सन् 1932 की बात है. किसी अखबार ने एक झूठी कहानी गढ़कर खबर छापी कि महात्मा गांधी अरबिंद घोष की तरह ही पूर्णतः ‘आध्यात्मिक’ होते जा रहे हैं और राजनीति में उनकी दिलचस्पी खत्म होती जा रही है. महात्मा गांधी ने इसका खंडन करते हुए इसे पूरी तरह निराधार बताया. इस खंडन की खबरें हिन्दुस्तान टाइम्स और हिन्दू जैसे अखबारों में प्रकाशित हुई थीं.

सोचना दिलचस्प हो सकता है कि झूठी खबर फैलानेवाले ने उदाहरण के लिए श्री अरबिंद का नाम ही क्यों चुना होगा. इसके दो कारण हो सकते हैं - पहला यह कि श्री अरबिंद जैसे राजनीतिक क्रांतिकारी ने अलीपुर षड्यंत्र केस में नाम आने के बाद अपने आप को पूरी तरह से राजनीति से अलग कर लिया और 1910 में पांडिचेरी में अपना आश्रम बसाकर एकांत अध्यात्म-साधना में लग गए. दूसरा यह कि गांधीजी जब भारत लौटकर कई महत्वपूर्ण व्यक्तियों से मिल रहे थे और कई महत्वपूर्ण स्थानों का दौरा कर रहे थे, तब श्री अरबिंद और उनका आश्रम भी उनकी सूची में था. उन्होंने श्री अरबिंद से मिलने का असफल प्रयास भी किया था. इस कहानी में कई मोड़ आए. जो भी हो, श्री अरबिंद और महात्मा गांधी की एक-दूसरे में रुचि तो बनी ही रही.

1920 में जब महात्मा गांधी और जमनालाल बजाज के बीच आध्यात्मिक संबंध प्रगाढ़ हो रहे थे तो जमनालाल जी ने गांधी को श्री अरबिंद से मिलने और उन्हें समझने की सलाह दी. सितंबर, 1920 में महात्मा गांधी ने इसके लिए श्री अरबिंद को तार से एक संदेश भिजवाया. लेकिन संभवतः कुछ बात बनी नहीं. 1923 में जब महात्मा गांधी यर्वदा जेल में थे तब उन्होंने जेल में ही श्री अरबिंद की लिखी ‘गीतानिष्कर्ष’ पढ़ी. इसका पता नौ अप्रैल, 1923 की उनकी जेल डायरी से चलता है. इसी क्रम में उन्होंने छह जून, 1923 को श्री अरबिंद के जेल में बिताए दिनों की कहानी भी पढ़ी. इसी बीच गांधीजी के दो निकटतम सहयोगी श्री अरबिंद के प्रभाव में आए. इनमें से एक थे स्वयं महात्मा गांधी के बेटे देवदास और दूसरे थे देशबंधु चित्तरंजन दास.

देशबंधु चित्तरंजन दास ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने अलीपुर बम केस में जी-जान लगाकर श्री अरबिंद की पैरवी की थी. 28 जून, 1925 को देशबंधु को श्रद्धांजलि देते हुए गुजराती पत्रिका ‘नवजीवन’ में महात्मा गांधी ने लिखा था, ‘देशबंधु की उदारता असीम थी. ... कहते हैं कि उन्होंने श्रीयुत् अरबिंद घोष के मुकदमे में नौ महीने तक परेशानी उठाई. अपनी गांठ से रुपये खरचे और एक पाई भी फीस नहीं ली.’

1931 में श्री अरबिंद की शिष्या और सहचरी ‘मदर या श्रीमां’ (मीरा अल्फासा) ने श्री अरबिंद के साथ अपने वार्तालाप की एक पुस्तिका प्रकाशित कराई थी. इस पुस्तिका का स्वयं श्रीमां द्वारा हस्ताक्षरित विशेष प्रतियां गांधीजी के साबरमती आश्रम में बंटवाई गईं. उल्लेखनीय है कि श्री अरबिंद के आश्रम में आधे से अधिक वासी गुजराती ही थे. गांधीजी ने ब्रजकिशोर चांदीवाला को पत्र लिखकर यरवदा जेल में उस पुस्तिका की एक प्रति पढ़ने के लिए मंगवाई थीं. महात्मा गांधी जब ईशोपनिषद् में गहरे डूबे तो उन्होंने श्री अरबिंद द्वारा किए गए उसके भाष्य को भी पढ़ा.

श्री अरबिंद के अनुयायी और उनके आश्रम में रहनेवाले एक गुजराती सज्जन गोविंदभाई आर पटेल महात्मा गांधी से प्रभावित थे. गांधीजी के साथ उनका पत्र-व्यवहार भी होता था. 25 दिसंबर, 1933 को गोविंदभाई को एक पत्र में गांधी लिखते हैं, ‘आपका पत्र मिलने के बाद मैंने पूछताछ की और मुझे पता चला कि पाण्डिचेरी से निमंत्रण आया था और मैं कदाचित् वहां जाऊंगा. यदि मैं वहां आऊंगा तो श्री अरबिंद से अवश्य मिलना चाहूंगा. उनसे मिलन न हुआ तो मुझे बहुत निराशा होगी. इसलिए यदि शोरगुल किए बिना उनसे मिलने की व्यवस्था की जा सके तो करना. तय होने के बाद मैं स्वयं उनसे लिखकर समय मांगनेवाला हूं.’

इस दौरान गांधी जब-जब उपवास या अनशन पर गए तो श्री अरबिंद ने उसपर अपनी तीखी प्रतिक्रिया वयक्त की. एक बार तो उन्होंने इसे ‘अध्यात्म के विषय में असाधारण अज्ञानता’ की संज्ञा दी थी. गांधी के ‘अंतःकरण की आवाज़’ वाली बात का अक्सर वे मजाक ही उड़ाते थे. उदाहरण के लिए, 12 जुलाई, 1934 को श्री अरबिंद ने कहा था, ‘कोई मुझे गांधी के सात-दिवसीय उपवास के बारे में बता रहा था. मैंने कहा, क्या यह हरिजनों की खातिर कोई भूकंप पैदा करनेवाला है? और कुछ नहीं तो गांधी के अपने शरीर में भूकंप जरूर पैदा होगा. ...आजकल यह सब बहुत मूर्खतापूर्ण प्रतीत होता है, यही उपवास वगैरह - ऐसा लगता है मानो यही सबकुछ को बदल देगा. उपवास से अधिक से अधिक आपकी अपनी स्थिति प्रभावित होगी. लेकिन यह दूसरों के किए का प्रायश्चित कैसे हो सकता है? यह दूसरों के स्वभाव को कैसे बदल सकता है?’

हालांकि गांधी से मिलने की जिज्ञासा श्री अरबिंद में भी थी, लेकिन वे इस शर्त पर उनसे मिलना चाहते थे कि गांधी उनके एक अनुयायी की भांति उनसे मिलने आएं और ‘सत्य’ का उसी रूप में दर्शन करें जिस रूप में श्री अरबिंद उन्हें कराना चाहते हैं. 22 जुलाई. 1933 को श्री अरबिंद ने कहा था, ‘कल मैंने सोचा कि कितना अच्छा होता यदि गांधी उस सत्य के लिए यहां आते जिसे वह खोज रहे हैं. वह कहते हैं कि कभी-कभी उन्हें एक ‘आवाज़’ सुनाई देती है. मुझे नहीं लगता कि जिस सत्य की बात मैं यहां बताता हूं उसे वह स्वीकार करेंगे. उनका मानस अब इतना नम्य नहीं रहा.’

जब गांधीजी के पाण्डिचेरी आगमन वाली चिट्ठी श्री अरबिंद के आश्रम में पहुंची तो यह वहां चर्चा का विषय बन गई. जब श्री अरबिंद को बताया गया कि लोगों को लगता है कि उन दोनों का मिलना पूरी दुनिया के लिए एक उपयोगी अवसर हो सकता है और यह भी कि दुनिया का सबसे महान व्यक्ति कहे जानेवाले महात्मा गांधी भी श्री अरबिंद के ‘सत्य’ की व्याख्या को स्वीकार सकते हैं, तब 28 दिसंबर, 1933 को इसपर उन्होंने कहा- ‘गांधी का अपना काम, अपना आदर्श और अपना धर्म है. यहां से कुछ ग्रहण करने के लिए वह कैसे अपने आप को खोल सकते हैं?’ इसके ठीक अगले दिन उन्होंने कहा, ‘मुझे कोई कारण नहीं दिखता कि मैं उनसे मिलूं! अभी वह समय नहीं आया है जब मैं अपने प्रण से अलग हट जाऊं.’ दरअसल नवंबर 1926 में ही श्री अरविंद ने अपना एक नियम बनाया था कि वे किसी से नहीं मिलेंगे. यहां तक कि अपने शिष्यों से भी नहीं. वे बस केवल साल में एक या दो बार ‘दर्शन’ देंगे.

जब महात्मा गांधी को श्री अरबिंद द्वारा इस इनकार की बात पता चली तो उन्होंने तीन फरवरी, 1934 को श्री अरबिंद के शिष्य गोविंदभाई को चिट्ठी में लिखा, ‘अब मेरे दौरे का नया कार्यक्रम बनाया गया है. उसके अनुसार पाण्डिचेरी जाना स्थगित कर दिया गया है. मुझे यह स्वीकार करना चाहिए कि जो जिज्ञासा आपको है, वह मुझे नहीं है. मैं सभी लोगों का आदर करता हूं. श्री अरबिंद का नाम मैं बहुत पहले से सुनता आ रहा हूं. वहां बहुत से गुजराती और अन्य लोग हैं. जो आश्रम इतने लोगों को अपनाए हुए है उसे देखने-जानने की इच्छा होती है. बस इस इच्छा को पूरी करने के लिए ही मैंने प्रयत्न किया था; परंतु अब तो इसका प्रश्न ही नहीं उठता. आप सब लोगों से मिल लेता तो भी कुछ संतोष मिलता.’

इस घटना की जानकारी जब सरदार पटेल को लगी, तो उन्हें बहुत बुरा लगा. उन्होंने गांधीजी से कहा कि श्री अरबिंद से उनका मिलना इतना भी क्या जरूरी है और उनके आश्रम में रहनेवाली मीरा अल्फासा को गांधी भी ‘मदर’ या ‘श्रीमां’ क्यों कहते हैं?

इसके जवाब में पांच फरवरी, 1934 को सरदार वल्लभभाई पटेल को एक पत्र में महात्मा गांधी ने लिखा, ‘श्री अरबिंद से मिलने का प्रयत्न करना वहां रहनेवाले गुजरातियों की खातिर आवश्यक था. उनका इनकार शिष्टतापूर्ण था. उन्होंने लिखा कि वे किसी से नहीं मिलते. श्रीमां का कोई जवाब ही नहीं मिला. अब तो मेरा उस शहर में जाना ही स्थगित हो गया है. मुझे यह एक तरह से अच्छा लगा. फिर भी चंद्रशंकर शुक्ल और ठक्कर बापा को वहां भेजने का विचार है. वे जितना देख सकें उतना देख आएं. ‘मदर’ को ‘मदर’ कहने में हमारा क्या बिगड़ता है? जिसे जो पदवी मिली हो, उसे उसी नाम से बुलाने की शिष्टता तो गोलमेज परिषद् में भी बरती जाती थी. तुम शायद कहोगे कि यदि गोलमेज का अनुकरण करें, तब तो हमारी मुश्किल ही हो जाएगी. मेरे कहने का मतलब यह है कि वहां भी लोगों को इस शिष्टाचार का पालन करना पड़ता था.’

अब गांधीजी द्वारा श्री अरबिंद के आश्रम की यात्रा रद्द किए जाने पर श्री अरबिंद की भी प्रतिक्रिया आई. चार फरवरी, 1934 को श्री अरबिंद ने कहा- ‘मुझे खुशी हुई जब किसी ने मुझे बताया कि गांधी यहां नहीं आ रहे हैं. मुझे भी लगता था कि 21 फरवरी के मेरे ‘दर्शन’ वाले कार्यक्रम से ठीक पहले उनका आना यहां के वातावरण में गंभीर और अनावश्यक अशांति पैदा करता.’

इसके बाद इस बात को लेकर भी विवाद पैदा हुआ कि पहले श्री अरबिंद ने मिलने से इनकार किया या पहले गांधी ने ही अपना कार्यक्रम बदल दिया. जो भी हो, श्री अरबिंद को यह बहुत बुरा लगा था कि गांधी को उनसे मिलने का केवल ‘कौतूहल’ भर है. गांधी उनसे कुछ सीखना, समझना या आशीर्वाद लेना नहीं चाहते हैं. श्री अरबिंद ने कहा, ‘गांधी को यदि मुझसे नहीं मिल पाने पर इतनी ही निराशा हुई है तो वह 21 फरवरी तक रुक जाते और उस दिन मेरे अन्य अनुयायियों की तरह ही मेरा ‘दर्शन’ कर जाते. ...यदि किसी को यह उम्मीद थी कि गांधी यहां सत्य की खोज करने आ रहे थे तो यह बहुत ही बेतुकी बात है. चीजों को देखने का गांधी का अपना निश्चित तरीका है और उसमें कोई बदलाव आने की संभावना नहीं है.’

इस सबके बावजूद महात्मा गांधी ने फरवरी 1934 में पाण्डिचेरी की यात्रा की. उन्होंने कोशिश की कि श्री अरबिंद न सही ‘श्रीमां’ से ही उनकी मुलाकात हो जाए. लेकिन ‘श्रीमां’ ने भी गांधी से मिलने में अपनी असमर्थता जाहिर कर दी. इस बारे में 19 फरवरी, 1934 को मद्रास से सरदार पटेल को एक पत्र में गांधी लिखते हैं, ‘मैं पाण्डिचेरी हो आया. वहां कोई नहीं मिला. श्रीमां का तो जवाब ही नहीं आया. परंतु गोविन्दभाई दूसरे मुकाम पर मुझसे मिलने आ गए थे. उन्होंने सारा इतिहास बताया. आश्रम पर निगाह रखी जाती है इसलिए मुझे वहां पर जाने देने में भी खतरा था. वहां पचास प्रतिशत गुजराती हैं.’

गांधी ने आगे लिखा, ‘वहां का कार्यक्रम यह है- सवेरे पांच बजे उठते हैं. प्रत्येक साधक की अलग कोठरी होती है. लगभग 150 साधक हैं. देश के सभी स्थानों के हैं. आश्रम ने लगभग 40 मकान किराए पर ले रखे हैं. भोजन हमारे आश्रम जैसा है. श्री अरबिंद वर्ष में तीन बार ही बाहर आते हैं. श्री अरबिंद और माताजी बिल्कुल नहीं सोते. सुबह तीन से चार बजे तक आरामकुर्सी पर लेटे जरूर रहते हैं, मगर नींद नहीं लेते. साधकों को रोज उनके पास डायरी भेजनी पड़ती है. वे प्रश्न पूछ सकते हैं. उन्हें रोज चार बार श्री अरबिंद और माताजी की तरफ से खास डाक मिलती है. इनमें वे रोज 200 पत्र लिखते हैं. कोई पत्र अनुत्तरित नहीं रहता. श्री अरबिंद अनगिनत भाषाएं जानते हैं. वे साधकों को अंतःप्रेरणा से सुधारते हैं. यह सब विवरण गोविंदभाई ने दिया है.’

अक्टूबर 1938 में श्री अरबिंद के एक अनुयायी ब्रजकिशोर चांदीवाला ने महात्मा गांधी को लिखा कि श्री अरबिंद का विचार एकांगी हैं, इसलिए वे गांधीजी साथ रहना चाहते हैं. 23 अक्टूबर, 1938 को उस पत्र के जवाब में गांधीजी ने लिखा, ‘मेरे साथ रहने के बारे में तो मैंने इजाजत दी ही है. लेकिन इस इच्छा को भी मोह ही समझो. रमण महर्षि और अरबिंद एकांगी हैं और मैं सर्वांगी, बस इतना ही कहना पर्याप्त नहीं है. एकांगी जो अपना कार्य समझता है और अमल करता है, वह सच्चा. जो सर्वांगी होने का दावा करता है लेकिन सर्व में प्रयोग ही कर रहा है वह फूटे बादाम से भी बदतर हो सकता है. मैं कहां हूं सो तो भगवान ही जानता है. मैं साधक हूं, जबकि वे तो सिद्ध माने जाते हैं. शायद हैं भी. उनके अनुयायी तो उन्हें सिद्ध ही मानते हैं.’

1939 में जापान के एक समाज सुधारक और लेखक तोयोहिको कागावा भारत आए तो गांधीजी से भी मिले. 14 जनवरी, 1939 को उन्होंने गांधीजी का साक्षात्कार किया. इसमें गांधीजी ने कागावा को कहा, ‘अपने भ्रमण कार्यक्रम में क्या आपने पाण्डिचेरी को भी रखा है? यदि आप आधुनिक भारत का अध्ययन करना चाहते हैं, तो आपको शांतिनिकेतन और अरबिंद घोष का आश्रम दोनों देखने चाहिए. पता नहीं आपकी इस यात्रा के सलाहकार कौन हैं. काश कि इस मामले में आपने मुझे अपना सलाहकार बनाया होता!’

हैदराबाद के तत्कालीन प्रधानमंत्री सर मुहम्मद अकबर नजर अली हैदरी भी श्री अरबिंद के अनन्य भक्तों में थे. महात्मा गांधी हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल देने के लिए कई बार अकबर हैदरी का उदाहरण देते थे. 14 जनवरी, 1942 को हैदरी को अपनी श्रद्धांजलि में महात्मा गांधी ने कहा था- ‘जिस समय पाण्डिचेरी के ऋषि श्री अरबिंद अपने भक्तों को त्रैमासिक दर्शन देते थे, उस समय सर अकबर हैदरी निरपवाद रूप से वहां रहते थे.’

कहा जा सकता है कि अहिंसा और सत्याग्रह इत्यादि विषयों पर श्री अरबिंद द्वारा गांधीजी के प्रति व्यक्त किए गए तमाम आलोचनात्मक विचारों के बावजूद महात्मा गांधी ने कभी भी श्री अरबिंद के प्रति कोई नकारात्मक विचार व्यक्त नहीं किया. हालांकि यह भी उतना ही सच है कि गांधी ने कभी उन्हें अपना गुरुतुल्य या आदर्श इत्यादि भी नहीं माना. जैसा कि 4 जून, 1947 को आश्रम के एक पुराने सदस्य सुरेन्द्र को वे पत्र में लिखते हैं, ‘तुम जानते हो कि मित्रों ने मुझे रमण महर्षि, श्री अरबिंद, आगरा के साहेबजी महाराज, उपासनी बाबा, मेहर बाबा और एक अन्य कर्नाटक के संत, जिनका नाम मैं भूल गया हूं, को गुरु बनाने की सलाह दी थी. लेकिन इनमें से किसी को भी मैं अपना गुरु नहीं बना सका.’

महात्मा गांधी और श्री अरबिंद के संबंधों में यह विचित्रता हमेशा मौजूद रही कि उनमें एक-दूसरे के प्रति आकर्षण भी था और इनकार भी. कभी श्री अरबिंद ने गांधी से मिलने से इनकार किया, तो कभी गांधी ने अरबिंद को अपना गुरु मानने से.