फ्रांस की 51 वर्षीय ज़क्लीन मुरौ तीन बच्चों की मां हैं. वे अपने आप को एक ‘आम फ्रांसीसी महिला’ बताती हैं. एक ऐसी महिला जो हर महीने अपने बैंक-खाते में जमा से अधिक पैसा निकालती है. एक डीज़ल कार के सिवाय जिसके पास और कुछ नहीं है. सम्मोहनविद्या (हिप्नोसिस) द्वारा लोगों को ठीक करना जिसका पेशा है. लेकिन, ज़क्लीन मुरौ इस बीच टेलीविज़न चैनलों के ‘टॉक-शो’ (गपशप कार्यक्रमों) की चहेती मेहमान भी बन गयी हैं.

हुआ यह कि पिछले अक्टूबर महीने के मध्य में ज़क्लीन मुरौ ने फ्रांस के राष्ट्रपति को संबोधित एक वीडियो क्लिप बनाई. दसियों लाख लोग उसे इंटरनेट पर देख चुके हैं. इस वीडियो में वे राष्ट्रपति इमानुएल मैक्रों से पूछती हैं, ‘आप फ्रांसीसीयों के पैसे से आर करते क्या हैं... आप तो फ्रांसीसी कारवालों के पीछे ही पड़ गये हैं...पेट्रोल-डीज़ल मंहगा करते जा रहे हैं. सब जगह राडार-फ़न्दा लगा रखा है... ज़ुर्माने वसूल कर रहे हैं... फ्रांस जा कहां रहा है, श्रीमान मैक्रों?’

वीडियो ने प्रदर्शनों के लिए प्रेरित किया

इस सुपरहिट वीडियो ने ज़क्लीन मुरौ को फ्रांस में मशहूर कर दिया. कहा जाता है कि इस वीडियो ने असंतुष्ट फ्रांसीसियों को पीले रंग की जैकेट पहन कर हर शनिवार को सड़कों पर उतरने और अपना गुस्सा उतारने के लिए प्रेरित भी किया. शनिवार 17 नवंबर ‘पीली जैकेट’ (ज़िले ज़ौन) कहलाने वाले इन सरकार-विरोधी प्रदर्शनकारियों के हिंसापूर्ण गुस्से के उबाल का पहला दिन था.

तब से हर नये शनिवार के साथ पेरिस ही नहीं, फ्रांस के अन्य शहरों की सड़कों पर भी जम कर आगज़नी, तोड़फोड़, पथराव और पुलिस के साथ टकराव की भयंकरता लगातार बढ़ती ही गयी. सैकड़ों कारें, दर्जनों दुकानें और कंपनियों के शोरूम फूंक दिये गये. प्रथम विश्वयुद्ध के शहीदों के स्मारक ‘आर्क दे ट्रियोम्फ़’ को भी क्षतिग्रस्त कर दिया गया. नयी दिल्ली का इंडिया गेट पेरिस के इसी शहीद-स्मारक के नमूने पर बना है.

मानो फ्रांस में गृहयुद्ध छिड़ गया है

प्रदर्शनकारी कई बार इतने बर्बर, उन्मत्त और मरने-मारने पर उतारू लगे, मानो फ्रांस में कोई गृहयुद्ध छिड़ गया है और वे अपने कट्टर शत्रुओं से लड़ रहे हैं. उनके कुछ प्रवक्ता कह भी चुके हैं कि सरकार यदि झुकी नहीं, तो वे गृहयुद्ध के लिए भी तैयार हैं! सरकार ने दो ही सप्ताहों में घुटने टेक दिये. शनिवार एक दिसंबर के तीसरे भारी दंगों के बाद, सोमवार तीन दिसंबर की शाम, राष्ट्रपति मैक्रों ने मंत्रिमंडल की आकस्मिक बैठक बुलाई. बैठक में जनता को शांत करने के लिए तुरंत राहत देने का निर्णय किया गया.

अगले दिन, मंगलवार चार दिसंबर को, प्रधानमंत्री एदुआर्द फ़िलिप ने पेट्रोल-डीज़ल पर पहली जनवरी से लगने जा रहे ‘पर्यावरण कर’ को छह महीनों के लिए स्थगित करते हुए कहा, ‘कोई कर इतना मूल्यवान नहीं हो सकता कि देश की एकता संकट में पड़ जाये.’ सर्दियों वाले महीनों में बिजली और गैस की दरें भी नहीं बढ़ाई जायेंगी. अगले दिनों में कुछ और क़दमों की घोषणा होगी. प्रधानमंत्री फ़िलिप ने इस बात पर दुख व्यक्त किया कि हिंसक प्रदर्शनों ने चार लोगों की बलि ले ली और 260 लोग घायल हुए.

प्रधानमंत्री से मिले, तो ख़ैरियत नहीं!

अब देखना यह है कि हिंसा के लिए उन्मत्त पीली जैकेट वाले प्रदर्शनकारी शांत हो जायेंगे या सरकार को नीचा दिखाने में सफल होने से उत्साहित हो कर और अधिक ऊधम मचायेंगे. लक्षण यही हैं कि वे सरकार को अभी और झुकाना चाहते हैं. उनके आठ में से दो प्रवक्ताओं को चार दिसंबर को ही प्रधानमंत्री फ़िलिप से मिलना था, पर वे नहीं आये. कारण यह बताया कि उनके साथ के उग्रवादियों ने उन्हें धमकी दी है कि वे यदि प्रधानमंत्री से मिलने गये, तो उनकी ख़ैरियत नहीं है.

इससे यही संकेत मिलता है कि प्रदर्शनकारियों का उग्र धड़ा तोडफोड़, लूटमार और दंगा-फ़साद करने में ही दिलचस्पी रखता है, न कि किसी समाधान पर पहुंचने में. सभी करों में कटौती तथा न्यूनतम वेतन और पेंशनें बढ़ाने की अपनी मांग को वह नए दंगों का बहाना बना सकता है. प्रधानमंत्री फ़िलिप ने यह कहते हुए अन्य करों में कटौती करने से मना कर दिया कि ‘यदि कर राजस्व को घटाया गया, तो सार्वजनिक व्यय को भी घटाना पड़ेगा. हम करों में कटौती द्वारा अपने बच्चों पर ऋण का बोझ बढ़ाना नहीं चाहते.’

सरकार से सभी नाराज़

सच्चाई यह भी है कि जो फ्रांसीसी पीली जैकेटों वाले हिंसक प्रदर्शनकारियों का समर्थन नहीं करते, वे भी राष्ट्रपति मैक्रों की सरकार द्वारा नये साल के साथ पेट्रोल पर 2.9 यूरो-सेन्ट (क़रीब ढाई रुपए) और डीज़ल पर 6.5 यूरो-सेन्ट (क़रीब पौने छह रुपये) प्रति लीटर ‘पर्यावरण कर’ लगा देने के निर्णय से क्षुब्ध थे. सरकार इस कर द्वारा डीज़ल और पेट्रोल की खपत घटाते हुए कार्बन और नाइट्रोजन के तापमानवर्धक ऑक्साइडों के उत्सर्जन में कमी लाने की आशा कर रही थी. लेकिन, लोगों ने इसे पिछले दरवाज़े से डीज़ल-पेट्रोल को मंहगा करने की सरकारी चाल माना. विरोध की आग फ्रांस के छोटे-छोटे शहरों से उठी और बड़ी तेज़ी से राजधानी पेरिस जैसे बड़े-बड़े शहरों को भी झुलसाने लगी.

कुछ ही दिनों में पूरे देश में क़रीब तीन लाख प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर गये. वे फ्रांसीसी समाज के हर तबके, हर राजनैतिक विचारधारा और हर आयुवर्ग के हैं. उनका न कोई नेता है और न कोई राजनैतिक पार्टी या श्रमिक संगठन उनके पीछे है. वे ट्विटर और फ़ेसबुक जैसे सोशल मीडिया के द्वारा भीड़ जुटाते हैं. सरकार के प्रति रोष और क्रोध उग्र दक्षिणपंथियों से से लेकर उग्र वामपंथियों तक सब को एकजुट करता है. ऐसे में सरकार भी समझ नहीं पा रही है कि वह किससे बात करे और किससे नहीं.

आंख मूंद कर तोड़फोड़

राष्ट्रपति इमानुएल मैक्रों 21 दिसंबर को 41 वर्ष के हो जायेंगे. कहा जा सकता है कि फ्रांस के अब तक के इस सबसे युवा राष्ट्रपति की घरेलू नीतियों के प्रति अपनी भड़ास को उड़ेलने के लिए ही ऐसे-ऐसे लोग सड़कों पर एकसाथ हो गये हैं, जिनके बीच पीले रंग की जैकेट के सिवाय और कोई समानता नहीं है. ऐसी जैकेटें चेतावनी के तौर पर अन्यथा वे श्रमिक पहनते हैं, जो सड़कों या रेलमार्गों पर मरम्मत आदि का काम करते हैं. प्रदर्शनकारियों में वे भी शामिल हैं. पर, कोई मरम्मत करने के लिए नहीं, आंख मूंद कर तोड़फोड़ मचाने के लिए. उनका मानना है कि उनका राष्ट्रपति उनका नहीं, अमीरों ओर पूंजीपतियों का प्रतिनिधि है. वह उनके लिए नहीं, देश के ‘विशिष्टजनों’ (एलीट) के लिए हितकारी नीतियां बनाता है.

फ्रांस को अच्छी तरह जानने वाले प्रेक्षक भी कहते हैं कि वहां ग़रीबी-अमीरी जैसी सामाजिक असमानता और बेरोज़गारी की समस्या पहले भी कुछ कम नहीं थी. समाज 2017 के चुनाव के समय ही इतना अधिक विभाजित हो चुका था कि लोकलुभावन बातें करने वाली घोर-दक्षिणपंथी मरीन ले पेन, स्वयं को पिछड़ों और वंचितों का पैरोकार बताते हुए, चुनाव के अंतिम दौर तक पहुंचने में सफल रहीं. मैक्रों अंततः चुनाव जीत कर राष्ट्रपति बने ज़रूर, पर जनता के एक बहुत बड़े हिस्से के वोट से वंचित रहे. उन्हें जिस ‘विशिष्ट वर्ग’ का समर्थन मिला, उसका हितसाधन करना आज उनकी विवशता भी है.

करदाता पर बोझ ही बोझ

दूसरी ओर, यह भी सच है कि फ्रांस में लोगों को अपनी आय से करों तथा स्वास्थ्य, पेंशन और बेरोज़गारी जैसी सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्थाओं के लिए काफ़ी अधिक पैसा देना पड़ता है. मक़ानों के किराये भी बहुत महंगे हैं. स्थिति यह है कि फ्रांसीसी अपनी आय में से हर साल 10 खरब यूरो (1 यूरो=80 रुपये) से अधिक पैसा करों और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के लिए देते हैं.

10 खरब यूरो फ्रांस के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 45 प्रतिशत के बराबर है. ‘आर्थिक सहयोग और विकास संगठन’ (ओईसीडी) के सभी 36 सदस्य देशों में डेनमार्क अकेला ऐसा देश है, जो अपने नागरिकों से फ्रांंस की अपेक्षा अधिक पैसा वसूल करता है. इसलिए फ्रांसीसीयों को यदि लगता है कि रहने-जीने के लिए उनके पास निरंतर कम पैसा बच रहा है, तो यह स्वाभाविक ही है.

‘श्रीमान मैक्रों, अब और नहीं सहा जा रहा’

यही शिकायत बीते एक दिसंबर को प्रदर्शन कर रही दक्षिणी फ्रांस की एक महिला की भी थी. उसने पत्रकारों से कहा कि वह एक सुपर बाज़ार के कैश-काउन्टर पर बैठती है. महीने में 1,500 यूरो वेतन मिलता है. उसमें से 550 यूरो मकान के किराये की भेंट चढ़ जाता है. खाना-पीना और बाक़ी सारे ख़र्चे बचे हुए पैसे से पूरा करना असंभव हो जाता है. ‘श्रीमान मैक्रों, अब और नहीं सहा जा रहा,’ उसने चीखते हुए कहा. आस-पास खड़े प्रदर्शनकारियों ने नारा लगाया, ‘ला रेवोलुश्यों अं मार्श’ (क्रांति चल पड़ी है). यह राष्ट्रपति मैक्रों पर एक कटाक्ष था. उनकी पार्टी का नाम है ‘ला रेपुब्लीक़ अं मार्श’ (देश चल पड़ा है). क्रांति तो ख़ैर नहीं चल रही है, पर इस समय की अशांति भी किसी क्रांति से कम डरावनी नहीं है.

राष्ट्रपति मैक्रों ने डेढ़ साल के अब तक के अपने शासन में फ्रांस की अर्थव्यवस्था और श्रमबाजा़र को सुधारों द्वारा पटरी पर लाने का भरसक प्रयास किया है, लेकिन उनके सुधारों से संतोष कम, असंतोष अधिक फैला है. अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं आ पा रही है. इसीलिए उन्हें करों में वृद्धि की शरण लेनी पड़ी. ऐसा करते ही ‘सिर मुंडाते ही ओले पड़े’ वाली कहावत की तर्ज़ पर उनके विरुद्ध प्रदर्शनों की झड़ी लग गई.

आक्रोश बम की तरह फूट पड़ा

जानकारों का कहना है कि मकानों के किराए बहुत महंगे हो जाने से फ्रांस के अधिकतर श्रमिक और दफ्तरों में काम करने वाले कर्मचारी शहरों के उपनगरों, दूर-दराज़ की बस्तियों या ग्रामीण अंचलों में रहते हैं. हर दिन कार से आना-जाना आजीविका कमाने की उनकी अनिवार्यता है. इसीलिए सरकार द्वारा ‘पर्यावरण कर’ बता तक पेट्रोल-डीज़ल पर कर बढ़ाते ही उनका आक्रोश किसी बम की तरह फूट पड़ा. विस्फोट इतना प्रचंड था कि प्रदर्शनों के पहले दो सप्ताहों में ही 412 लोगों को गिरफ्तार करना पड़ा.

भारतीयों की तरह ही फ्रांसीसी भी हड़तालों-प्रदर्शनों के शौकीन और उनकी सफलता प्रमाणित करने के लिए तोड़फोड़ के आदी हैं. उनके किसी आक्रोश का इतना बड़ा विस्फोट इससे पहले पूर्व राष्ट्रपति निकोला सार्कोज़ी के शासनकाल में 2010 में देखने में आया था, हालांकि उस समय इसकी तीव्रता इस बार से कम ही थी. उस समय की सरकार ने सुधारों के नाम पर पेंशनों के साथ छेड़छाड़ करने का दुस्साहस किया था.

शनिवार एक दिसंबर वाले तीसरे प्रदर्शनों के समय वर्तमान राष्ट्रपति इमानुएल मैक्रों जी20 के शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए अर्जेन्टीना की राजधानी बुएनोस आइरेस या ब्यूनस आयर्स में थे. वहां अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा, ‘विरोध की आवाज़ को मैं सदा स्वीकार करूंगा. विपक्ष की बात को मैं सदा सुनूंगा. लेकिन, हिंसा को मैं कभी स्वीकार नहीं कर सकता.’

अहिंसक की कोई नहीं सुनता

कहने को समय संसार के सभी नेता यही कहते हैं. लेकिन वे किसी की सुनते या घुटने तभी टेकते हैं, जब हिंसा की पराकाष्ठा होने लगती है. अहिंसक की कोई नहीं सुनता. उसे मीडिया भी घास नहीं डालता. मैक्रों ने भी कर वापस लेते हुए घुटने तभी टेके, जब उन्हें लगा कि हिंसा की अब पराकाष्ठा होने लगी है.

ताजा समाचार यह है कि पीली जैकेट वाले अपने प्रदर्शन जारी रखेंगे. उनकी देखादेखी अब फ्रांस के किसान भी सड़कों पर उतरेंगे. फ्रांस के स्कूली बच्चे भी अपने लिए बेहतर सुविधाओं की मांग करेंगे. मई 2019 में यूरोपीय संसद के चुनाव हैं. राष्ट्रपति मैक्रों और उनकी पार्टी ‘ला रेपुब्लीक़ अं मार्श’’ (देश चल पड़ा है) के हाथ-पैर फूलने लगे हैं. देश सचमुच चल पड़ा है – उन से परे!