भारतीय प्रबंध संस्थानों (आईआईएम) के निदेशकों की नियुक्ति के नए मापदंड तय कर दिए गए हैं. द इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि इसी सप्ताह आईआईएम अधिनियम के तहत नए मापदंडाें के बाबत अधिसूचना जारी की गई है. हालांकि इसके साथ ही एक नई बहस भी शुरू हो गई है.

अख़बार के मुताबिक नए मापदंडों के तहत अब भारतीय प्रबंध संस्थानों का निदेशक बनने के लिए शैक्षणिक योग्यता संबंधी कोई बाध्यता नहीं होग, न ही पीएचडी डिग्रीधारक होने की अनिवार्यता. अब कारोबारी समूहों के बड़े पदाधिकारी भी इस पद सीधे नियुक्ति पा सकेंगे. बस उनके पास वरिष्ठ प्रबंधकीय पदों पर काम करने का कम से कम 15 साल का अनुभव होना चाहिए. जबकि बीते एक दशक से इस पद पर नियुक्ति का पात्र उसे ही माना जाता था जिसके पास पीएचडी डिग्री हो और प्रबंध संस्थानों में पढ़ाने का अनुभव भी.

केंद्रीय उच्च शिक्षा सचिव आर सुब्रमण्यम इस बदलाव की पुष्टि करते हुए इसे सही भी ठहराते हैं. उनके मुताबिक, ‘ये प्रबंध संस्थान हैं. यहां युवाओं को प्रबंधकीय भूमिकाओं के लिए तैयार किया जाता है. ऐसे में बड़े कारोबारी समूहों में कार्यकारी या प्रबंध निदेशक जैसे पदों पर रह चुके लोग इन संस्थानों में अहम भूमिका निभा सकते हैं. इसके साथ ध्यान रखने की बात यह भी है कि कई बड़े कारोबारी घराने उन लोगों ने स्थापित किए हैं, जिनके पास अकादमिक डिग्रियां या शैक्षणिक योग्यता बहुत सीमित ही थी.’

इस फ़ैसले के पक्ष में एक दलील यह भी है कि पहले भी कारोबारी घरानाें में काम कर चुके बड़े पदाधिकारी भारतीय प्रबंध संस्थानों के निदेशक रह चुके हैं. इनमें रवि जे मथाई और सुबीर चौधरी का नाम लिया जाता है. मथाई 1965 में आईआईएम-अहमदाबाद के पूर्णकालिक निदेशक हुआ करते थे. जबकि चौधरी 1990 के दशक में आईआईएम-कलकत्ता के निदेशक थे. हालांकि इन बदलावाें और उनके पक्ष में दी जा रही दलीलाें से भारतीय प्रबंध संस्थानों से जुड़े कई लोग ही इत्तिफ़ाक़ नहीं रखते हैं.

असहमति जताने वाले एक आईआईएम निदेशक नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘जो उदाहरण दिए जा रहे हैं वे बहुत पुराने हैं. उस वक़्त आईआईएम शैशव अवस्था में थे. निदेशक जैसे पदों के लिए प्रतिभाओं की भी कमी थी. उस वक़्त की चीजों की तुलना आज के दौर से नहीं की जा सकती.’ आईआईएम-बेंगलुरु के जी रघुराम भी कहते हैं, ‘कारोबारी क्षेत्र में काम करने का अनुभव अतिरिक्त योग्यता ज़रूर हो सकता है. पर निदेशक पद के लिए प्राथमिकता तो शैक्षणिक योग्यता को ही दी जानी चाहिए.’