राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की सहयोगी संस्था स्वदेशी जागरण मंच की ओर से इन दिनों संकल्प रथ यात्रा का आयोजन किया जा रहा है. नौ दिनों की यह यात्रा दो दिसंबर को दिल्ली के झंडेवालान मंदिर से शुरू हुई. नई दिल्ली के झंडेवालान में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्यालय केशव कुंज है. दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों से होते हुए यह यात्रा नौ दिसंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान पहुंचेगी. इस मौके पर संघ और उसके सहयोगी संगठन भारी जमावड़े की कोशिश में हैं.

इस यात्रा और नौ दिसंबर की सभा का मकसद स्वदेशी जागरण मंच और संघ की ओर से यह बताया जा रहा है कि इसके जरिए आम लोगों में अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण को लेकर जागरूकता फैलाने की कोशिश हो रही है. इन संगठनों को लगता है कि इस यात्रा के जरिए एक बार फिर से राम मंदिर के मुद्दे पर लोगों को अपने साथ जोड़ा जा सकता है और आने वाले दिनों में इसे फिर से चुनावी मुद्दा बनाया जा सकता है.

राजनीतिक जानकार यह मानते हैं कि स्वदेशी जागरण मंच और संघ के दूसरे सहयोगी संगठन इस यात्रा में केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की प्रेरणा से लगे हुए हैं. इन लोगों को लगता है कि अगर राम मंदिर का मुद्दा प्रभावी ढंग से उठाने में कामयाबी मिलती है तो इसका सीधा लाभ भाजपा को 2019 के लोकसभा चुनावों में मिलेगा.

भाजपा और स्वदेशी जागरण मंच के कई लोगों से बातचीत करने पर पता चलता है कि इन लोगों को इस यात्रा से दो तरह के फायदों की उम्मीद है. पहला फायदा तो उन्हें यह लगता है कि अगर वे राम मंदिर का मुद्दा उठाने में कामयाब रहे तो कांग्रेस समेत दूसरे विपक्षी दल इस मामले पर अलग-थलग पड़ जाएंगे और उन पर इस मसले पर एक स्पष्ट रुख अपनाने का दबाव बढ़ेगा. उन्हें चुनाव प्रचार के दौरान यह कहना पड़ेगा कि वे अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के पक्ष में हैं या नहीं.

इन लोगों को दूसरा फायदा यह लगता है कि अगर राम मंदिर का मुद्दा ठीक से आम लोगों के बीच गर्म हो गया तो इससे कई मोर्चो पर मोदी सरकार की नाकामी भी छिप जाएगी. बेरोजगारी और काला धन जैसे मुद्दों पर भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान बड़ी-बड़ी बातें की थीं. लेकिन सरकार इन दोनों मोर्चों पर कुछ खास नहीं कर पाई है. कृषि की हालत भी नहीं सुधर पाई है. ऐसे में अगर ये मसले चुनावों में प्रभावी ढंग से उठते हैं तो न तो इनका जवाब भाजपा के पास है और न ही संघ और उसके सहयोगी संगठनों के पास. इसलिए संघ समर्थित संगठन इस कोशिश में हैं कि राम मंदिर का मुद्दा उठाकर बाकी मुद्दों को कम प्रभावी बना दिया जाए.

लेकिन अगर संकल्प रथ यात्रा राम मंदिर मुद्दे के आम लोगों के बीच प्रभावी होने का एक पैमाना माना जाए तो भाजपा, संघ और उसके सहयोगी संगठन इस मोर्चे पर नाकाम होते दिख रहे हैं. झंडेवालान मंदिर से जिस दिन यह यात्रा शुरू हुई, उस दिन बमुश्किल 100 लोग ही जुट पाए. इसके बाद यात्रा के आगे के चरणों में संख्या जुटाने पर ध्यान दिया गया लेकिन, भारी संख्या में लोग नहीं जुट पाए. अब पूरी कोशिश इस बात की हो रही है कि नौ दिसंबर को रामलीला मैदान में बड़ी संख्या में लोगों को जमा किया जाए.

इस यात्रा के प्रति आम लोगों की उदासीनता को देखते हुए भाजपा, संघ और संघ के सहयोगी संगठनों में एक दूसरी चर्चा भी शुरू हो गई है. चर्चा यह कि कहीं राम मंदिर का मुद्दा उठाने से अगले लोकसभा चुनावों में भाजपा को फायदा से कहीं अधिक नुकसान न हो जाए. हालांकि, इन संगठनों में एक खेमा ऐसा भी है जो कह रहा है कि लोगों की यह उदासीनता यात्रा के प्रबंधन में रह गई कमी का नतीजा है. इन लोगों का यह भी कहना है कि अगर ठीक से प्रबंधन किया गया होता तो यह यात्रा प्रभावी दिखती.

लोगों की उदासीनता को देखते हुए भाजपा, संघ, स्वदेशी जागरण मंच और संघ के दूसरी सहयोगी संगठनों में यह बात भी चल रही है कि क्या आम लोगों में अब राम मंदिर का मुद्दा उतना प्रभावी नहीं रहा जितना यह 90 के दशक की शुरुआत में था. यह चर्चा भी चल रही है कि इस मुद्दे पर बहुत अधिक जोर देने से कहीं आम लोग यह न समझने लगें कि मोदी सरकार की नाकामियों को छिपाने के लिए इस मुद्दे को फिर से उठाया जा रहा है. इन संगठनों में कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि राम मंदिर के मुद्दे पर राजनीतिक लाभ लेकर खड़ी हुई भाजपा केंद्र की सत्ता में पहले अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में और बाद में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आई, लेकिन राम मंदिर निर्माण को लेकर वह गंभीर प्रयास करती हुई नहीं दिखी.

इस पृष्ठभूमि में इन संगठनों को यह भय सता रहा है कि विपक्ष आम लोगों के बीच राम मंदिर के मुद्दे को ध्यान भटकाने वाले मुद्दे के तौर पर पेश कर सकता है. संघ और उसके सहयोगी संगठनों को इस मसले पर प्रवीण तोगड़िया का भी भय सता रहा है. लंबे समय तक विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष रहे प्रवीण तोगड़िया की पहचान बहुत आक्रामक ढंग से हिंदुत्व के मुद्दों को उठाने वाले नेता की रही है. विश्व हिंदू परिषद से अलग होने पर मजबूर किए जाने के बाद तोगड़िया अलग संगठन बनाकर मोदी सरकार और भाजपा के प्रति राम मुद्दे को लेकर हमलावर हैं. संघ को यह भय भी सता रहा है कि भले ही आम लोगों के बीच तोगड़िया का कोई खास आधार न हो लेकिन, उनकी एक पहचान है और इस नाते वे जो बात बोलेंगे, उससे आम लोगों में एक भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है जिससे भाजपा को नुकसान हो सकता है.

कुल मिलाकर राम मंदिर के मसले पर संघ, भाजपा और संघ के दूसरे सहयोगी संगठन कितना आगे बढ़ेंगे, इसका निर्णय देश में अलग-अलग हिस्सों में इस मुद्दे को लेकर चल रहे प्रयोगों के आधार पर ही होगा. इस नाते संकल्प रथ यात्रा के प्रयोग के प्रभावों का अंतिम आकलन नौ दिसंबर को रामलीला मैदान के जमावड़े के बाद ही स्पष्ट तौर पर हो पाएगा.