लेखक : अभिषेक कपूर, कनिका ढिल्लन

कलाकार : सुशांत सिंह राजपूत, सारा अली खान, नितीश भारद्वाज, अल्का अमीन, निशांत दाहिया, पूजा गौर

रेटिंग : 2/5

‘केदारनाथ’ का केंद्रीय विचार खासा मजबूत था. हिंदुओं के बीच उनके प्रभुत्व वाले शहर में रहने वाले एक गरीब मुस्लिम लड़के को ‘केदारनाथ’ मंदिर के पंडित जी की लड़की से इश्क हो जाता है. इसीलिए, जिस दौर में दोनों धर्मों के बीच आपसी प्यार और भाईचारे को पूरी तरह खत्म करने की कोशिशें लगातार हो रही हैं, उस वक्त के सिनेमा में अनुभव सिन्हा की ‘मुल्क’ के समकक्ष ही ‘केदारनाथ’ भी खड़ी हो सकती थी.

लेकिन ‘केदारनाथ’ की बहुत कुछ खुद में समेटने की चाहत इसके केंद्रीय विचार की धार को भोथरा कर देती है. इसे 2013 में उत्तराखंड में आई खौफनाक बाढ़ की कहानी कहकर एक ‘डिजास्टर मूवी’ भी होना था. इसे सामाजिक ऊंच-नीच के बीच पनपी प्रेम-कथा भी होना था. इसी प्रेम-कथा में लपेटकर ‘टाइटैनिक’ के वृहद स्तर की त्रासद-गाथा भी कहना था. और फिर मौजूदा दौर के सामाजिक परिदृश्य पर सोशल कमेंट्री भी करनी थी.

किसी अनुभवी लेखक के हाथों में ये सारे ही विचार एक खूबसूरत और विचारोत्तेजक पटकथा का हिस्सा बन सकते थे. लेकिन ‘मनमर्जियां’ जैसी गहराई वाली पटकथा लिखने वाली कनिका ढिल्लन इस बार इनमें से कई विचारों को जहीन अंदाज में स्थापित करने के बावजूद आगे चलकर वह जरूरी और अलहदे ‘कॉन्फ्लिक्ट्स’ व ‘रिजॉल्यूशन’ नहीं लिख पाईं जो किसी भी पटकथा को दर्शनीय, मनोरंजक और प्रभावी बनाने के लिए बेहद जरूरी होते हैं. उसकी जगह आलस्य से भरपूर इस फिल्म की लिखाई ने 70-80 के दशक के बॉलीवुड मेलोड्रामा को फिर से उपयोग किया और जो कहानी शुरू में ताजा और नयी लग रही थी, मध्यांतर के बाद बासी और पुरानी हो गई.

पटकथा का यह आलस्य इस कदर फिल्म पर हावी रहा कि मध्यांतर से पहले एक तरह का रियलिज्म गढ़ पाने में कामयाब होने के बावजूद फिल्म अपने दूसरे हिस्से में अथाह फिल्मी हो गई. एक मां अपने ऊपर केरोसिन छिड़ककर जाने वाले को रोकने लगी, एक किरदार पूरी फिल्म में बिंदास और विद्रोही दिखाए जाने के बावजूद शादी के मंडप में छुईमुई हो गया. हाथ की नस काटने वाला क्लीशे भी उपयोग हुआ, और कट्टर हिंदू बाप द्वारा दूसरे धर्म के लड़के से ब्याह करने वाली अपनी बेटी को वैसे ही कोसा गया जैसे कि मेलोड्रामा से भरी पुरानी हिंदी में कोसा जाता रहा है.

दूसरी तरफ, कट्टर हिंदू खलनायक की भूमिका में जंच रहे निशांत दाहिया को भी जल्द ही स्टीरियोटाइप्ड विलेन के रोल में ढाल दिया गया और फिर वे स्थानीय लोगों को मुसलमानों के खिलाफ उकसाने के अलावा बस अपने घरेलू गुंडों संग हीरो को मारते ही नजर आए. शुरुआत में यह किरदार अभिषेक कपूर की ही ‘काय पो छे’ के मानव कौल वाली आभा बिखेर रहा था लेकिन जल्द ही खलनायकी का ठेठ लोमड़ीपन उसमें से गायबकर उसे 70-80 के दशक का लाउड विलेन बना दिया गया.

निर्देशक अभिषेक कपूर एक खास तरह की फिल्ममेकिंग में विश्वास रखने वाले फिल्मकार हैं, जिसमें कि दृश्य रोशनी से बहुत कम जगह ही जगमग रहते हैं. एक अंधेरा है जो हमेशा उनकी फिल्म को घेरे रहता है. साथ ही दूर से किरदारों को शूट ज्यादा किया जाता है और आज की स्टाइलिश फिल्ममेकिंग के टूल्स का उपयोग कम किया जाता है.

‘काय पो छे’ जैसी फिल्म में यह तरीका काफी कारगर सिद्ध हुआ था और ढेर सारा रियलिज्म इस तरीके ने फिल्म को दिया था. लेकिन पहले ‘फितूर’ और अब उसी फिल्म की तरह इंटेंस प्रेम-कहानी कहने वाली ‘केदारनाथ’ में यह बुझे-बुझे से फ्रेम्स और खास अंदाज वाली सिनेमेटोग्राफी के चलते दर्शकों का कहानी से ‘कनेक्ट’ कम होता जाता है. शायद परी-कथाओं जैसी रोशन रूमानी प्रेम-कहानियों को इस तरीके से कहने पर वो रूह को सीधे-सीधे छू नहीं पातीं. और त्रासदी भी कभी-कभार सीधे-साफ चित्रण की मांग करती है ताकि वो आसानी से स्मृति और हृदय में दाखिल हो सके.

‘केदारनाथ’ में प्यार का परवान चढ़ना जरूर रूह को सीधे-सीधे छूता है. मंदाकिनी (सारा अली खान) और मंसूर (सुशांत सिंह राजपूत) के बीच जब मंदाकिनी की कोशिशों की वजह से प्रेम परवान चढ़ता है तब केदारनाथ-रामबाड़ा की खूबसूरती और अमित त्रिवेदी के संगीतबद्ध किए ‘काफिराना’ गीत की टेक लेकर यह मोहब्बत समां बांध देती है! सारा अली खान खासतौर पर इन हिस्सों में खिलती हैं और आगे भी चलकर जब अपने सच्चे प्रेम का सबूत देने के लिए मंसूर को एक गली में खींच लेती हैं तब भी संवाद बोलने के दौरान उनके चेहरे की इंटेन्सिटी बेहद प्रभावित करती है. सारा अली खान को लेकर पिछले कई दिनों से एक पीआर अनुष्ठान हमारे देश में चल रहा था जिसमें कि साक्षात्कारों व सोशल मीडिया द्वारा हमें जबर्दस्ती बताया जा रहा था कि यह स्टार-किड खूबसूरती और अभिनय का बेजोड़ मेल है, और एक के बाद एक साक्षात्कार देखकर लोग-बाग उनकी बुद्धिमता के कायल हो रहे हैं.

‘केदारनाथ’ में केवल यह सिद्ध होता है कि उनमें खूबसूरती और अभिनय का बेजोड़ मेल हो जाने की ‘संभावनाएं’ मौजूद हैं, जो कि आगे चलकर अच्छी फिल्मों का चुनाव करने पर नैचुरल एक्टिंग करने वाली इस अभिनेत्री को भी आलिया भट्ट जैसी साख दे सकती है. हालांकि - और इस हालांकि पर बहुत जोर देने की जरूरत है – उनकी बुद्धिमता कायल तभी करेगी जब वे ‘सिम्बा’ जैसी चूरन मसाला फिल्मों से दूर रहेंगी!

सुशांत सिंह राजपूत ‘केदारनाथ’ में एक शर्मीले पिट्ठू की भूमिका में हैं जो कि मुश्किल के वक्त नायिका के पीछे खड़े होने में कोई शर्म महसूस नहीं करता. लेकिन उनका किरदार अधपका लिखा गया है इसलिए शुरुआत में उन्हें प्रभावी बनाने के बाद शायद लेखक-निर्देशक यह फैसला ही नहीं कर पाए कि उनसे नायकत्व का शो-ऑफ करवाना है या फिर उनकी परिस्थितियों, उनके शर्मीले स्वभाव, बहुसंख्य हिंदुओं के सामने अल्पसंख्यक मुस्लिम होने के अहसास को ही उनसे पोट्रे करवाते चलना है.

इससे हुआ यह है कि रोमांस वाले हिस्सों में तो वे भरपूर शर्मीले किरदार लगे हैं, और पिट्ठू बनकर लोगों को ढोने वाली शारीरिक मेहनत भी खूब करते हैं, लेकिन जब फिल्म के दूसरे हिस्से में उन्हें हीरोइक बनने पर स्क्रिप्ट मजबूर करती है, तब बेहद साधारण, और कभी-कभी अटपटा भी अभिनय करते हैं. ऊपर से उनका घोर शहरी चेहरा फेसबुक से अज्ञात और स्वीटहार्ट जैसे मामूली अंग्रेजी शब्दों को नहीं जानने वाले अपने अनपढ़ कस्बाई किरदार को पूरी तरह ओढ़ नहीं पाता. निर्देशक भी सारा अली खान को डेब्यू के लिए ‘टेलर-मेड’ रोल देने के चक्कर में उनपर मेहनत कम करते हैं, और यह अलग से नजर आता है.

‘केदारनाथ’ के वीएफएक्स में भी वह शक्ति नहीं नजर आई कि 2013 की प्रलय को दोबारा परदे पर रचते समय हमारे रोंगटे खड़े कर सके. स्क्रीन पर अंधेरा हमेशा कुछ ज्यादा ही तारी रहा और बेहद कम दृश्यों में वीएफएक्स ने प्रभावित किया.

एक यह बात भी खली कि ‘मुल्क’ जैसी सजग फिल्म होने का दावा करने के बावजूद ‘केदारनाथ’ के मुस्लिम नायक की आइडेंटिटी को उसके शिव-भक्त होने से ज्यादा जोड़ा गया. एक सीन में जब सारा अली खान उससे कहती हैं कि अपने अल्लाह से दुआ मांगो कि भारत किक्रेट मैच जीत जाए. तब मंसूर जोर डालकर ‘ऊपरवाले’ से प्रार्थना करता है और कैमरा सामने की दीवार पर उकेरे गए भोलेनाथ की तरफ मुड़ जाता है.

मुस्लिम आइडेंटिटी को उसके सही रूप में नहीं दर्शाकर अगर सिर्फ फिल्मी फायदे के लिए हिंदू-मुस्लिम एंगल का उपयोग किया जाएगा तो उसमें और विपरीत छोर पर खड़ीं प्रौपेगेंडा-समर्थित फिल्मों में कोई अंतर नहीं रह जाएगा. छद्म राष्ट्रभक्ति से लेकर स्वच्छता अभियान तक पर बनी फिल्मों और आपमें क्या ही अंतर रहेगा?

‘केदारनाथ’ देखिए, क्योंकि इसमें चारधाम में से एक धाम कहलाए जाने वाले केदारनाथ और उसके आसपास के इलाकों के खूबसूरत विजुअल्स मौजूद हैं. दिल में उतरने वाला ‘नमो नमो’ मौजूद है. साथ ही सारा अली खान के चुलबुले अभिनय का इसको सहारा है और सिर्फ दो घंटे में फिल्म के खत्म हो जाने से आपको बड़ा सहारा होने वाला है.

यानी कि, वन-लाइनर रिव्यूज के इस दौर में हम थियेटर जाकर सीटों व रिक्लाइनरों पर बैठने वाले दर्शकों से एक पंक्ति में कहेंगे - पैर पसारो, देखो-दाखो, घर जाते ही भूलो-भालो!