2018 में कैलिफ़ोर्निया से लेकर केरल तक और जापान से लेकर टोंगा तक जलवायु परिवर्तन का हमने एक असाधारण रौद्ररूप देखा. कम से कम अब तो किसी के भी मन में यह शक-संदेह नहीं रह जाना चाहिये कि इस अनिष्टकारी परिवर्तन की यदि समय रहते रोकथाम नहीं हुई तो आगे इस रोकथाम के लिए कोई समय शेष नहीं बचेगा. इसी आशंका से 2015 में पेरिस में हुए 197 देशों के शिखर सम्मेलन में तय हुआ था कि 21वीं सदी का अंत आने तक औसत वैश्विक तापमान, 18वीं सदी के मध्य के औसत तापमान की अपेक्षा, दो डिग्री सेल्सियस से अधिक नहीं बढ़ना चाहिये.

पेरिस समझौते के तीन ही वर्ष बाद वैज्ञानिक कह रहे हैं कि औसत वैश्विक तापमान, 18वीं सदी के मध्य की अपेक्षा पहले ही 1.3 डिग्री बढ़ कर क़रीब 15 डिग्री सेल्सियस हो गया है. इसलिए अब उसे दो नहीं, डेढ़ डिग्री से भी पहले ही रोकना होगा. दूसरे शब्दों में इसका अर्थ यह हुआ कि 21वीं सदी का अंत आने तक वैश्विक औसत तापमान को 0.5 डिग्री से अधिक ऩहीं बढ़ने दिया जा सकता. लेकिन अब तक की प्रगति इतनी धीमी और अपर्याप्त है कि दो डिग्री लक्ष्य वाले पेरिस समझौते का पालन करने के प्रयासों को भी वैज्ञानिक ‘तीन गुना बढ़ा देने’ की जरूरत बता रहे हैं.

तापमान- वृद्धि की दर तेज़ होती जा रही है

तीन गुना प्रयास इसलिए, क्योंकि इस समय तापमान हर दस वर्ष पर 0.17 डिग्री की दर से बढ़ रहा है. यदि यही दर बनी रही, तब भी सदी का अंत आने तक औसत तापमान कम से कम 1.36 डिग्री बढ़ चुका होगा. वैज्ञानिक कह रहे हैं कि औसत तापमान में वृद्धि की दर वास्तव और भी तेज़ होती जा रही है. बढ़ोतरी की इस दर को यदि अभी ही नहीं रोका गया तो आशंका है कि 21वीं सदी का अंत आने तक औसत तापमान, 18वीं सदी के मध्य की अपेक्षा, तीन से पांच डिग्री तक भी बढ़ जाए. वह स्थिति पृथ्वी पर त्राहि-त्राहि मचा देने वाले किसी प्रलयकाल से कम नहीं होगी.

हिसाब लगाया गया है कि इस स्थिति से बचने के लिए कार्बन-डाईऑक्साइड के उत्सर्जन में कटौती की वर्तमान वार्षिक मात्रा को ‘पांच गुना’ बढ़ा देना होगा. ऐसा तभी संभव है जब तेल, प्राकृतिक गैस और मुख्य रूप से कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल को जल्द से जल्द रोका जा सके. एक अनुमान के अनुसार, कोयला जला कर बिजली बनाने वाले विश्व के सभी तापबिजलीघर यदि तुरंत बंद किये जा सकें तो यह लक्ष्य़ जल्द ही प्राप्त किया जा सकता है. हालांकि इससे बिजली का अकाल पड़ जायेगा.

लक्ष्य-प्राप्ति की नियमावली बनानी है

वैज्ञानिकों की इसी गुहार को देखते हुए कातोवित्स में हो रहे संयुक्त राष्ट्र के ‘सीओपी24’ सम्मेलन के अध्यक्ष और पोलैंड के पर्यावरण मंत्री मिशाल कुर्त्यीका ने कहा, ‘कातोवित्स नहीं, तो पेरिस भी नहीं.’ उनके कहने का तात्पर्य यही था कि यदि कातोवित्स सम्मेलन सफल नहीं हुआ, तो तीन वर्ष पू्र्व का पेरिस समझौता भी निरर्थक सिद्ध होगा. पेरिस समझौते में विश्व के शीर्ष नेताओं ने जो लक्ष्य तय किये थे, कातोवित्स सम्मेलन को उन लक्ष्यों तक पहुंचने की ‘नियमावली’ बनानी है. पोलैंड के राष्ट्रपति दूदा और संयुक्त राष्ट्र महासचिव गुटेरेस ने सोमवार तीन दिसंबर को इस सम्मेलन का उद्घाटन किया.

सम्मेलन में भाग ले रहे 197 देशों के प्रतिनिधियों को दो सप्ताहों के भीतर एक ऐसी नियम-पुस्तिका (रूल-बुक) तैयार करनी है, जिसमें पेरिस समझौते की मांगें पूरी करने के तौर-तरीके और नियम लिखे होंगे. उदाहरण के लिए, उसमें लिखा होगा कि तापमानवर्धक गैसें कौन-कौन सी हैं. उन्हें कैसे मापा जाना चाहिये और मापने की एकसमान इकाई क्या होगी. इस समय सभी देश एक ही मापन-प्रणाली और एक ही इकाई का प्रयोग नहीं करते. उनकी अपनी-अपनी राष्ट्रीय परंपराएं और विशेषताएं हैं. इससे उनके बताए आंकड़ों के बीच तुलना करने में भारी कठिनाई होती है.

लक्ष्यों की जांच-परख और कसौटियां

ऐसे भी नियम होंगे जो बतायेंगे कि जलवायु परिवर्तन की रोकथाम के अंतरराष्ट्रीय सहयोगों का स्वरुप कैसा होना चाहिये. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रयासों को पारदर्शी और उत्तरदायित्वों को न्यायसंगत कैसे बनाया जा सकता है. तापमानवर्धक गैसों का उत्सर्जन घटाने के बारे में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय लक्ष्यों की जांच-परख और उनकी समीक्षा की क्या कसौटियां होंगी.

तकनीकी प्रश्नों के साथ-साथ कातोवित्स सम्मेलन को कुछ वित्तीय चुनौतियों पर भी विचार करना है. एक है, 2001 के क्योतो समझौते पर के हस्ताक्षरकर्ता विकाससशील देशों के लिए बने ‘अनुकूलन कोष’ (एडैप्टेशन फंड) का लेखाजोखा कैसे रखा जाये. इस बारे में 300 पन्नों की मोटी एक रिपोर्ट उनके सामने होगी जिसके आधार पर उन्हें किसी निर्णय पर पहुंचना होगा.

दूसरा यह है कि तापमानवर्धक गैसों के उत्सर्जन को घटाने के लिए विकाकशील देशों को बढ़ावा देने का जो महत्वाकांक्षी लक्ष्य है, उसके लिए पैसा कैसे जुटाया जाये. इस बारे में पिछले अक्टूबर महीने में इथियोपिया की राजधानी अदिस अबाबा में हुई वार्ताओं में कहा गया कि बहुत से विकासशील देश अपने यहां ग़रीबी के उन्मूलन और साथ ही कार्बन-डाईऑक्साइड जैसी गैसों के उत्सर्जन को घटाने की दोहरी लड़ाई लड़ने के समर्थ नहीं हैं.

औद्योगिक देशों का अधूरा वादा

भारत, ब्राज़ील, चीन और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश ही नहीं, बहुत से पश्चिमी विशेषज्ञ भी कह रहे हैं कि विकसित औद्योगिक देशों ने विकासशील देशों की सहायता के लिए 2020 से हर वर्ष 100 अरब डॉलर देने का जो वादा किया है, उसे वे पूरा करते नहीं दिख रहे हैं. 2016 तक औद्योगिक देशों ने इस कोष के लिए केवल 55 अरब डॉलर दिये थे. कुछ निजी योगदानों के साथ यह धनराशि 70 अरब ड़ालर तक पहुंच पाई है.

100 अरब डॉलर का वादा भी केवल 2025 तक के लिए ही है. उसके बाद क्या होगा, इस बारे में वार्ताएं गतिरोध का शिकार बन गयी हैं. इसी तरह, हवा में कार्बन-डाईऑक्साइड की मात्रा घटाने के संयुक्त राष्ट्र ‘ग्रीन क्लाइमेट फंड’ के लिए भी अभी तक केवल 16 अरब 30 करोड़ डॉलर के वादे किये गये हैं और केवल चार अरब 60 करोड़ डॉलर ही इस कोष में पहुंचे हैं. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ‘ग्रीन क्लाइमेट फंड’ के लिए तीन अरब ड़ालर देने का वादा किया था. एक अरब डॉलर उन्होंने दिए भी थे. लेकिन उनके बाद आये डोनाल्ड ट्रंप ने इस कोष के लिए कुछ भी देने से मना कर दिया है.

राजनीति की दिशा-दशा अनुकूल नहीं

2015 के पेरिस शिखर सम्मेलन के बाद से दिख रही वैश्विक राजनीति की दिशा-दशा भी बहुत अनुकूल नहीं कही जा सकती. अमेरिका ने पेरिस समझौते से मुंह मोड़ लिया है और अब ब्राज़ील के नये राष्ट्रपति जाइर बोल्सेनारो भी डोनाल्ड ट्रंप के पदचिन्हों पर चलने के संकेत दे रहे हैं. सुनने में आया है कि कुछ दूसरे देश भी पेरिस समझौते को तिलांजलि देने की सोच रहे हैं. हो सकता है कि ऐसी कोई घोषणा कातोवित्स सम्मेलन के समय सुनाई भी पड़े.

दूसरी ओर, तापमानवर्धक गैसों का उत्सर्जन, तीन वर्षों तक स्थिर रहने के बाद, 2017 से पुनः बढ़ने लगा है. यूरोपीय संघ वैसे तो अपनी उदारता और प्रगतिशीलता का ढोल बहुत ज़ोर-शोर से पीटता है, लेकिन इस समय 2030 तक के लिए वह अपना कोई लक्ष्य बताने से कन्नी काट रहा है. संघ के सबसे बड़े देश जर्मनी की जनता कोयले से चलने वाले तापबिजलीघरों को बंद करने के लिए बार-बार ज़ोरदार प्रदर्शन कर रही है, पर सरकार इन बिजलीघरों की आयु बढ़ाने में लगी है. जर्मनी ने पवन और सौर ऊर्जा के लिए नियमों को कड़ा और अनुदानों को कम कर दिया है.

भारत पेरिस समझौते पर अब भी अडिग

इन प्रतिकूल परिस्थितियों में जलवायु के शुभचिंतकों के लिए एक शुभ समाचार यह है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पेरिस के जलवायुरक्षा समझौते के पालन के लिए अब भी वचनबद्ध हैं. अर्जेन्टीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में जी-20 देशों के शिखर सम्मेलन के दौरान संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के साथ बातचीत में मोदी ने कहा कि वे पेरिस समझौते के साथ हैं और भारत में उसके अनुपालन का पूरा प्रयास करेंगे. संयुक्त राष्ट्र के मुख्य प्रवक्ता दुयारिच के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी तथा संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने कातोवित्स के ‘सीओपी24’ सम्मेलन के बारे में और पेरिस वाले जलवायुरक्षा समझौते के महत्व के बारे में बातें कीं. गुटेरेस ने प्रधानमंत्री मोदी को उनके दृढ़ समर्थन के लिए धन्यवाद दिया. मोदी ने उनसे कहा कि भारत जलवायुरक्षा के कार्य में अपने योगदान को बढ़ायेगा.

भारत को स्वयं अपने हित में भी जलवायुरक्षा के प्रयासों को बढ़ाना होगा. औसत वैश्विक तापमान में वृद्धि को 21वीं सदी के अंत से पहले ही, यदि दो डिग्री सेल्सियस से कम रखने में सफलता नहीं मिली और, जैसी कि आंशंका है, वह 4.2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया, तो उस समय तक विश्व के विभिन्न शहरों की दशा के बारे में एक मॉडल-गणना के अनुसार, भारत की राजधानी नयी दिल्ली का हाल कुछ इस प्रकार बदलेगाः

दिल्ली के भविष्य की मॉडल गणना

1970 में दिल्ली के सबसे गरम दिनों वाले महीने का औसत तापमान 0.3 डिग्री, 1997 में 0.8 डिग्री और 2008 में 1.8 डिग्री बढ़ा. 2030 तक वह 2.1 डिग्री, 2060 तक 3.0 डिग्री, 2080 तक 5.0 डिग्री और 2100 तक 6.1 डिग्री बढ़ जायेगा.

इस मॉडल के अनुसार, 1990 में दिल्ली के सबसे गरम महींने का औसत तापमान 31.5 डिग्री और 2006 में 32.1 डिग्री रहा होगा. 2021 में वह 32.7 डिग्री, 2041 में 33.9 डिग्री, 2061 में 35.8 डिग्री और 2081 में 36.9 डिग्री हो जायेगा. कहने की आवश्यकता नहीं कि सबसे गरम महीने के कई दिन ऐसे भी होंगे, जब तापमान औसत कहीं अधिक होगा.

इसी प्रकार 1990 में दिल्ली में प्रति वर्गमीटर यदि 675 लीटर पानी बरसा था, तो 2006 में वह घट कर 650 लीटर हो गया होगा. 2021 में वह घट कर 510 लीटर, 2061 में 420 लीटर और 2081 में 410 लीटर ही रह जायेगा.

प्लेग जैसी बीमारियां वापस आ सकती हैं

ब्रिटेन में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर पीटर फ़्रैंकोपैन तापमान बढ़ने पर एक ऐसी बीमारी के पुनर्जीवित हो जाने की याद दिलाते हैं, जो इस समय सोई हुई है. उनका कहना है कि औसत वैश्विक तापमान 18वीं सदी के मध्य की अपेक्षा केवल डेढ़ डिग्री बढ़ने से ‘येर्सीना पेस्टिस’ नाम का वह बैक्टीरिया भी सक्रिय हो सकता है, जो अतीत में मानव इतिहास की सबसे जानलेवा बीमारी प्लेग (ताऊन) फैलाने के लिए जाना जाता है. उनका कहना है कि सन 1340 वाले दशक में सौर-ज्वालाओं और ज्वालामुखी विस्फोटों से दुनिया का तापमान डेढ़ डिग्री बढ़ गया था और इतने भर से ही प्लेग का बैक्टीरिया भी कहर ढाने लगा था. उस समय केवल पांच ही वर्षों के भीतर यूरोप के एक-तिहाई निवासी प्लेग का शिकार बन कर मौत की नींद सो गये थे.

यह चेतावनी बहुत दूर की कौड़ी नहीं है. तापमान बढ़ने से रूसी साइबेरिया की चिरतुषार (पर्माफ्रॉस्ट) वाली भूमि नरम पड़ जाने से वहां गिलटी रोग (एनथ्रैक्स) के मामले बढ़ गये हैं. 2016 में 12 साल के एक लड़के की मृत्यु भी हो गयी है. मलेरिया जैसी बीमारियों के मच्छर पहले यूरोप के देशों में नहीं होते थे, लेकिन अब वे भी यूरोप में दिखाई पड़ने लगे हैं.