बीते 23 नवंबर को पाकिस्तान के कराची स्थित चीन के वाणिज्यक दूतावास पर कुछ लोगों ने हमला कर दिया. हालांकि, हमलावर दूतावास के अंदर घुसने में कामयाब नहीं हुए, लेकिन इस हमले में दो पुलिस अधिकारियों और वीजा लेने आए पाकिस्तान के दो नागरिकों की मौत हो गई. इस हमले की जिम्मेदारी अलगाववादी संगठन बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) ने ली है.

बीएलए पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिमी प्रांत बलूचिस्तान में सक्रिय एक अलगाववादी संगठन है. यह संगठन दशकों से एक अलग देश की मांग कर रहा है. पाकिस्तान की सरकार ने इसे एक आतंकी संगठन घोषित कर रखा है. बीएलए इससे पहले भी चीन के नागरिकों और उसकी परियोजना से जुड़े लोगों को निशाना बना चुका है. बीते साल मई में ग्वादर बंदरगाह के निकट एक चीनी परियोजना में काम कर रहे 10 पाकिस्तानी मजदूरों की बीएलए के लड़ाकों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी.

इसके बाद बीते फरवरी में कराची स्थित एक शिपिंग कंपनी में काम करने वाले चीनी नागरिक की सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई. इस घटना के करीब छह महीने बाद ही बीएलए ने बलूचिस्तान के डेरा बुगती जिले में चीनी नागरिकों और इंजीनियरों को ले जा रही एक बस को निशाना बनाते हुए आत्मघाती हमला किया. इसमें तीन चीनी नागरिक गंभीर रूप से घायल हुए थे.

पाकिस्तान के कई पत्रकार बताते है कि बीएलए पिछले कुछ समय से जिस तरह चीनी नागरिकों को निशाना बना रहा है और आए दिन उन्हें जान से मारने की धमकियां दे रहा है उससे साफ़ हो गया है कि संगठन ने पाकिस्तान में चीनियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है.

बीएलए के चीन के खिलाफ खड़े होने की वजह

बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी हमेशा से अपनी मांगों को लेकर पाकिस्तान सरकार के खिलाफ लड़ती आई है. लेकिन, पिछले दो साल में इसने जिस तरह से चीनी नागरिकों को निशाना बनाया है, उसके बाद ये सवाल पूछा जा रहा है कि अब बलूचिस्तान का यह अलगाववादी संगठन आखिर चीन के खिलाफ क्यों हो गया.

पाकिस्तान के पत्रकार इसके पीछे कई वजह बताते हैं. इसकी पहली सबसे बड़ी वजह चीन द्वारा पाकिस्तान में किया जा रहा भारी निवेश (60 अरब डॉलर का) है. चीन के इस निवेश का सबसे बड़ा हिस्सा बलूचिस्तान में ही खर्च किया जा रहा है. दरअसल, चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) का सबसे अहम भाग ग्वादर बंदरगाह है, जो बलूचिस्तान में ही आता है. यही वजह है कि चीन इस प्रांत में गलियारे के साथ-साथ कई प्रोजेक्ट्स पर भी काम कर रहा है. वह बलूचिस्तान में बुनियादी ढांचे, परिवहन और ऊर्जा परियोजनाओं जैसे एलएनजी टर्मिनल और गैस पाइपलाइन में भी निवेश कर रहा है. ग्वादर बंदरगाह के करीब ही एक विशेष आर्थिक क्षेत्र का भी निर्माण किया जा रहा है, जिसमें करीब पांच लाख चीनियों के रहने की व्यवस्था होगी. देखा जाए तो बलूचिस्तान चीन के सीपीईसी प्रोजेक्ट की रीढ़ जैसा है.

पाकिस्तानी मीडिया से जुड़े कुछ जानकार बताते हैं कि चीन के इस प्रोजेक्ट को पाकिस्तान की सरकार देश का भाग्य बदलने वाली आर्थिक गतिविधि बताती है. लेकिन, बलूचिस्तान जो इस प्रोजेक्ट का सबसे अहम हिस्सा है, वहां के लोगों को इसका कोई फायदा नहीं हो रहा. इन जानकारों के मुताबिक चीन के इतने बड़े निवेश के बाद बलूचिस्तान के लोगों को बड़े पैमाने पर रोजगार आदि की उम्मीद जगी थी. लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं. चीनी प्रोजेक्ट्स में मैन पॉवर से लेकर मटीरियल और मशीनरी तक सब चीन के ही इस्तेमाल हो रहे हैं. प्रोजेक्ट्स के कॉन्ट्रैक्ट भी चीनी ठेकेदारों को ही दिए जा रहे हैं.

इसके अलावा स्थानीय लोग गलियारे के लिए जमीनों के अधिग्रहण और मुआवजे को लेकर भी खासे नाराज हैं. साथ ही बलूचिस्तान में सीपीईसी से जुड़ी परियोजनाओं में पारदर्शिता के अभाव और भ्रष्टाचार के आरोप भी लग रहे हैं. ब्रिटेन में रह रहे चर्चित बलूच राष्ट्रवादी नेता मेहरान मिर्र एक साक्षात्कार में बलूचिस्तान के लोगों को आगाह करते हुए कहते हैं, ‘चीनियों से सावधान रहो क्योंकि ये आपके बच्चों का भविष्य खाने के लिए आ रहे हैं.’ वहीं पाकिस्तानी अखबार डॉन के वरिष्ठ पत्रकार मुहम्मद अकबर नोटज़ई अपनी एक टिप्पणी में लिखते हैं कि पाकिस्तान की सरकार भी बलूच लोगों को लेकर काफी गैरजिम्मेदार दिखी है. सीपीईसी की घोषणा से लेकर अब तक किसी भी सरकारी दस्तावेज में यह नहीं कहा गया है कि बलूचियों को इस निवेश का कोई लाभ होगा या दिया जाएगा.

कुछ जानकार एक और बात भी बताते है. इनके मुताबिक जब से बलूचिस्तान में चीन की परियोजनाओं की घोषणा हुई है. तब से वहां व्यापारिक संभावनाओं को देखते हुए अन्य प्रांतों के लोगों ने बड़े स्तर पर निवेश करना शुरू कर दिया है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ये लोग बलूचिस्तान के ग्रामीण इलाकों में बहुत कम दामों पर जमीनें खरीद रहे हैं.

जानकारों की मानें तो बलूचिस्तान के अलगाववादी संगठनों के साथ वहां के आम लोगों को भी लगता है कि चीन की सीपीईसी परियोजना की वजह से उनके यहां जो कुछ हो रहा है, वह बलूच समुदाय के लिए बड़ी तबाही जैसा होगा. इनका मानना है कि इससे न सिर्फ वे प्राकृतिक संसाधनों और खनिजों की प्रचुरता वाली अपनी जमीन खो देंगे बल्कि बाहरी लोगों के बड़ी संख्या में उनके यहां बसने से वे अपनी पहचान भी खो देंगे. यही वजह है कि बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी सहित इस प्रांत के सभी अलगाववादी संगठन चीन के खिलाफ हो गए हैं. पिछले दिनों ही बीएलए के सीनियर कमांडर असलम बलोच ने एक वीडियो इंटरव्‍यू में कहा भी है, ‘चीन और पाकिस्‍तान दोनों ही परियोजनाओं के नाम पर बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों को लूट रहे हैं, ये दोनों बलूचिस्तान में बलूचों की ही पहचान खत्‍म करना चाहते हैं. हमें अपनी संप्रुभता की रक्षा के लिए चीनी निवेश का जमकर विरोध करना है. हम यह लड़ाई जारी रखेंगे.’