ऐसा मुक़ाम किसे हासिल हुआ कि गर्ल्स कॉलेज में किसी शायर के नाम की लाटरियां निकाली जाएं कि वह किसके हिस्से में पड़ता है? ऐसा कब हुआ कि किसी की कविताओं को तकिये के नीचे छिपाकर उनकी गर्मी महसूस की जाए? और कहीं अपने सुना है कि लड़कियां अपने बेटों का नाम किसी शायर के नाम पर रखने की कसमें खाएं?

लाज़मी है कि असरार-उल हक़ यानी मजाज़ की कब्र पर फ़ातेहा पढ़ लें क्योंकि आज, यानी पांच दिसंबर को उसकी बरसी है. उसके मरने पर नामचीन शायर जोश मलीहाबादी ने कुछ यूं कहा था, ‘मौत हम सबका तआक़ुब (पीछा) कर रही है, मगर ये देखकर रश्क आया और कलेजा फट गया कि तुम तक किस क़दर जल्दी पहुंच गयी. एक मुद्दत से शिकायत कर रहा हूं कि ओ कमबख्त़ मौत! तू मुझे क्यूं नहीं पूछती. मैंने क्या बिगाड़ा था तेरा कि तूने मुझसे बे-एतिनाई (तिरस्कार) बरती, और ‘मजाज़’’ ने क्या अहसान किया था तुझ पर, ओ रुसियाह! (काले मुंह वाली) कि तूने उसे बढ़कर कलेजे से लगा लिया...

...मजाज़! मैंने तेरे वालिदैन को तेरा पुर्सा (मातमी चिट्ठी) नहीं दिया था. इसलिए कि उन्हें चाहिए था कि वो तेरा पुर्सा मुझे दे देते. तू सिर्फ उनका बेटा था. लेकिन तू मेरा क्या था, यह उन बदनसीबों को मालूम नहीं. मेरा ख़्याल था यह चिराग़ जो मुझ नामुराद ने जलाया है, मेरे बाद तू इस चिराग़ को रोशन करेगा और मजीद रौग़न डालकर इसकी लौ को और उकसायेगा और इस चिराग़ से नए सैकड़ों नए चिराग़ रोशन जलते चले जायेंगे. लेकिन सद-हैफ़! कि तू ही बुझकर रह गया-मेरी उम्मीद का चिराग़ शायद अब भी न जल सकेगा...

...मेरी रात भीग चुकी है. तारे सिर पर टिमटिमा रहे हैं. बिस्तर तह कर लिया है, कमर बांध ली गयी है और अब यह मुसाफ़िर भी तैयार हो चुका है. मजाज़! घबराना नहीं. जोश भी आ रहा है, जल्द आ रहा है. घबराना नहीं ऐ मजाज़!’

यह सब आज के दिन के लिए जोश ने कहा था. विडंबना देखिये! जोश मलीहाबादी ने मजाज़ की मौत पर यानी अपने जन्मदिन पर अपना भी फ़ातिहा पढ़ दिया. आज जोश का जन्मदिन है!

हिंदुस्तानी शायरी का कीट्स

मजाज़ को हिंदुस्तानी शायरी का कीट्स कहा जाता है. क्यों? क्योंकि वह हुस्नो-इश्क़ का शायर था. पर जो बात दीगर है वह यह कि इसी हुस्नो-इश्क़ पर क़सीदे पढ़ते हुए उसने इस पर लगे प्रतिबंधों को भी अपनी शायरी में उठाया. और हुस्नो-इश्क़ की शायरी ही क्योंकर उसका तआरुफ़ होने लगा! वह तो लाल झंडे के साये में भी चला है. मशहूर शायर असर लखनवी ने कहीं लिखा था, ‘उर्दू में कीट्स पैदा हुआ था, लेकिन इन्कलाबी भेड़िये उसे उठा ले गए.’ यहां इन्कलाबी भेड़िये से मतलब प्रगतिशील या तरक्की पसंद शायरों की जमात से था. शायरी के जानकार प्रकाश पंडित कहते हैं, ‘उसे ये भेड़िये उठा ले गए या वो स्वयं मिमियाती भेड़ों के रेवड़ से आगे निकल आया से ज़्यादा ज़रूरी बात यह है कि उसने जो देखा और महसूस किया वो लिखा. अब यह तआरुफ़ जाने मजाज़ का है या जावेद अख्तर का- वे जावेद के मामू जान थे और जांनिसार के साले. सफिया, यानी मजाज़ की बहन से जब जांनिसार की शादी हुई तो तोहफ़े में मजाज़ ने उन्हें कीमती शराब की एक बोतल भेंट दी. ‘आहंग’ के पेशलफ्ज़ में मजाज़ ने कहा था, ‘फैज़ और जज़्बी मेरे दिल-ओ-जिगर हैं और सरदार (जाफ़री) और मखदूम मेरे दस्तो-बाज़ू.’

मजाज़ के अफ़साने में सरदार अली जाफ़री को न लाया गया तो वे नाराज़ होकर ख़ुद कब्र से उठकर चले आएंगे. आख़िर, उनका सबसे अच्छा दोस्त था मजाज़. जाफ़री ने ‘लखनऊ की पांच रातें’ में उसका ताआरुफ़ कुछ यूं किया है, ‘मजाज़ आम तौर पर अलीगढ़ से सिलवाई हुई शेरवानी पहनते थे और मैं खद्दर का कुरता पायजामा. मैं लखनऊ यूनिवर्सिटी में एमए का तालिबे-इल्म था. सिब्ते-हसन (एक और दोस्त) नेशनल हेराल्ड में सब-एडिटर और मजाज़ बेकार थे और सिर्फ़ शायरी करते थे.’ आपको बता दें कि ‘लखनऊ की पांच रातें’ में मजाज़ ही वह किरदार है जिसके इर्द-गिर्द जाफ़री ने क़िस्सागोई की है.

आदत की मार

मजाज़ को शराबनोशी ने मार डाला, और भरी जवानी में मार डाला. वह दिन रात पीता, सुबहो-शाम पीता. उठकर पीता, पीकर सोता. इसी लत के चलते दो बार उसका नर्वस ब्रेकडाउन हुआ. पागलों के अस्पताल में भर्ती हुआ. जब दुरुस्त होकर वापस आया, फिर शराब पीने लग गया. कहा जाता है इश्क़ में नाकाम होने के बाद उसने यह रास्ता इख्तियार किया था. वरना उसका बचपन बड़ा ही सादा और भोला था.

उसकी बर्बादी का क़िस्सा दिल्ली में शुरू हुआ था. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से बीए करने के बाद लाखों लड़कियों का दिल तोड़ता हुआ बड़ी-बड़ी आंखों, लंबे कद और ज़हीन शायरी करने वाला मजाज़ दिल्ली में आल इंडिया रेडियो की ओर से प्रकशित होने वाली पत्रिका ‘आवाज़’ का एडिटर बन गया था. यहां वह एक ऊंचे घर वाली लड़की, जो शादी-शुदा थी, को अपना दिल दे बैठा. उसने दिल तोड़ दिया या कहें कि समाज की बदिशें आड़े आ गईं. जो भी है, इस नाकामी को लेकर जब वह अपने शहर लखनऊ आया तो साथ में शराब की लत ले आया. दिल्ली से रुखसत होते वक़्त उसने कहा था:

‘रुख़सत ऐ दिल्ली! तेरी महफ़िल से जाता हूं मैं,

नौहागर (रोते हुए) जाता हूं मैं, नाला-ब-लब (होठों पर आर्तनाद) जाता हूं मैं.

शराबनोशी की हदें पार जब हो गयीं, तो फिर यह ख़याल न रहा कि कहना क्या है और किससे कहना है. कभी कभी उसका आचरण हद दर्ज़ा नीचे गिर जाता और जब होश आता तो वह फिर वही सहमा, डरा और संकोच का मारा हुआ मजाज़ बन जाता. कभी ख़ुद ही अपने महान होने का ऐलान करता और ख़ुद को ग़ालिब और इक़बाल की कतार में खड़ा करता और कभी ख़ुद की नाकामी पर फ़ातेहा पढ़ लेता. रोटी की परवाह से बेख़बर, फटे हुए पैराहनों में सिमटा हुआ लापरवाह मजाज़ सिर्फ यही फ़िक्र करता कि शराब कब, कहां और कैसे मिलेगी. ज़ाहिर था कि वह शराब नहीं पी रहा था, शराब उसे पी रही थी. जब भी होश आता, वह कलम उठा लेता और कागज़ पर अलफ़ाज़ बिखेर देता. उसे अपनी बर्बादी नज़र आती थी पर उसका रंज नहीं करता था. उसने ठीक ही कहा था कि:

‘मेरी बर्बादियों का हमनशीनों

तुम्हें क्या, ख़ुद मुझे ग़म नहीं है.’

मजाज़ की शायरी

‘मजाज़’ कभी रोमांटिक शायर था तो कभी परचम उठाने वाला. फैज़ अहमद फैज़ ने ‘आहंग’ की भूमिका में लिखा है कि ‘मजाज़’ की इंक़लाबियत, आम इंक़लाबी शायरों से मुख्तलिफ़ है. आम इंक़लाबी शायर इंक़लाब के मुताल्लिक गरजते हैं, ललकारते हैं, सीना कूटते हैं, इंक़लाब के मुताल्लिक गा नहीं सकते, उसके हुस्न को नहीं पहचानते. मजाज़ उनसे अलग है. इस बात की तस्दीक ‘आहंग’ और सौज़े-नौ’ से की जा सकती है.

वहीं ‘बोल अरी ओ धरती बोल, राज सिंहासन डांवाडोल’ आज के हालात पर अब भी मौज़ूं होती है. उसकी नज़्म ‘आवारा’ उसकी शख्सियत का बयान है और उस जैसे तमाम नौजवानों का हाल-ए-दिल बयां करती है. जब वह इश्क़ में हारकर कहता है ‘ऐ ग़मे दिल क्या करूं, ऐ वहशते दिल क्या करूं’ तो उसके लफ़्ज़ों में हार का दर्द अपने सीने में नश्तर की मानिंद चुभता है. मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली ने लिखा था कि जब हारकर ‘मजाज़’ लखनऊ चला गया तो उसकी शायरी को लेकर हसरत जयपुरी सिनेमा की दुनिया पर छा गए.

प्रकाश पंडित लिखते हैं, मजाज़ उर्दू शायरी का कीट्स था. मजाज़ वास्तविक अर्थों में प्रगतिशील शायर था. मजाज़ रास और शराब का शायर था. मजाज़ अच्छा शायर और घटिया शराबी था. मजाज़ नीम-पागल लेकिन निष्कपट इंसान था. मजाज़ चुटकुलेबाज़ था.