परमाणु परीक्षणों की वजह से पोकरण का सामरिक महत्व किसी से नहीं छिपा है. लेकिन राजस्थान के जैसलमेर जिले में पड़ने वाली यह जगह धार्मिक स्थल ‘रामदेवरा’ के चलते सांस्कृतिक-सामाजिक लिहाज़ से भी खासी महत्वपूर्ण है. हिंदुओं के लिए यह जगह उनके लोकदेवता बाबा रामदेवजी का मंदिर है तो मुसलमान इसे समान अधिकार भाव से रामसा पीर की ख़ानक़ाह मानते हैं. जनश्रुति है कि राजपूत परिवार में जन्मे रामदेवजी ने जीवित समाधि ले ली थी ताकि मुस्लिम अनुयायियों को उनकी इबादत करने में झिझक न हो. चूंकि उन्होंने दलित महिला डालीबाई को अपनी पुत्री माना था इसलिए दलितों में भी इस धर्मस्थल को लेकर खासी मान्यता है.

लेकिन जिस पोकरण में पिछली सात सदी से हिंदू-मुस्लिम साझी विरासत के प्रतीक रामदेवरा की पंचरंगी पताका शान से लहराती रही है, वहां का सामाजिक सौहार्द इस विधानसभा चुनाव में पूरी तरह बदरंग होता दिखा. राजनीति में मज़हब और जातिवाद से जुड़े तकरीबन सभी संभावित द्वंद, जैसे- हिंदू बनाम मुसलमान, सवर्ण बनाम दलित, दलित बनाम जनजाति, ओबीसी बनाम मूल ओबीसी या बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक पोकरण में एक साथ नज़र आ रहे हैं. बीते कुछ दिनों के दौरान यहां दलित-मुस्लिम या राजपूत-भील (जनजाति) एकता जैसे सियासी-सामाजिक गठबंधनों की दुहाई भी जोर-शोर से सुनी गई.

रामदेवजी की समाधि
रामदेवजी की समाधि

जहां कांग्रेस ने पोकरण से सिंधी-मुस्लिम धर्मगुरु ग़ाज़ी फ़कीर के बेटे सालेह मोहम्मद को लगातार तीसरी बार चुनाव मैदान में उतारा है. वहीं भाजपा ने अपने मौजूदा विधायक शैतान सिंह की जगह राजपूत महंत प्रतापपुरी महाराज पर दांव लगाया है. प्रतापपुरी बाड़मेर ज़िले में पड़ने वाले नाथ संप्रदाय के तारतरा मठ से आते हैं तो सालेह मोहम्मद का ताल्लुक पाकिस्तान में पड़ने वाले पीर पगारा से जोड़ा जाता है. चूंकि ये दोनों नेता अपने-अपने समुदायों की आस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसलिए पोकरण इस समय भगवा और हरे के बीच बंट सा गया है. कई चुनावी सभाओं में हर-हर महादेव और अल्लाह-ओ-अक़बर जैसे धर्मोन्मादी उद्घोष लगे. इसी बुधवार को रामदेवरा में आयोजित प्रतापपुरी की चुनावी रैली में ‘एक ही नारा, एक ही नाम. जय श्री राम, जय श्री राम’ जैसे नारे प्रमुखता से लगाए गए.

पोकरण में टक्कर इसलिए भी कांटे की हो गई है कि यहां 1.95 लाख में से करीब पचास-पचास हजार मतदाताओं के साथ मुस्लिम और राजपूत बराबर तादाद में हैं. इनके बाद यहां इतनी ही आबादी दलित और जनजातियों की मिलाकर है, जो काफी हद तक इस चुनाव में निर्णायक बनेंगे. जहां सालेह मोहम्मद के समर्थक दलितों के अपने साथ आने का दावा कर रहे हैं तो प्रतापपुरी को चाहने वाले दलितों को हिंदू वोटबैंक बताते हैं. उधर, कुछ दलित राजनीतिकारों का कहना है कि पोकरण के जिस गांव में राजपूत अधिक संख्या में है, वहां वे और जिस गांव में मुस्लिमों की आबादी ज्यादा है, वहां वे, दलितों को डराने-धमकाने में कोई कसर नहीं छोड़ते. ऐसा ही कुछ हाल जनजातियों का भी है. इलाके के भाजपा कार्यकर्ता भील और राजपूत समुदाय के आपसी जुड़ाव के लिए राणा प्रताप के जमाने का हवाला देते हैं. जबकि कांग्रेस के हितैषी भाजपा पर जनजातियों के साथ भेदभाव का आरोप लगाते हैं.

प्रतापपुरी के समर्थकों को शिकायत है कि क्षेत्र के सांप्रदायिक माहौल को खराब करने की शुरुआत सालेह मोहम्मद के चाचा फ़तेह मोहम्मद ने दो दशक पहले चुनाव लड़कर की थी. विरोधी भी कुछ ऐसा ही इल्ज़ाम भारतीय जनता पार्टी और क्षेत्र के राजपूत नेताओं पर लगाते हैं. दिलचस्प बात यह भी है कि ये दोनों प्रत्याशी ही नहीं बल्कि इनके अधिकतर प्रचारक भी अलग-अलग मठों या धर्मगद्दियों से वास्ता रखते हैं. एक तरफ प्रतापपुरी के पक्ष में परशुराम गिरी और कृपाराम जैसे संतों ने मोर्चा संभाला है. तो सालेह मोहम्मद की तरफ से हिंदुओं को लुभाने के लिए दलित महंत भजनानंद और प्रमोद आचार्य जैसे उपदेशकों के मैदान में आने की ख़बर है.

यहां के एक पत्रकार की मानें तो दोनों समुदायों के बीच तनाव में जो कमी बाकी बची थी उसे ये प्रचारक अपने भाषणों से पूरा कर रहे हैं. बीते दिनों गोरक्षक और गोभक्षक में से किसी एक को चुनने की गिरी द्वारा की गई अपील आम लोगों की चर्चाओं में प्रमुखता से शामिल है. यहां की राजनीति में सांप्रदायिकता इस क़दर घुल चुकी है कि इलाके में हमें जहां भी एक दर्जन से अधिक मतदाता दिखे उनके बीच भी कोई न कोई फ़कीर या गुरू मौजूद था.

हालांकि कुछ संवेदनशील मतदाता अपने क्षेत्र में इस तरह की राजनीति से बेहद निराश नज़र आते हैं. इनमें से एक नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘क्षेत्र में एक बड़ी आबादी खारे पानी की समस्या से पीड़ित है. लेकिन उसका ज़िक्र कोई नहीं कर रहा. रामदेवरा कस्बे से कुछ सौ मीटर दूर तक इंदिरा गांधी नहर आती है किंतु दोनों दलों की सरकारें और विधायक रहने के बावजूद आज तक यहां पाइपलाइन नहीं बिछ पाई.’

वहीं कुछ को शिकायत है कि भाजपा राज में स्कूलों को जिस तरह स्थानांतरित किया गया उससे पोकरण में गरीब-दलित बच्चों और बच्चियों के सामने पढ़ाई का संकट खड़ा हो गया है. क्षेत्रफल के हिसाब से देश की सबसे बड़ी तहसीलों में शुमार पोकरण में बच्चों के लिए स्कूलों की दूरी पांच से दस किलोमीटर तक बढ़ गई है. लेकिन उसकी फ़िक्र भी किसी को नहीं दिखती. रोजगार और परमाणु परीक्षणों से प्रभावित स्थानीय निवासियों के स्वास्थ्य से जुड़ी बेहद जरूरी चर्चाएं भी चुनावी बैठकों और रैलियों से नदारद ही दिखती हैं.

मजहब आधारित राजनीति को हवा देने में यहां मीडिया का एक वर्ग भी लगा दिखता है. एक प्रमुख राष्ट्रीय टीवी चैनल ने अपना एक पूरा कार्यक्रम प्रतापपुरी को तकरीबन देवदूत ही साबित करने में समर्पित कर दिया था. इस कार्यक्रम में प्रतापपुरी को ‘विस्फोटक नगरी का विस्फोटक बाबा’ की उपमा दिए जाने के साथ उनके उस बयान को भी बार-बार दिखाया गया जिसमें उन्होंने कहा था, ‘हम यहां चुनाव लड़ने यूं ही नहीं आए. यह देवी-देवताओं की कृपा से हुआ है.’

वहीं, सालेह मोहम्मद के प्रचारक भी अपने संबोधन की शुरुआत तो क़ौमी एकता से जुड़ी बातों से करते हैं, लेकिन आख़िर तक आते-आते वे भी मतदाताओं की धार्मिक भावनाओं को लुभाने और भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते. बताया जाता है कि मोहम्मद के समर्थन में सोमवार को आयोजित एक सभा में जय श्री राम के नारे लगवाये गए थे.

इस तरह की राजनीति पर क्षेत्र के दीपक व्यास (बदला हुआ नाम) तंज कसते हुए कहते हैं, ‘जहां चुनावी सभाओं में राजनैतिक व क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा की दरकार थी, वहां भजन-कीर्तन हो रहा है. हमें विधानसभा में अपना प्रतिनिधित्व करवाना है. जागरण या कव्वाली नहीं.’