यह बात शायद कम ही लोग जानते होंगे कि हॉकी विश्व कप का आईडिया कहीं और से नहीं बल्कि अपने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से निकला था. साल 1969 में पूर्व पाकिस्तानी हॉकी प्लेयर, मार्शल नूर खान (मलिक नूर खान) ने विश्व हॉकी संघ (एफआईएच) के सामने हॉकी के विश्व कप का सुझाव रखा जिसे विश्व हॉकी संघ ने मान लिया. लेकिन विश्व कप से जुड़ी सारी औपचारिकताएं पूरी होने में एक लंबा समय लगा जिसके चलते सुझाव मानने के करीब नौ साल बाद 1978 में पहला हॉकी विश्व कप आयोजित हो सका. स्पेन के बार्सेलोना में हुए इस पहले विश्व कप का विजेता भी पाकिस्तान ही बना. इसके बाद पाकिस्तान ने तीन और विश्व कप जीते और फिलहाल उनकी टीम विश्व हॉकी संघ की सफलतम टीम है.

हॉकी का चौदहवां विश्वकप इस समय भारत में खेला जा रहा है. 28 नवंबर से 16 दिसंबर तक चलने वाले इस टूर्नामेंट के मैच ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में खेले जा रहे हैं. यह तीसरा मौका है जब भारत को हॉकी विश्वकप की मेजबानी करने के मौका मिला है,भुवनेश्वर के पहले 1982 में मुंबई और 2010 में दिल्ली में हॉकी विश्व कप आयोजित किए जा चुके हैं.

बताया जा रहा है कि इस हफ्ते खत्म होने जा रहा यह विश्व कप कई लिहाज से पहले के मुकाबले अलग रहा, जानते हैं वे पांच बातें जो इसे अलग बनाती है:

  1. अब तक हॉकी विश्वकप में 12 टीमें भिड़ती आ रहीं थी, इस बार रोमांच को बढ़ाने के लिए 16 टीमों को मौका दिया गया है. हालांकि ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हुआ है, इसके पहले 2002 में भी टीमों की संख्या बढ़ाई गई थी लेकिन बाद में इस चलन को आगे नहीं बढ़ाया गया. इस बार यह बदलाव फॉर्मेट में किया गया है और इसे आगे भी जारी रखने की बात कही जा रही है. यह और बात है कि इस बार शीर्ष 16 में 2 टीमें यानी दक्षिण कोरिया और जापान ने टूर्नामेंट में शामिल नहीं हुईं.
  2. इस बार विश्व कप में दो ऐसी टीमें भी शामिल हुई हैं जिनमें से एक ने इससे पहले कभी विश्वकप नहीं खेला था और दूसरी करीब तीन दशक बाद इसमें वापसी कर रही है. ये टीमें चीन और फ्रांस हैं. अब तक केवल एशियन गेम्स और एशिया कप में नज़र आने वाली चीन की पुरूष हॉकी टीम पहली बार विश्व कप में शिरकत कर रही है. वहीं, फ्रांस ने करीब 28 साल के लंबे अंतराल के बाद हॉकी विश्व कप में वापसी की है. इसके पहले फ्रांस ने आखिरी बार 1990 में विश्व कप खेला था.
  3. टीमों की संख्या बढ़ने के साथ ही इस बार खेल के नियमों में भी बदलाव किए गए. पहले जहां 6-6 टीमों के दो ग्रुप बनाए जाते थे, वहीं इस बार 4-4 टीमों के चार ग्रुप बनाए गए. दिलचस्प यह है कि हर ग्रुप में अव्वल रहने वाली टीमों को सीधे क्वार्टर फाइनल में जगह मिलेगी जबकि यहां सबसे नीचे वाली टीमें टूर्नामेंट से बाहर हो जाएंगी. फॉर्मेट में हुए इस बदलाव के चलते दर्शकों को क्रॉसओवर मैच देखने को भी मिलेंगे. यानी अंकतालिका में दूसरे और तीसरे नंबर पर रहने वाली टीमें क्वार्टर फाइनल की अंतिम आठ टीमों में जगह बनाने के लिए एक-दूसरे से भिड़ेंगी. इसी के साथ ये विश्व कप चार क्वार्टर फाइनल वाला पहला हॉकी विश्व कप बन जाएगा. कहा जा सकता है कि इस बार हॉकी विश्व कप का कैलेंडर क्रिकेट वर्ल्ड कप की तर्ज पर तैयार किया गया है.
  4. हॉकी जैसे बेहद रोमांचक खेल को बढ़ावा देने के साथ-साथ ये आयोजन अपने सामाजिक दायित्वों को पूरा करने की कोशिश करता भी दिख रहा है. इस बार हॉकी विश्व कप का मैसकट (शुभंकर) कछुओं की लुप्तप्राय प्रजाति ‘ऑलिव रिडली सी टर्टल’ को बनाया गया है जिसे ‘ओली’ नाम दिया गया है. ये कछुए प्रशांत तथा हिंद महासागर में पाए जाते हैं तथा हर साल हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर ओडिशा के तटों पर प्रवास के लिए आते हैं. हॉकी संघ ने इस जीव के प्राकृतिक आवास की रक्षा के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए, इसे चौदहवें विश्व कप का शुभंकर बनाया है.
  5. इन सबसे इतर, इस विश्व कप से कुछ खूबसूरत कहानियां भी जुड़ती हैं जिनमें से सबसे ज्यादा चर्चित कहानी भारतीय खिलाड़ी हार्दिक सिंह की है. हार्दिक पहली बार विश्व कप खेल रहे हैं और उनकी खास बात यह है कि मात्र पांच सालों में उन्होंने बॉल बॉय (क्रिकेट की ही तरह हॉकी ग्राउंड के बाहर खड़े गेंद उठाने वाले लड़के) से भारतीय टीम का सदस्य बनने का सफर तय किया है. उनके टैलेंट को इस बात से भी परखा जा सकता है कि अवसर न मिलने से नाराज होकर उन्होनें देश से बाहर जाकर क्लब हॉकी खेलने की तैयारी कर ली थेी. लेकिन बाद में परिवार वालों के समझाने पर, हजारों डॉलर दिलाने वाला यह मौका छोड़कर उन्होंने देश के लिए खेलना तय किया. महज 19 साल के हार्दिक सिंह टीम में मिडफील्डर की भूमिका निभाते हैं.