(इस समीक्षा में कुछ छोटे-मोटे स्पॉइलर मौजूद हैं, अपनी समझ से आगे बढ़ें और पढ़ें)

नेटफ्लिक्स की डॉक्यू-सीरीज ‘डॉग्स’ का नाम आसानी से ‘डॉग्स एंड ह्यूमन्स’ हो सकता था. छह वृत्तचित्रों को सीरीज की शक्ल देने वाली यह डॉक्यू-सीरीज जितनी इंसानों के जीवन में कुत्तों की अहमियत के बारे में है, देखते-देखते पता चलता है कि उतनी ही कुत्तों के जीवन में इंसानों के होने के बारे में भी है.

काफी लोग मानते हैं कि हजारों सालों की इंसानी सभ्यता में सिर्फ एक जानवर पूर्णत: और स्वेच्छा से मनुष्य का पालतू हुआ है. वो है कुत्ता. आजकल बिल्ली पालने का चलन भी खूब चला हुआ है और महानगरों के माचिस की डिब्बी बराबर घरों में आकार में बड़े कुत्तों की अपेक्षा क्यूट बिल्लियों से दिल लगाना ज्यादा पसंद किया जा रहा है. दिल्ली और मुंबई में से कौन-सा महानगर बेहतर है इस सवाल की तरह ही यह भी समकालीन अर्बन समाज का बहुचर्चित सवाल बन चुका है कि कुत्ता पालना बेहतर है या बिल्ली. आखिर दोनों में से कौन-सा बेहतर ‘पैट’ है!

असल में दोनों ही बेहतर हैं और ये अपने-अपने मिजाज पर निर्भर ज्यादा करता है. लेकिन ऐसा कहा जाता है कि कुत्तों को इंसान पालता है वहीं बिल्लियां इंसान को पालती हैं. कहने का मतलब है कि अगर आपको बिल्ली पालना है तो उसके अनुसार खुद को ढालना पड़ेगा और अगर कुत्ता पालना है तो वो आपके अनुसार रहेगा. शायद इसी से यह वैज्ञानिक तथ्य बेहतर समझ में आता है कि इंसानों द्वारा बिल्ली जैसे जानवरों को पालतू बनाने की लाख कोशिशों के बावजूद पूर्णत: पालतू जानवर आज भी केवल कुत्ता ही है.

नेटफ्लिक्स की हाल ही में रिलीज हुई डॉक्यू-सीरीज ‘डॉग्स’ मानव इतिहास में इंसानों के इसी सबसे पुराने संगी-साथी के बारे में है - वो जो पालतू जानवर से आगे बढ़कर दोस्त/साथी बन चुका है. सीरीज के पहले सीजन की खास बात है कि यह खूबसूरत डॉग्स को केंद्र में रखकर केवल उनकी सुंदर दृश्यावली नहीं रचती, बल्कि इंसानों और इस जानवर के बीच के रिश्तों की मर्मस्पर्शी पड़ताल करती है. अमेरिकी नेटफ्लिक्स सीरीज होने के बावजूद मुख्तलिफ देशों का सफर तय कर हर एपिसोड में उस जगह की भाषा में एक अलहदा यथार्थवादी केस-स्टडी प्रस्तुत करती है जो कि उन फिल्मों व वृत्तचित्रों से अलग हैं जिनमें कि इंसान और कुत्ते के बीच के रिश्ते को रेखांकित होते हुए हमने देखा है.

एक तरफ तो ‘ऐट बिलो’ (2006), ‘हची : अ डॉग्स टेल’ (2009) और वेस एंडरसन की ‘आइल ऑफ डॉग्स’ (2018) जैसे आलातरीन फीचर फिल्में दिल में हमेशा के लिए जगह बना चुकी हैं. दूसरी तरफ बीबीसी की ‘आइसबाउंड’ (2014), ‘सीक्रेट लाइफ ऑफ डॉग्स’ (2013), ‘पैट फूल्ड’ (2016), एचबीओ की ‘वॉर डॉग’ (2017), चीन में होने वाले खौफनाक डॉग मीट फेस्टिवल के पीछे की घिनौनी सच्चाई सामने लाने वाली बेहद डिस्टर्बिंग ‘द रोड टू यूलिन एंड बियॉन्ड’ (2017) और नेटफ्लिक्स की ही ‘अ मैन एंड हिज डॉग्स’ (2008) जैसी डॉक्यूमेंट्रीज हमें कुत्तों से जुड़ी अच्छी-बुरी दोनों तरह की दुनिया से मिलवा चुकी हैं. वहीं ताजातरीन डॉक्यू-सीरीज ‘डॉग्स’ (2018), जो हम अब तक सिनेमा में देख और अनुभव कर चुके हैं उनसे अलग तरह के अनुभव खुद में समेट कर बेहतरीन बनती है.

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‘डॉग्स’ के एक एपिसोड में सीरियाई गृह युद्ध का जिक्र होता है. एपिसोड असल में सीरिया में फंसे एक कुत्ते के बारे में है जिसे उसका मालिक – जो कि शरणार्थी बनकर अब जर्मनी में रह रहा है – किसी भी हाल में अपने बदहाल जन्म-स्थान से अजनबी बर्लिन लेकर आना चाहता है. किसी थ्रिलर की तरह 52 मिनट की यह डॉक्यूमेंट्री आगे बढती है और अविश्वसनीय-सी लगने वाली कहानी को बड़ी विश्वसनीयता से कहती है.

यह कहानी इतनी अविश्वसनीय है कि जहां से इंसान गैरकानूनी तरीके से बॉर्डर पार कर अपनी जान नहीं बचा पाता उस सीरिया से एक कुत्ते को गैरकानूनी तरीके से ही जिंदा निकलवाना है. लेकिन जैसे-जैसे एपिसोड आगे बढ़ता है आपको समझ आता है कि यह डॉक्यूमेंट्री यही तो दिखाना चाहती है कि इंसान और जानवर की जान के बीच फर्क नहीं करने वाले भी कई लोग पृथ्वी पर मौजूद हैं. इस असंभव काम में इस कहानी के मुख्य पात्र के कई दोस्त साथ देते हैं और ‘एनीमल सीरिया’ नामक एक गैर सरकारी संस्था भी अहम रोल अदा करती है जिसका कि गठन ही सीरियाई युद्ध से जानवरों को बचाना और उन्हें रेस्क्यू करना है.

मुख्य पात्र के जो सभी दोस्त इस कुत्ते को बर्लिन पहुंचाने के लिए भरसक प्रयास करते हैं वे खुद भी सीरिया से निकलना चाहते हैं और उनकी मार्मिक जिंदगियां भी यह एपिसोड खूब टटोलता है. वीडियो कॉल के जरिए कई बार ये दोस्त जर्मनी में मौजूद मुख्य पात्र से बात करते वक्त मजाक-मजाक में कहते हैं कि काश वे कुत्ता होते, ताकि उनका सीरिया से बाहर निकलना आसान हो जाता. लेकिन देखने वाले के लिए यह मजाक झेलना आसान नहीं होता, और एक प्यारे व सुंदर से कुत्ते के रेस्क्यू की अविश्वसनीय कहानी देखकर हम जितना खुश होते हैं उतना ही उदास सीरियाई युद्ध की विभीषिका का त्रासद चित्रण कर देता है.

एक दूसरा एपिसोड ऐसा है कि एक के बाद एक निहायत खूबसूरत डॉग्स को देखकर आप लगातार प्रसन्नचित रह सकते हैं! मगर बावजूद इस खूबसूरती के, यह एपिसोड अमेरिका के उन ‘सर्विस डॉग्स’ को समर्पित है जो कि गंभीर बीमारियों से जूझ रहे बच्चों की आखिरी उम्मीद बनते हैं. हमारे यहां तो स्वास्थ्य सेवाओं का हाल बेहाल है इसलिए इस तरह की कोशिशों की कोई कोशिश ही नहीं करता और मिर्गी का दौरा पड़ने जैसी गंभीर बीमारी तक को हल्के में लेकर उसके आसपास मजाक रच दिया जाता है –‘अरे, इसे बदबूदार जुराबें सुंघा दो.’ अमेरिका में सर्विस डॉग्स की एक पूरी पेशेवर इंडस्ट्री कार्यरत है जिसमें मरीजों की मदद के लिए खास तरह के डॉग्स ब्रीड किए जाते हैं और उन्हें ट्रेनिंग देकर इंसानों का हर वक्त का सहायक बनाया जाता है.

52 मिनट की यह डॉक्यूमेंट्री मिर्गी के दौरे पड़ने से बेहद परेशान एक बच्ची और उसके परिवार की पहले व्यथा-कथा और फिर उम्मीद-कथा दिखाती है. कैसे यह परिवार इस बीमारी से जूझ रहा है, कैसे एक सर्विस डॉग का पता चलने पर उनकी उम्मीदों की बंद खिड़की दोबारा खुल जाती है, कैसे सर्विस डॉग्स को ट्रेनिंग देकर मरीजों का साथी बनाया जाता है, कैसे कई सारे पेशेवर लोग मिलकर अमेरिका में यह सुविधा मुहैया कराते हैं और आखिर कैसे एक कुत्ता मिर्गी के दौरों को पहचानना सीखता है. वो उन्हें देखकर समझता है या बीमारियों को उनकी गंध से पहचानता है? यह सबकुछ और बहुत कुछ और ‘द किड विद अ डॉग’ नामक एपिसोड आपको लगातार भावुक करते हुए दिखाता है.

तीसरा एपिसोड एक बुजुर्ग हो रहे मछुआरे और उसके उम्रदराज होते लैब्राडोर रिट्रीवर की कहानी है. रिट्रीवर कुत्तों की खासियत होती है कि वे चीजों को ढूंढ़कर (रिट्रीव) लाने में उस्ताद होते हैं. आइस नामक यह रिट्रीवर भी अपने मालिक के साथ झील में मछलियां पकड़ने जाता है और हरदम पैनी निगाह बर्फ से ठंडे पानी और मछलियों पर रखता है. उदास आंखों और हरदम शून्य में निहारने वाले इस प्यारे कुत्ते का नाम आइस इसलिए है कि उसे बर्फ में लोटना और खेलना बहुत पसंद है!

एक बार फिर यह सीरीज 57 वर्षीय बुजुर्ग होते आदमी और 10 वर्षीय कुत्ते की दोस्ती के बहाने एक मछुआरे व रेस्टोरेंट मालिक की निजी जिंदगी और उसके संघर्षों में झांकती है, और जिस जगह वह रहता है वहां की समस्याओं को मारक अंदाज में नरेटिव का हिस्सा बनाती है. इस सीरीज में कहीं भी ऐसा नहीं होता कि कुत्तों का प्यार दिखाने की अति करते-करते इंसानों की कठिन जिंदगियों को पीछे छोड़ दिया गया हो और जैसा कि इस प्यारे जानवर से जुड़ा हुआ सदाबहार इमोशन है – पलायनवाद – वैसा भाव अपनी किसी कहानी में आने दिया गया हो. हर कहानी बेहद रूटिड और यथार्थवादी बनी रहती है.

यह बताते चलें कि 50 मिनट के इस एपिसोड का मछुआरा और उसका रिट्रीवर आइस जिस ठंडी जगह पर रहते हैं वह जगह इटली की लेक कोमो के किनारे बसी है. यह वही लेक कोमो है जिसके किनारे बने एक विला में हाल ही में दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह की शादी हुई थी और हमें सभी खबरिया चैनलों और अखबारों ने बताया था कि धरती पर स्वर्ग कहीं है तो वहीं है. वो भी सबसे महंगा वाला स्वर्ग! उसी सो-कॉल्ड स्वर्ग में जब आप एक मछुआरे को जीवन में संघर्ष करते हुए देखते हैं और सदैव चिंता में पाते हैं कि झील में कम होती जा रहीं मछलियों की वजह से उसका रेस्टोरेंट संकट में पड़ सकता है, तो हंसी आती है. खुद पर, कि हम इन पट-पट करने वाले पटरिया न्यूज चैनलों को आखिर क्यों देखते हैं!

‘डॉग्स’ के पहले सीजन के आधे एपिसोड अगर इंसानों की दुनिया को बेहतर बनाने वाले कुत्तों की कहानियां कहते हैं तो बाकी तीन कुत्तों की दुनिया को बेहतर बनाने में जुटे इंसानों की कहानी बयां करते हैं. 50 मिनट के एक एपिसोड में जापान में कुत्तों के बाल काटकर उन्हें अलहदा रूप देने वाले दो ग्रूमर अमेरिका जाते हैं और ‘ग्रूम एक्पो वेस्ट’ नामक एक प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में हिस्सा लेते हैं. यहां दुनिया भर से कुत्तों के बाल काटने वाले शामिल होते हैं और जो भी कुत्तों को अच्छा और नायाब ‘हेयर कट’ देता है उन्हें सम्मानित किया जाता है.

इस एपिसोड में जापानी संस्कृति पर भी गहरे उतरकर बात की जाती है और उस नए चलन को रेखांकित किया जाता है जिसमें कि नयी पीढ़ी की कामकाजी जापानी महिलाएं शादी और बच्चों को अपने जीवन में शामिल न कर कुत्तों को ही अपने जीवन की धुरी बना रही हैं. बेहद दिलचस्प और एक नयी ही दुनिया से परिचित कराने वाली डॉक्यूमेंट्री!

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इन सारे एपीसोड्स से दिल लगाते वक्त बीच-बीच में एक सवाल दिमाग में आते चलता है. यथार्थवादी होने का दावा करने वाली यह सीरीज क्या केवल खूबसूरत व मनमोहक डॉग्स पर ही खुद को केंद्रित रखेगी या फिर सड़कों पर जीने को मजबूर कम खूबसूरत स्ट्रे डॉग्स की तरफ भी अपना कैमरा घूमाएगी? इस सवाल का जवाब आखिरी के दो एपिसोड में मिलता है और उन्हीं में एक इस सीरीज की सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री भी बनती है.

49 मिनट की डॉक्यूमेंट्री ‘सेकेंड चांसेस’ न्यूयॉर्क में घटती है जहां वो बेसहारा कुत्तों को दोबारा गोद लेने के एक पूरे नए चलन को कैप्चर करती है. जैसा कि एक पात्र इस एपिसोड के शुरुआत में बताता है कि ठुकराए गए आवारा व दुर्घटनाग्रस्त कुत्तों को गोद लेना न्यूयॉर्क शहर का एक पूरा ‘सब-कल्चर’ है.

यह डॉक्यूमेंट्री उसी कल्चर को प्रोसिजरल जॉनर के अंदाज में गहरे उतरकर एक्सप्लोर करती है. आपको सिलसिलेवार पता चलता है कि कुछ जुनूनी लड़के-लड़कियां अपने निजी प्रयासों से स्ट्रे डॉग्स को शेल्टर से लेकर आते हैं – जहां वे पिंजड़ों में कैद होने को मजबूर हैं - और इंटरनेट की मदद से उन्हें नए घर व मालिक के पास पहुंचाने के प्रयास करते हैं. नया घर मिलने की प्रकिया में जब वक्त लगता है तब कुछ युवा स्वेच्छा से इन कुत्तों को अपने पास रखते हैं और उनके फॉस्टर पैरेंट्स बनते हैं.

कुत्तों को पसंद करने वाले कैफे में रेस्क्यू करने वाले, फॉस्टर करने वाले और कुत्तों को गोद लेने की चाहत रखने वाले अमेरिकी मिलते हैं और हंसी-ठिठोली के बीच इन सभी का एक मकसद होता है – इंसान के सबसे पुराने दोस्त को बुरे माहौल से निकालकर एक नया घर नयी जिंदगी देना. यह एपिसोड आपको बताएगा कि कुत्तों को पालना केवल खूबसूरती के आधार पर नहीं, वाकई में प्यार के आधार पर लिया गया फैसला होना चाहिए.

स्ट्रे डॉग्स की इसी थीम को गहरे उतरकर इससे पहले वाला एपिसोड भी एक्सप्लोर करता है. यह मध्य अमेरिकी देश कोस्टी रीका के 300 एकड़ में फैले एक डॉग शेल्टर की कहानी कहता है जहां का मालिक अपनी हैसियत से बहुत ज्यादा, तकरीबन 1200 स्ट्रे डॉग्स का जीवन सुधारने की कोशिश कर रहा है. 52 मिनट लंबा यह पांचवां एपिसोड इस सीरीज का सर्वश्रेष्ठ एपिसोड है, क्योंकि एक तो यह आपको भारत के लाखों आवारा व बेसहारा कुत्तों की याद दिलाता है, और दूसरा कि ये डॉग्स से जुड़े खूबसूरती के पलायनवाद को एक तरफ रखकर बड़े ही हार्ड-हिटिंग अंदाज में इंसानी स्वार्थ के उदाहरण पेश करता है.

लेकिन फिर, इन कुत्तों की निस्वार्थ भाव से सेवा करने वाले इंसानों से मिलवाकर खुद ही बताता भी है कि इंसान और कुत्ते की दोस्ती एक-तरफा कभी होती ही नहीं है. अगर कुत्तों ने इंसान को निस्वार्थ भाव से बेइंतिहा प्यार किया है तो इंसान भी उस प्यार को लौटाने में कभी पीछे नहीं रहा है.

इसीलिए तो, यह दो-तरफा प्रेम-कहानी कई हजार सालों से अमर है! कई हजार सालों बाद भी अमर रहेगी!

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