‘न तो यह एक किताब है. न मैं इसका लेखक. एक किताब में विषयवस्तु का फलक, समझ की जो गहराई और तर्क में जो नवीनता होनी चाहिए, वह इस दस्तावेज में नहीं है. बस एक सीधी-सादी बात को सपाट तरीके से बयान कर दिया गया है.’

पहले चुनावी विश्लेषक और अब किसान नेता के रूप में पहचान बनाने वाले योगेन्द्र यादव ने अपनी इस किताब की भूमिका इन्हीं शब्दों के साथ शुरू की है. इनके जरिए योगेंद्र इस बात संकेत देते हुए दिखते हैं कि वे कृषि संकट को दिखाने के लिए किस तरह सरलता से खेतों की टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों से होकर अपने पाठकों को लेकर चलने वाले हैं. चूंकि, उन्होंने बीते चार वर्षों से देश कई राज्यों के किसानों के साथ वक्त बिताया है, इस लिहाज से किताब के आखिरी पन्ने तक देश में अनवरत जारी कृषि संकट की स्थिति को सामने रखने की कोशिश में वे सफल होते दिखते हैं. इसे किताब में दर्ज उन्हीं के इन शब्दों से समझा जा सकता है.

‘अगर किसान को फसल का दाम नहीं मिलता है तो उसके पीछे न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने की नीति है. अगर इसके बाद भी नहीं मिलता है तो उसके पीछे सरकारी खरीद की नीति है. अगर फसल कम होने के बाद भी फसल के दाम नहीं बढ़ते हैं तो उसके पीछे आयात नीति है.’ इसी तरह वे किसानों की बुरी स्थिति के पीछे की कई कड़ियों को आपस में जोड़ते हुए आखिर में कहते हैं, ‘किसान आत्महत्या करता है, लेकिन उस आत्महत्या को अदृश्य बनाने और उसके बार-बार होने के पीछे कृषि नीति की असफलता है.’ वहीं, लेखक ने इस असफलता की जड़ को राजनीति से जुड़ा हुआ पाया है, जहां वोट बैंक की राजनीति की वजह से किसानों पर उपभोक्ताओं को वरीयता दी जाती है.


किताब : मोदीराज में किसान : डबल आमद या डबल आफत?

लेखक : योगेन्द्र यादव

प्रकाशक : स्वराज अभियान प्रकाशन

कीमत : 80 रुपये

(इस पुस्तक का कोई कॉपीराइट नहीं है. इसमें प्रकाशित सामग्री का शैक्षणिक और गैर-व्यावसायिक उद्देश्य के लिए बिना इजाजत इस्तेमाल किया जा सकता है)


इस पुस्तक की भूमिका में ही लेखक ने साफ कर दिया है कि इस पुस्तक की शुरुआत एक लंबे लेख से हुई थी. इसकी झलक सभी आठ अध्यायों में दिखने को मिलती है. इनमें मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान चुनावी वादों, सरकारी दावों, साल 2022 तक किसानों की दोगुनी आमदनी और कृषि नीति की आंकड़ों के साथ विस्तार से चर्चा की गई है. साथ ही, इस सवाल का जवाब देने की भी कोशिश की गई है कि मौजूदा कृषि संकट के लिए मोदी सरकार ही जिम्मेदार क्यों हैं? हालांकि, लेखक ने पिछली सरकारों को भी इसके लिए जिम्मेदारी ठहराया है. इस बारे में वे लिखते हैं, ‘पिछली सारी सरकारों ने एक भले-चंगे किसान को इतना बीमार कर दिया कि उसे अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. मोदी सरकार ने केवल पांच साल में इस मरीज की यह हालत कर दी कि उसे आईसीयू में भर्ती करना पड़ा.’

दूसरी ओर मोदी सरकार अब किसानों की स्थिति सुधारने के नाम पर इनकी आय को दोगुना करने का राग आलापती दिख रही है. वहीं, इस पुस्तक में इसे ‘मृग मरीचिका’ करार दिया गया है. इसे लेखक सरल भाषा में समझाने की कोशिश भी करते हैं. ‘डबल आमदनी का माजरा क्या है?’ नाम के अध्याय में वे लिखते हैं, ‘जो मजदूर आज से दस साल पहले 150 रुपये दिहाड़ी पाता था, वो आज अगर 300 रुपये दिहाड़ी लेता है तो कागज में उसकी आमदनी दोगुनी हो गई. लेकिन महंगाई के चलते वो आज 300 रुपये में वही चीजें खरीद सकता है, जो 10 साल पहले 150 रुपये में खरीदता था. आमदनी के दोगुना होने का मतलब तो तब हुआ जब, पहले से दोगुना ज्यादा समान और सुविधा खरीदी जा सके. हो सकता है, आज इसके लिए 500 रुपये लगें.’

इस पूरी किताब में ऐसा कहीं नहीं दिखता कि मोदी सरकार को किसान विरोधी बताने के लिए उसके ऊपर केवल कोरे आरोप ही लगाए गए हैं. साथ ही, गलत या भ्रामक तथ्य पेश किए गए हैं. इनकी पुष्टि के लिए ‘कृषि नीति से नफा या नुकसान?’ अध्याय में कई फैसलों और नीतियों का उल्लेख भी किया गया है. इनमें खेती का लागत मूल्य बढ़ाना, किसान विरोधी आयात-निर्यात नीति, मनरेगा योजना का गला घोंटना और भूमि अधिग्रहण कानून को खत्म करने के लिए सरकार पर ‘साजिश’ करने का आरोप लगाया गया है. यह साबित करने के लिए लेखक ने आवश्यकतानुसार सरकारी आंकड़ों का इस्तेमाल भी भरपूर तरीके से किया है.

हालांकि, कई बार ये आंकड़े बोझिल भी लगने लगते हैं. इस बोझिलता को किसानों की कहानियों के जरिए कम किया जा सकता था. चूंकि लेखक पिछले चार वर्ष के दौरान लगातार किसानों की व्यथा कथा दो-चार हुए हैं. इस लिहाज से ऐसा करना उनके लिए अधिक मुश्किल भी नहीं होता. अगर ऐसा होता तो यह पुस्तक आम पाठकों को भी किसानों की तकलीफों के और करीब ले जाने में सफल हो सकती थी. इसकी एक और खामी की बात करें तो इसमें किसानों की खुदकुशी जैसे अहम मुद्दे पर विस्तार से चर्चा नहीं की गई है. बीते दो वर्षों से नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने किसानों की खुदकुशी से जुड़ा कोई आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया है, लेकिन देश के कोन-कोने से इसकी खबरें लगातार आती रहती हैं.

इस पुस्तक में सरकारी नीतियों और फैसलों की केवल आलोचना ही नहीं गई है बल्कि, इनमें सकारात्मक बदलाव का क्रेडिट भी मोदी सरकार को दिया गया है. जैसे; किसी गांव या पंचायत को सूखाग्रस्त घोषित करने के लिए पहले फसल का कम से कम 50 फीसदी नुकसान अनिवार्य माना जाता था. मोदी सरकार में इस सीमा को घटाकर 33 फीसदी कर दिया गया. साथ ही, किसानों को आपदा राहत में दी जाने वाली रकम में मामूली बढ़ोतरी भी की गई. दूसरी ओर, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में पहले से अधिक किस्म के जोखिम और नुकसान को शामिल किया गया. इसके अलावा वर्तमान सरकार के दौरान नुकसान की इकाई तहसील या ब्लॉक से बदलकर गांव करने का फैसला भी यहां तारीफ का हकदार बना है.

योगेन्द्र यादव की यह पुस्तक आम पाठकों को कृषि संकट की बुनियादी और शाश्वत चुनौतियों से सरलता के साथ रूबरू कराती है. साथ ही, दिल्ली और मुंबई के उन लोगों के कुछ सवालों का जवाब भी देती है. जैसे; ये कौन से किसान हैं जो हर दो-तीन महीने पर शहर को जाम करने पहुंच जाते हैं? इनके पास काम नहीं हैं क्या? वहीं, इसके पन्नों से गुजरते हुए यह मोदी सरकार के दौरान कृषि की स्थिति पर रिपोर्ट कार्ड की तरह दिखती तो है लेकिन, इस दायरे में समेटना इसके साथ नाइंसाफी भी हो सकती है. इसके अलग-अलग अध्यायों में जिन समस्याओं का जिक्र किया गया है, वे केवल बीते चार वर्षों की ही उपज नहीं है. इन्हें आजादी के बाद की सभी सरकारों ने कम-अधिक मात्रा में खाद-पानी देकर पाला-पोसा है, इसलिए देश का कृषि संकट आज एक वटवृक्ष की तरह दिखता है. यह वटवृक्ष आज कैसे इतना बड़ा हो गया, यह समझने में यह पुस्तक हर जागरूक नागरिक के लिए मददगार हो सकती है.