बीती 30 नवंबर को देश भर के हजारों किसानों ने संसद का घेराव करने के लिए दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान से विशाल मार्च निकाला था. इसे ‘किसान मुक्ति मार्च’ नाम दिया गया. इनमें 200 से अधिक किसान संगठनों ने हिस्सा लिया था. इससे एक दिन पहले ये किसान रामलीला मैदान में इकट्ठे हुए थे. देश में कृषि संकट की स्थिति के बीच इन किसानों ने कर्जमाफी और स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की मांग की. साथ ही, इन सभी ने अपने लिए पेंशन की भी बात उठाई. बीते कुछ समय से किसान इन मुद्दों को लगातार उठाते रहे हैं.
लेकिन इस सबके बीच हैरानी की बात यह भी है कि इनके अलावा भी कई मुद्दे हैं जो किसानों को परेशान करते हैं, लेकिन वे बहस के केंद्र से गायब रहते हैं. सत्याग्रह ने किसान मुक्ति मार्च के लिए दिल्ली आए कई किसानों से बात की. इससे यह निकलकर आया कि उन्हें बहुत ही दूसरी दिक्कतें भी परेशान करती हैं. मसलन सरकारी खरीद केंद्रों पर फसल की खरीद न होना, सिंचाई की सुविधा का अभाव, खराब गुणवत्ता वाले बीज की वजह से फसल का नुकसान आदि. उत्तर प्रदेश के कई लोगों ने छुट्टा जानवरों से होने वाली परेशानी का भी जिक्र किया. वहीं, खेत-मजदूरों और और बंटाइदारों की समस्याओं पर करीब-करीब सन्नाटा ही पसरा रहा.
सरकारी फसल खरीद केंद्रों का बुरा हाल
केंद्र सरकार ने इस साल धान का एमएसपी 1750 रुपये प्रति क्विटंल तय किया है. इससे पहले बीते साल यह 1550 रुपये था. हालांकि, इस बढ़ोतरी के बाद भी किसानों को इसका फायदा नहीं मिल रहा. इस बारे में जब हमने किसानों से बात की तो उनमें से अधिकांश ने इन केंद्रों के बंद होने की बात कही. साथ ही, कइयों ने कहा कि इन केंद्रों में कई बार अनाज में कई कमियां बताकर फसल खऱीदने से इनकार कर दिया जाता है.
उत्तर प्रदेश के पीलीभीत से आए किसान गुरविंदर सिंह सिंह का कहना था, ‘मैं धान लेकर केंद्र गया तो मुझे बताया गया कि इसमें नमी है. इसकी क्वालिटी ठीक नहीं है. यदि बिक जाए तो भी पैसे तुरंत नहीं मिलते.’ उनका आगे कहना था कि बाजार में व्यापारी हाथोंहाथ पैसे दे देते हैं. अपनी जरूरतों को देखते हुए किसानों को अपनी फसल कम कीमत में भी उन्हें बेचनी पड़ती है. गुरविंदर ने खुद अपनी फसल को बाजार में 1400 रुपये प्रति क्विंटल की दर से बेचा था.
वहीं, बिहार के जर्मन सिंह ने भी सरकारी खरीद केंद्रों और व्यापारियों के बीच सांठ-गांठ की बात कही. उनका कहना था, ‘दोनों मिले होते हैं. फसलों की सरकारी खरीद नहीं होती. किसानों को मजबूरी में कारोबारियों के पास जाना होता है. और फिर कारोबारी इन केंद्रों में अनाज बेच देते हैं. किसानों की मेहनत पर ये लोग मुनाफा कमाते हैं.’ दूसरी ओर, छत्तीसगढ़ के चांपा की नानवे बंजारे ने बताया, ‘अमीर आदमी का मंडी है. पर्ची के बिना मंडी में धान नहीं बिकता. पंजीकरण और नवीनीकरण (जमीन के कागजात का) होने पर मंडी में धान बिकता है. व्यापारी लोग गांव-गांव से धान खरीदकर मंडी में बेचते हैं.’
इन सभी बातों को देखते हुए माना जा सकता है कि यदि सरकार एमएसपी पर किसानों की मांग मान भी लेती है तो इसका फायदा किसानों को ही मिलेगा, यह तय नहीं दिखता.

कर्जमाफी : वक्त पर कर्ज चुकाने वाले और बंटाईदारों को फायदा नहीं
अभी देश में कृषि संकट को लेकर जो चर्चा चल रही है उनमें कर्जमाफी को रामबाण माना जा रहा है. कई किसान नेता और विपक्षी पार्टियों के नेताओं का भी जोर इस पर ही है. वहीं, महाराष्ट्र के कोल्हापुर के रहने वाले गन्ना किसान आरएस पाटील इससे अलग अपनी बात रखते हैं. रामलीला मैदान से संसद की ओर जाते वक्त मोदी सरकार के खिलाफ लग रहे नारों के बीच उन्होंने बताया, ‘एक एकड़ पर एक लाख रुपये कर्ज मिलना चाहिए. लेकिन 40 हजार ही मिलता है. दो लाख रुपये कर्ज लिए हैं. समय-समय पर चुकाते रहते हैं इसलिए कर्जमाफी का फायदा हमें नहीं मिलता. जो नहीं चुकाता है, उनको मिलता है.’
आरएस पाटील का आगे कहना था, ‘जो कर्ज वापिस नहीं करते उनके नाम के आगे भी किसान जुड़ा हुआ है. वे खेती के नाम पर कर्ज लेते हैं. और पैसा दूसरे धंधों में लगा देते हैं. वे खेती नहीं करते.’ उन्होंने कर्जमाफी को लेकर अपनी बातों को जिन शब्दों के साथ खत्म किया, वे कम ही सुनाई देती हैं. पाटील का कहना था, ‘सरकार को देखना चाहिए कि कौन किसान, खेत में पैसा डाल रहा है. जो खेत में है, उसे लाभ मिलना चाहिए कर्ज माफी का.’
वहीं, केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा की गई कर्जमाफी के फायदे से किसानों का बड़ा तबका अछूता ही रहता है. इनमें अधिकांश बंटाईदार होते हैं. ये लोग दूसरी की जमीन लेकर खेती करते हैं. लेकिन, इन्हें खेती के लिए न तो कृषि कर्ज न ही मिलता है और न ही फसल बीमा या डीजल सब्सिडी जैसी अन्य सुविधाएं. इसके अलावा जमीन के जरूरी कागजात न होने की वजह से ये सरकारी खरीद केंद्रों पर अपने अनाज की बिक्री भी नहीं कर पाते.
बिहार के वैशाली के सामाजिक कार्यकर्ता विश्वनाथ राय विप्लवी का बंटाईदारों की इस समस्या को लेकर कहना था, ‘सूबे में इसकी मांग लंबे वक्त से की जारी है कि बंटाईदारों को जमीन के कागजात के अभाव में किसान होने का सर्टिफिकेट जारी किया जाए. लेकिन, अब तक इस पर ध्यान नहीं दिया गया है.’

सिंचाई का सुविधा का अभाव
देश में कुल कृषि क्षेत्र का केवल एक तिहाई हिस्सा ही अब तक सिंचित क्षेत्र के दायरे में आता है. इसके अलावा बाकी के दो-तिहाई के लिए किसानों को आसमान की ओर ही नजरें टिकाए रहना होता है. इस साल भी बिहार, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ सहित कई अन्य राज्यों के किसानों को सूखे की स्थिति का सामना करना पड़ा. इसकी वजह से इस साल भी खेतों से घर तक अनाज लाने की उनकी उम्मीद को बड़ा झटका लगा.
बिहार के बेगूसराय के रामनिवास राम ने हमें बताया, ‘इस बार धान लगाए थे खेत में. लेकिन सूखाड़ में कुछ भी नहीं हुआ. वर्षा से न होता है धान. खेत में सिंचाई का सुविधा नहीं है. बोरिंग भी नहीं है.’
यह समस्या केवल रामनिवास की नहीं है. हिमाचल प्रदेश से लेकर उत्तर प्रदेश और बिहार तक हमने जिन राज्यों के किसानों से बात की उन सभी का कहना है कि नहर में पानी होने के बाद भी इसे खेतों तक पहुंचाने की कोई व्यवस्था नहीं है. इसकी वजह से सूखे की स्थिति पैदा होने पर सिंचाई पर लागत बढ़ जाती है या फिर अनाज ही पैदा नहीं होता.

मोदी सरकार ने फसल नुकसान का मुआवजा देने के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की शुरुआत की थी. लेकिन, किसानों की मानें तो उनके बैंक खाते से प्रीमियम कटने के बाद भी उन्हें इसका फायदा नहीं मिल रहा है. वहीं, नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) रिपोर्ट की मानें तो इस योजना से बीमा कंपनियों के दोनों हाथ घी में दिखाई दे रहे हैं. किसान और बाकी जनता की जेब से पैसा जा रहा है, लेकिन किसानों के एक बड़े हिस्से के दावों का निपटारा नहीं हो रहा है.
खराब बीज
बहुराष्ट्रीय सहित अन्य देसी कंपनियों के हाइब्रिड बीज की गुणवत्ता भी किसानों के लिए मुसीबत का सबब बन रही है. किसानों को इन बीजों से उत्पादन अधिक होने की उम्मीद तो रहती है. हालांकि, इनसे उत्पादन के लिए सिंचाई, रख-रखाव और कीट-खरपतवारनाशक दवाओं पर खर्च भी अधिक करना पड़ता है. इससे खेती की लागत कई गुना बढ़ जाती है. ऐसी स्थिति में यदि खराब बीज से फसल न हो तो किसान की कमर ही टूट जाती है. देश में कपास उगाने वाले किसानों की खुदकुशी के पीछे इन बीजों को एक बड़ी वजह के रूप में देखा जाता है. हालांकि, अब इन वजहों से खाद्यान्न की खेती करने वाले किसान भी मुसीबत में पड़ते हुए दिख रहे हैं.
बिहार के वैशाली में रहने वाले विश्वेश्वर सिंह बताते हैं कि इस साल ही उनके पड़ोस के गांव में तीन गन्ना किसानों ने खुदकुशी की थी. उनका कहना था कि उन किसानों ने मक्के की खेती की थी लेकिन, एक भी दाना नहीं आया. इससे उनकी सारी मेहनत और लागत चौपट हो गई. हालिया वर्षों में बिहार में मक्के की खेती के रकबे में काफी बढ़ोतरी हुई है. साथ ही, किसान मुनाफे को देखते हुए अन्य फसलों की तुलना में मक्का को वरीयता देने लगे हैं.
छुट्टे मवेशी
जब हम रामलीला मैदान में किसानों की समस्याओं पर बात कर रहे थे, उसी बीच उन्नाव की 45 वर्षीय खेतिहर-महिला मजदूर श्रीमती ने कहा, ‘भैय्याजी, ई जो बूढ़ी गाय हम पाले हैं, उसके लिए कुछ नहीं मिलेगा. योगीजी (मुख्यमंत्री आदित्यनाथ) कहे थे कि इनको पालने के लिए चारा और सब सुविधा देंगे. लेकिन हमको कुछ भी नहीं मिला. अब दिक्कत है कि खुद का पेट पालें कि इनका.’ उनका आगे कहना था, ‘इनकी सेवा में घर का एक आदमी लगा रहता है. अब खेत में खुला कैसे छोड़ दें. खेतवाला सब लाठी-भाला मारता है.’
वहीं, किसानों की समस्या भी छुट्टा जानवरों से बढ़ती हुई दिखती है. उन्हें दिन-रात खेत में पहरा देना होता है. साथ ही, कई किसानों को खेतों की घेराबंदी करने में भी अतिरिक्त पैसे खर्च करने पड़े हैं. श्रीमती की मानें तो पिछले एक साल में छुट्टा जानवरों की समस्या काफी बढ़ गई है.
बीते साल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने छुट्टा गोवंश के लिए प्रत्येक जिले में गोशाला खोलने का ऐलान किया था. साथ ही, उन्होंने इनकी रक्षा और पालन-पोषण के लिए गो संरक्षण समितियां बनाने की भी बात कही थी. आदित्यनाथ का कहना था, ‘गोवंश मानवजाति के लिए किसी वरदान से कम नहीं है. जब हम दूध के लिए गोवंश पर आश्रित हैं, तो हमें उनकी रक्षा भी करनी होगी.’ लेकिन साफ है कि कवायद एक बड़ी हद तक जबानी जमाखर्च तक ही सीमित रह गई है.
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