मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए बीते 28 नवंबर को मतदान हो जाने के बाद से ही काफ़ी कुछ अज़ीबो-गरीब हो रहा है. राज्य की सत्ता पर 15 साल से काबिज़ भारतीय जनता पार्टी और विपक्षी कांग्रेस की ओर से जीत के दावे तो किए जा रहे हैं. यह सामान्य सा चलन भी है, पर असामान्य ये है कि दोनों ही पार्टियों ने अपने-अपने तरीके से इस बार राज्य की सरकारी मशीनरी और यहां तक कि चुनाव आयोग पर भी भारी दबाव बना रखा है. इसके कुछ उदाहरणों पर ग़ौर किया जा सकता है.

भाजपा : मंत्रिमंडल की बैठक से लेकर जिला कलेक्टरों और चुनाव आयोग तक निशाना

तारीख़ पांच दिसंबर. मतदान हुए अब तक पांच रोज निकल गए हैं और नतीज़े आने में छह दिन का वक़्त बकाया है. यानी दोनों तिथियाें के बीच पड़ने वाली तारीख़. इस अहम मोड़ पर मध्य प्रदेश की कार्यवाहक शिवराज सिंह चौहान सरकार मंत्रिमंडल की बैठक आयोजित करती है. वह भी चुनाव आचार संहिता प्रभावी होने के बावज़ूद. जबकि ऐसा करने के पीछे उसकी मंशा पर सवाल उठ सकते थे, जो उठे भी. बैठक में नीतिगत फ़ैसला कोई हो नहीं सकता था, हुआ भी नहीं. सिर्फ कुछ पुरानी योजनाओं/आदेशों की समीक्षा आदि ही हुई.

इसके बाद मुख्यमंत्री आवास पर हुई पत्रकार वार्ता के दौरान पहले राज्य सरकार के मंत्री और प्रवक्ता नराेत्तम मिश्रा मीडिया के सामने आते हैं. संक्षेप में फ़ैसलों की जानकारी देते हैं. फिर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की आमद होती है और इस तरह मंत्रिमंडल की बैठक बुलाने के सवाल पर कहते हैं, ‘आचार संहिता के नाम पर हम प्रदेश की जनता को भगवान भरोसे नहीं छाेड़ सकते. सरकार ने पुराने आदेशों/कार्यक्रमों की समीक्षा कर अपना कर्तव्य पूरा किया है. आगे भी करते रहेंगे. रही बात चुनाव परिणाम की तो जब आएगा, तब देखेंगे.’

एक अन्य सवाल के ज़वाब में शिवराज ज़ोर देते हैं, ‘किसानाें के हित के मामले में हमने न कोई कमी छोड़ी है और न ही छोड़ेंगे. अगली सरकार बनने के बाद उन्हें होने वाली नुक़सान की पूरी भरपाई कर देंगे.’ यहां बताते चलें कि मालवा क्षेत्र से फिर ऐसी ख़बरें आ रही हैं कि किसानों को प्याज और लहसुन की उपज लागत से बेहद कम दाम (50 पैसे प्रति किलोग्राम तक) पर बेचनी पड़ रही है. सवाल इसी से संबंधित था. इसके ज़वाब में शिवराज ने यह भी जोड़ा कि इस मामले में ‘सरकार कोई भी फ़ैसला चुनाव परिणाम के बाद ही ले सकती है.’

ऐसे में सवाल उठता है कि फिर मंत्रिमंडल की बैठक क्यों बुलाई गई? जानकारों की मानें तो इससे शिवराज सिंह चाैहान ख़ास तौर पर सरकारी मशीनरी को यह संदेश देना चाहते थे कि उनकी सरकार है और आगे भी बनी रहने वाली है.

इससे पहले शिवराज कुर्सी संभालते ही बोले, ‘कांग्रेस पार्टी चुनाव में आसन्न हार से डर गई है. इसीलिए वह इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) में गड़बड़ी-छेड़छाड़ का अनर्गल प्रलाप कर रही है. ताकि ईवीएम पर ठीकरा फोड़ सके. उसे पुलिस, कर्मचारी, चुनाव आयोग, किसी पर भरोसा नहीं. उसके ऐसे लोग स्ट्रॉन्ग रूम में घुस रहे हैं, जो प्रत्याशी नहीं हैं (भोजपुर विधानसभा क्षेत्र के कांग्रेस उम्मीदवार, पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी को भोपाल के स्ट्रॉन्ग रूम में जाने की इजाज़त देने का मामला). सोशल मीडिया पर झूठी ख़बरें फैलाई जा रही हैं. चुनाव आयोग को यह देखना चाहिए.’ लेकिन इस दौरान जब मुख्यमंत्री से सवाल किया गया कि भाजपा इसकी शिकायत क्यों नहीं करती? तो वे बोले, ‘हमें चुनाव आयोग पर पूरा भरोसा है.’

फिर शिवराज को ध्यान दिलाया गया कि पुलिस मुख्यालय में होमगार्ड की कैंटीन में क़रीब 76 डाक मतपत्र खुले पड़े मिले हैं? इस पर उनका कहना था, ‘यह देखना चुनाव आयोग का काम है. वही देखेगा’ अलबत्ता आयोग के वाबस्ता शिवराज अपनी ‘पीड़ा’ साझा करने से क़तई नहीं चूके. उनका कहना था, ‘कांग्रेस चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर अंगुली उठाती है. लेकिन आयोग ने इस बार हमारे साथ तो ‘अमानवीय’ व्यवहार किया है. मुझे ही अपने एक दिवंगत मित्र के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए (सीहोर से) पड़ोस में ही विदिशा जाना था. पर मुझे इजाज़त नहीं दी गई क्योंकि तब चुनाव प्रचार थम चुका था और मतदान हुआ नहीं था. इसके बावज़ूद हमने कोई शिकायत नहीं की.’

चुनाव आयोग को लेकर शिवराज की इन बातों के संदर्भ में उल्लेखनीय वह धारणा है जो बीते कुछ समय में प्रदेश के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी वीएल कांताराव के बारे में धारणा बनी है. वह ये कि वे कांग्रेस की शिकायतों पर ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं. जानकारों के मुताबिक इसीलिए मुख्यमंत्री उन्हें संभवत: अपने अंदाज़ में संकेत देना चाह रहे थे, जो उन्होंने दिया भी.

पत्रकार वार्ता के दौरान ही मुख्यमंत्री को बताया गया कि सतना में स्ट्रॉन्ग रूम की दीवार टूटने का मामला सामने आया है. खुरई विधानसभा क्षेत्र की ईवीएम सागर के स्ट्रॉन्ग रूम में दो दिन बाद जमा कराई गई हैं. ऐसी और ख़बरें भी हैं? इस पर शिवराज बोले, ‘ईवीएम में किसी तरह की छेड़छाड़ संभव नहीं है. मीडिया है, सोशल मीडिया है, निगरानी तंत्र है. इस सबके रहते अगर ईवीएम में छेड़छाड़ हो पाती तो क्या दिल्ली, बिहार, कर्नाटक जैसे राज्यों के चुनाव नतीज़े वैसे आते जैसे आए हैं? इसके बावज़ूद अगर किन्हीं जिलों से शिकायतें आ रही हैं तो वहां के कलेक्टर देखें. उन्हें अपना काम ईमानदारी और ज़िम्मेदारी से करना चाहिए. हमें उन पर पूरा भरोसा है.’

मुख्यमंत्री ने भले ही कह दिया हो, लेकिन लगता नहीं कि भाजपा को कलेक्टरों पर पूरा भरोसा है. ख़बरों के मुताबिक भाजपा से जुड़े कानूनविद् शांतिलाल लोढ़ा की अगुवाई में पार्टी का प्रतिनिधिमंडल मुख्य निर्वाचन अधिकारी कांताराव से मिला है. इस मुलाकात के दौरान रीवा, सतना, सागर, भोपाल जैसे जिलों के कलेक्टरों की सीधी शिकायत की गई है. इन पर कार्रवाई की मांग की गई है. ये तक कहा गया है कि कलेक्टरों के आचरण की वज़ह से भाजपा की छवि ख़राब हो रही है, क्योंकि वह कार्यवाहक सरकार चला रही है.

जानकार मानते हैं कि इस तरह शिवराज के साथ-साथ भाजपा भी जिला कलेक्टरों को साफ संकेत देने की कोशिश कर रही है कि उनके आचरण पर नज़दीकी नज़र रखी जा रही है.

कांग्रेस : स्ट्रॉन्ग रूमों की पहरेदारी में रतजगा और अधिकारियों को चेतावनी भी

कांग्रेस का भी यही हाल है. वह हर छोटे-बड़े मामले को लेकर चुनाव आयोग का दरवाज़ा खटखटा रही है. प्रदेश में मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कांताराव के पास तो कांग्रेस की शिकायतों/ज्ञापनों का जैसे अंबार लग गया है. इसका प्रमाण ये है कि मतदान के दिन सिर्फ़ ईवीएम में ख़राबी के मामले में ही कांग्रेस ने 150 से ज़्यादा शिकायतें (यह पार्टी प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने ख़ुद माना है) कांताराव के पास दर्ज़ कराई थीं.

इसके साथ चुनाव आयोग तक भी पार्टी अपनी चिंताएं पहुंचा रही है. ताज़ा ख़बर ये है कि मंगलवार को ही पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल के नेतृत्व में पार्टी के एक प्रतिनिधिमंडल ने नए मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा से मुलाकात की है. इस प्रतिनिधिमंडल में मध्य प्रदेश से ताल्लुक़ रखने वाले वरिष्ठ वकील और राज्य सभा सदस्य विवेक तनखा तथा कमलनाथ भी शामिल थे.

बताया जाता है कि कांग्रेस के इस प्रतिनिधिमंडल ने आयोग से मांग की है कि जिन अधिकारियों के बारे में शिकायतें मिल रही हैं उन्हें मतगणना ड्यूटी से हटाया जाए. ईवीएम की सुरक्षा का विशेष इंतज़ाम किया जाए. जिन जिलों में ईवीएम या स्ट्रॉन्ग रूमों के बारे में शिकायतें आई हैं उनके कलेक्टरों से जवाब तलब किया जाए. उन पर भी उचित कार्रवाई की जाए.

सिर्फ इतना ही नहीं. जानकारी यह भी है कि कांग्रेस के प्रवक्ता अमिताभ गुप्ता ने जबलपुर उच्च न्यायालय में एक याचिका भी दायर की है. इसमें मांग की गई है कि सभी जगहों पर मतगणना के दौरान ईवीएम के वोटों का वीवीपीएटी (मतदाता पर्चियों) से मिलान किया जाए. इसके बाद ही नतीज़े घोषित किए जाएं. इस याचिका पर गुरुवार को सुनवाई होने की संभावना है.

इसके अलावा प्रदेश भर में ईवीएम रखने के लिए बनाए स्ट्रॉन्ग रूमों में कांग्रेस प्रत्याशियों/कार्यकर्ताओं के रात-रात भर जागकर पहरेदारी करने की ख़बरें भी लगातार आ रही हैं. इस रतजगे का परिणाम ही है कि स्ट्रॉन्ग रूमों में होने वाली हर असामान्य हलचल सोशल मीडिया के ज़रिए आम लोगाें तक पहुंच रही है. इंटरनेट की भाषा में कहें तो वायरल हो रही है.

इसी संदर्भ में एक और बात ये कि 28 नवंबर की शाम जब कमलनाथ मीडिया से बात कर रहे थे तो उनके सामने एक सवाल आया था. उनसे पूछा गया था कि क्या ईवीएम सुरक्षा और मतगणना आदि के विषय में आप सरकारी मशीनरी की निष्पक्षता को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं? तो इस पर कमलनाथ ने जो कहा वह ग़ौर करने लायक है. उनका कहना था, ‘हमें सरकारी मशीनरी पर पूरा भरोसा है. फिर भी अगर कोई अफ़सर गड़बड़ी करता है तो उसे याद रखना चाहिए कि 11 (दिसंबर जब नतीज़े आने हैं) के बाद 12 तारीख़ भी आएगी.’

इन संकेतों से एक बात का स्पष्ट अनुमान होता है कि कांग्रेस और भाजपा में से किसी को अपनी जीत का शायद पूरा-पूरा भरोसा नहीं है. यही वज़ह है कि जब शिवराज और कमलनाथ से पत्रकारों ने उनकी पार्टियों को मिलने वाली अनुमानित सीटों की संख्या जाननी चाही तो दोनों के ज़वाब कमोबेश एक जैसे थे, ‘हम अच्छी संख्या में सीटें जीत रहे हैं.’ नतीज़े को लेकर यह अनिश्चितता ही संभवत: वह कारण है जो दोनों दलों को चुनाव आयोग और सरकारी मशीनरी पर दबाव बनाने के लिए मज़बूर भी कर रहा है.