये का कर्ज लिया था. लेकिन इससे उन्हें अपनी बेटी की शादी करनी पड़ी. 45 साल की मनोरमा के पास केवल 1.5 बीघा जमीन है और उनके पति प्राइवेट नौकरी करते हैं.

एक ओर किसान सरकार से कर्जमाफी की मांग करते हैं तो दूसरी ओर वे बैंकों से कर्ज लेकर इसका इस्तेमाल खेती में न कर शादी और अन्य चीजों पर कर रहे हैं. क्या यह गलत नहीं है? इस सवाल के जवाब में बिहार के वैशाली में रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता विश्वनाथ राय विप्लवी का कहना था, ‘किसानों को अगर फसल की सही कीमत मिले और हालात अच्छे हो जाएं तो उन्हें कर्ज लेकर बेटियों की शादी करने की जरूरत नहीं होगी. वे ऐसा करते भी हैं तो मजबूरी में करते हैं. उनकी नीयत ऐसी नहीं होती.’

विश्वनाथ राय विप्लवी के साथ वैशाली के अन्य किसान
विश्वनाथ राय विप्लवी के साथ वैशाली के अन्य किसान

इस मार्च के बाद यदि सरकार किसानों की मांगें मान ले तो उन्हें खेती से जुड़ी समस्याओं से मुक्ति मिल जाएगी? इस पर 1984 से इस तरह के आंदोलनों में हिस्सा ले रहे विश्वनाथ ने कहा, ‘नहीं. इसके बाद एक और संघर्ष शुरू होगा. इसे जमीन पर सही तरीके से लागू करने को लेकर. यह मार्च केवल एक हिस्सा है, संघर्ष तो चलता ही रहेगा.’

जब हम विप्लवी से बात कर रहे थे तो उनके साथ बैठे 60 वर्षीय जर्मन सिंह का कहना था, ‘सरकार ने कहा कि 1700 रुपये (प्रति क्विंटल) में धान खरीदा जाएगा, जो गांव में इसे खरीदने के लिए कोई नहीं है. पैक्स (सरकारी खरीद केंद्र) नहीं खुलता है. मजबूरी में 1400-1500 में बाजार में बेचना पड़ता है.’ उनके मुताबिक खेती का यह संकट बेरोजगारी से भी जुड़ता है. जर्मन सिंह ने कहा, ‘खेती हर कोई करना चाहता है लेकिन, अब यह घाटे का सौदा है. अगर खेती की स्थिति सुधर जाए तो बेरोजगारी की स्थिति भी सुधर जाएगी.’ जर्मन सिंह की इस बात से उत्तर प्रदेश के पीलीभीत से आए गुरविंदर सिंह भी सहमत दिखे.

उत्तर प्रदेश के पीलीभीत से आए गुरविंदर सिंह
उत्तर प्रदेश के पीलीभीत से आए गुरविंदर सिंह

गुरविंदर का कहना था, ‘मेरा लड़का खेती नहीं करना चाहता. बोलता है, थोड़ी-बहुत जमीन बेचो और मेरा कहीं जुगाड़ लगाओ. वह किसी और कंट्री में जाकर मजदूरी करने के लिए तैयार है.’ गुरविंदर ने आगे बताया, ‘उसे यहां रहकर मजदूरी करने में शर्म आएगी. यहां लोग कहेंगे कि फलाने का लड़का मजदूरी कर रहा है, इतनी जमीन होने के बाद भी.’ इससे पहले हिमाचल के गीताराम का भी कहना था कि वे नहीं चाहते कि उनका बेटा खेती करे क्योंकि, आने वाले दिनों में स्थिति बिगड़ती हुई ही दिखती है.

खेती की इस बिगड़ती हुई स्थिति के लिए क्या केवल सरकारें जिम्मेदार हैं और इससे मुक्ति के लिए केवल इस तरह का मार्च काफी है? इसके जवाब में हिमाचल प्रदेश में सीपीआई के विधायक राकेश सिंघा ने कहा, ‘मेरी चिंता है कि किसान जब तक पूरी हकीकत नहीं समझ पाएगा, वह खुलकर सामने आकर नहीं लड़ सकता. हमारे देश का किसान अभी सामंती और अर्द्ध-सामंती सोच में फंसा हुआ है, जकड़ा हुआ है. वो सोचता है कि पिछले जन्म के कर्मों का फल भुगत रहा है.’

खेती में किस्मत के इस खेल को खत्म करने और फसलों के नुकसान का मुआवजा देने के लिए मोदी सरकार ने साल 2016 में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की शुरुआत की थी. लेकिन, बीते साल नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट बताती है कि इससे बीमा कंपनियों की ही किस्मत चमकी है. वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ तो इसे रफाल सौदे से भी बड़ा घोटाला बताते हैं.

इस बीमा योजना के बारे में गुरविंदर का कहना था, ‘बैंक किसानों का फसल बीमा बिना पूछे और जबरदस्ती कर देते हैं. इसके बारे में जब मालूम होता है और पूछा जाता है तो जवाब मिलता है कि अगली बार नहीं करेंगे. जिनका बीमा हुआ और फसल का नुकसान भी हुआ है. उन्हें कुछ नहीं मिला.’ गुरविंदर का आगे कहना था, ‘योजनाएं बुरी नहीं हैं, सिस्टम गलत है.’

इस सिस्टम का शिकार सांगली, महाराष्ट्र के राहुल भी हैं. उन्होंने बताया, ‘पिछले साल भी बीमा कराया था और इस साल भी. दोनों बार नुकसान हुआ. लेकिन, पैसा नहीं मिला. सब कुछ केवल कांगज पर लिखा है. मिलता कुछ भी नहीं है. वहीं, राहुल के साथ आए कोल्हापुर के आरएस पाटिल ने फसल बीमा नहीं कराया. क्यों नहीं कराया? यह पूछने पर उनका जवाब मिला, ‘बीमा नहीं करेंगे. बीमा का कुछ नहीं मिलता है. हम देख रहे हैं यूपी, बिहार, पंजाब वालों को. क्या स्थिति है!’

वहीं, जब हमने मोदी सरकार द्वारा साल 2022 तक किसानों की दोगुनी आय करने की बात उठाई तो गुरविंदर का गुस्से भरा जवाब था, ‘आप मेरा मुंह मत खुलवाओ. सरकार की जुमलेबाजी है ये.’ उन्होंने आगे कहा, ‘दोगुनी आय क्या होता है! आज मैं 50 रुपये नुकसान में चल रहा हूं. 2022 में 25 रुपये के नुकसान में हो जाऊंगा. आय दोगुनी करने का क्या मतलब हुआ!’

शुक्रवार को किसान मुक्ति मार्च का हिस्सा बने देश के अलग-अलग कोने से आए हजारों किसानों और नेताओं में से हमने जिनसे भी बात की उन सभी का कहना था कि इस कवायद से उनकी मुश्किलें खत्म हो जाएंगी, ऐसा नहीं है. लेकिन यह केवल इस प्रक्रिया का एक हिस्सा है. और वे उसी उम्मीद की बात करते हैं, जिसका जिक्र शुरुआत में गीताराम ने किया. वहीं, सीपीएम विधायक राकेश सिंघा की मानें तो यह देश में किसानों को लेकर जनमत बनाने की कोशिश है और एक प्रक्रिया का हिस्सा भर है. उनके मुताबिक यह लड़ाई आगे भी चलने वाली है.