इतावली निर्देशक बर्नार्डो बेर्तोलुची की फिल्में देखना आसान नहीं होता. दर्शकों को विचलित करना उनकी फिल्मों का सामान्य स्वभाव रहा है और घोर विवादित हो जाना कई दफा इन फिल्मों की नियति बन चुका है. 26 नवम्बर, 2018 को जब इस 77 वर्षीय ऑस्कर सम्मानित निर्देशक का निधन लंग कैंसर के चलते हुआ, तब कई देसी-विदेशी लेखों द्वारा उनको श्रद्धांजलि दी गई. उनकी सबसे ज्यादा विवादित व सबसे ज्यादा देखी गई फिल्म ‘लास्ट टैंगो इन पेरिस’ (1972) का जिक्र हर किसी ने किया. 1987 में नौ ऑस्कर्स जीतने वाली ‘द लास्ट एम्परर’ की भी चर्चा साथ ही हुई. उनकी शुरुआती फिल्मों ‘बिफोर द रेवल्यूशन’ (1964) और ‘द कन्फॉर्मिस्ट’ (1970) पर भी बात हुई और उनके नास्तिक होने व मार्क्सवादी होने की वजह से फिल्मों पर पड़े प्रभाव की भी विवेचना की गई.

लेकिन, ऐसे मर्सिया पढ़ने को कम ही मिले जिनमें उनकी एक असाधारण फिल्म ‘द ड्रीमर्स’ की चर्चा विस्तार से की गई हो. इटली के सर्वकालिक महान निर्देशकों में गिने जाने वाले बर्नार्डो बेर्तोलुची की फिल्मोग्राफी के स्तर के लिहाज से भले ही ये एक छोटी फिल्म हो, लेकिन ऐसी कमाल फिल्म भी है जो कि दिमाग में बेहद लंबे समय तक अंकित रहती है. कम ही फिल्में होती हैं जो अपने मुख्तलिफ हस्ताक्षर की छाप देखने वालों की स्मृति में बेहद लंबे समय के लिए दर्ज करवा पाती हैं.

‘द ड्रीमर्स’ बेहद विचलित कर देने वाला सिनेमा है जिसमें निर्देशक बर्नार्डो बेर्तोलुची उन हदों को भी तोड़कर आने निकल जाते हैं जिन्हें केवल छूने भर की कोशिश करने में दुनिया के कई डेयरिंग निर्देशकों को पसीना आ जाता. एक बड़ी ऐतिहासिक घटना की पृष्ठभूमि में वे सेक्स, नग्नता व इन्सेस्ट में लिप्त एक इंटिमेट कहानी कहते हैं जिसका जायका केवल पलायनवादी हिंदी सिनेमा की खुराक पर पलने वाला दर्शक शायद नहीं ले पाएगा.

लेकिन अगर आप यूरोपियन सिनेमा से परिचित हैं, सेक्स व नग्नता को सिर्फ और सिर्फ अश्लीलता से जोड़कर नहीं देखते, और अजनबी दुनिया की अनजान फिल्मों के ‘कॉन्टेक्स्ट’ को समझने में रुचि रखते हैं तो ‘द ड्रीमर्स’ आपको जरूर देखनी चाहिए. बर्नार्डो बेर्तोलुची के सिनेमा में सेक्स व नग्नता हमेशा ही स्थायी मोटिफ रहे हैं और इंसानी रिश्तों को टटोलते वक्त वे शर्म-ओ-हया के किसी भी बंधन को मानने से इंकार कर देते हैं. लेकिन उनकी इरोटिक फिल्में हमेशा ही दिलचस्प पृष्ठभूमियों के इर्द-गिर्द बुनी जाती हैं और उस वक्त के सामाजिक-राजनीतिक बदलावों के हिसाब से ही अपने किरदारों को चित्रित करते हुए बेहद निजी, बेहद इंटिमेट कहानियां कहती हैं.

2003 में रिलीज हुई ‘द ड्रीमर्स’ की कहानी फ्रांस में घटे मई, 1968 के ऐतिहासिक घटनाक्रमों के बीच तीन दोस्तों के करीब आने की कहानी है. एक दोस्त अमेरिकी है जो कि फ्रेंच सीखने पेरिस आया है और चूंकि सिनेमा का दीवाना है इसलिए भाई-बहन की उस जोड़ी से मिलता है जो कि इस फिल्म के दूसरे नायक व इकलौती नायिका बनते हैं. पैसे वाले कवि की यह संतानें आदर्शवादी हैं और विचित्र व सिरफिरे होने के बावजूद अमेरिका से आए नायक मैथ्यू को कूल लगते हैं. तीनों जल्द ही साथ रहने लगते हैं और जब सारा पेरिस छात्र व मजदूर आंदोलन की आग में धधक रहा होता है तब उस दौरान एक घर में बंद होकर सिनेमा, सेक्स और पॉलिटिक्स से जुड़ते हैं.

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खुद निर्देशक बर्नार्डो बेर्तोलुची के अनुसार उन्होंने ‘द ड्रीमर्स’ को इन्हीं तीन मुख्य थीम्स पर रचा था – सिनेमा, सेक्स और पॉलिटिक्स. उनके अनुसार यही तीन चीजें 1968 के उस अस्थिर दौर वाले पेरिस को सबसे सटीक तरीके से बयां कर सकती थीं. इसलिए फिल्म में उस दौर की फिल्मों की बातें व कई रेफरेंस मौजूद हैं. दोनों नायक व इकलौती नायिका आपस में पसंदीदा फिल्मों के दृश्य अभिनीत करते हैं और एक-दूसरे से सही फिल्म का अनुमान लगाने को कहते हैं. गलत जवाब देने पर सजा मिलती है और धीरे-धीरे यही उनका दैनिक खेल बन जाता है.

निर्देशक बर्नार्डो बेर्तोलुची इन पुरानी फिल्मों के ब्लैक एंड व्हाइट दृश्यों को अपने रंगीन दृश्यों के बीच चस्पा करते हैं और बेहद खूबसूरत दृश्यावली रचते हैं. 1960 के दशक के न्यू वेव डायरेक्टर्स को ट्रिब्यूट दिया जाता है (खुद बर्नार्डो इसी दौर के फिल्मकार थे!) और सैम फुलर से लेकर निकोलस रे, ज्यां लुक गोदार और चार्ली चैपलिन जैसे कई महारथियों व उनके सिनेमा को फिल्म की पटकथा में सुघड़ता से पिरोया जाता है.

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अब फिल्म की पॉलिटिक्स की बात करते हैं. मई, 1968 की घटनाओं को फ्रांस में एक चेतावनी की तरह आज भी याद किया जाता है. यह वो वक्त था जब फ्रांस के अस्थिर राजनीतिक माहौल के बीच वामपंथी रुझान रखने वाले छात्रों का आंदोलन परवान चढ़ा था और सरकार ने दमनकारी नीतियों को हथियार बनाकर उन्हें विश्वविद्यालयों से खदेड़ना शुरू कर दिया था. लाखों लोग सड़कों पर उतर आए थे और छात्रों द्वारा शुरू हुआ आंदोलन धीरे-धीरे मजदूरों को भी एकजुट करने लगा था. कर्मचारी संगठनों द्वारा देश में हड़तालों का सिलसिला शुरू हो चुका था और कवियों से लेकर गायकों तक ने इस आग की तरफ फैल रहे आंदोलन को अपना समर्थन दिया था.

मौजूदा वक्त में भी फ्रांस आग में एक बार फिर जल रहा है, क्योंकि बेतरतीब बढ़ती महंगाई और हाल ही में पेट्रोल-डीजल पर लगे नए टैक्स का विरोध करने के लिए आम जनता हिंसा का रास्ता अख्तियार कर चुकी है. आज की परिस्थितियां फ्रांसीसियों को यकीनन मई, 1968 की याद दिला रही होंगी और कुछ लोग जहां चाह रहे होंगे कि वो दौर लौटकर न आए, वहीं कुछ चाह रहे होंगे कि उस दौर में जो परवान चढ़ा आंदोलन बेमौत मारा गया, और जिस क्रांति का सपना अधूरा रह गया, वह सपना आज पूरा हो जाए.

‘द ड्रीमर्स’ के केंद्र में यह आंदोलन नहीं है. उसकी पृष्ठभूमि में यह मौजूद है और शुरुआत में इसका जिक्र होने के बाद क्लाइमेक्स में ही यह लौटकर आता है. तब मार्क्सवादी होने के बावजूद निर्देशक बर्नार्डो इस आंदोलन की असलफता की वजह को बड़े ही सटल अंदाज में अपने अमेरिकी नायक से कहलवाते हैं और फिल्म पुलिस द्वारा बरती जा रही अराजकता पर खत्म होती है. उनकी फिल्म ज्यादातर वक्त अपने मुख्य किरदारों के साथ एक घर में ही सिमटी रहती है और एक बेहिसाब दिलचस्प ऐतिहासिक घटना को बैकग्राउंड में रखकर तीनों मुख्य किरदारों की निजी जिंदगियों की इंटिमेट कहानी कहना चुनती है.

कई सुधी दर्शकों के मन में यह जिज्ञासा जाग सकती है कि एक दिलचस्प रेवल्यूशन की कहानी छोड़कर नौजवानों की ऐसी कहानी क्यों कही गई जिसे कि किसी भी और पृष्ठभूमि में फिल्माया जा सकता था? पूछने वाले यह भी पूछ सकते हैं कि जब कहानी तीन युवा मुख्य पात्रों की सेक्सुअलिटी को केंद्र में रखकर ही कही गई है तो वो क्या छिपा-ढका ‘कॉन्टेक्स्ट’ है जिसकी बात यह लेख शुरुआत में करना चाह रहा था?

असल में,‘द ड्रीमर्स’ सिर्फ एक रेवल्यूशन के बारे में नहीं है. बल्कि सोशल तथा सेक्सुअल फ्रीडम की चाहत रखने वाले दौर की भी बात करती है. कई फ्रेंच जानकार यह मानते हैं कि मई, 1968 के आंदोलन ने ही फ्रांस में महिला अधिकारों और सेक्सुअल रेवल्यूशन की नींव रखी थी. उस वक्त तक फ्रेंच सोसाइटी पितृसत्तात्मक बंधनों में जकड़ी थी जहां कि युवाओं को खुलकर जीने की आजादी नहीं थी और लड़कियों का लड़कों से घुलना-मिलना सही नहीं माना जाता था. मई, 1968 की घटनाओं ने इस रुढ़िवादी फ्रेंच समाज की नींव को हिलाने की कोशिश की और निर्देशक बर्नार्डो ने इसी सेक्सुअल फ्रीडम के नाम अपनी इरोटिक फिल्म समर्पित की. देश को हिला देने वाली घटना की आड़ में आंतरिक यात्राओं पर निकले युवाओं की कहानी कही.

बर्नार्डो बेर्तोलुची की फिल्मों में एक खास तरह का रुझान साफ नजर आता है. हालांकि उन्हें कम जानने वाले दर्शक कह सकते हैं कि वे सेक्स की अति से लदी-फदी ही फिल्में बनाते रहे, और कई बार ‘लास्ट टैंगो इन पेरिस’ जैसी इरोटिक फिल्मों के साथ हदों को तोड़ने वाले असंवेदनशील सेक्स-सीन्स का रॉ चित्रण करते रहे. लेकिन 50 साल के करियर में केवल 24-25 फिल्में बनाने वाला यह निर्देशक अपने आसपास के सामाजिक-राजनीतिक बदलावों के प्रति हमेशा सजग रहा था और बतौर फिल्मकार उनकी ज्यादातर फिल्में फासीवाद, वामपंथ और रेवल्यूशन के विषयों को एक्सप्लोर करती रहीं.

उनकी दूसरी ही फीचर फिल्म का नाम ‘बिफोर द रेवल्यूशन’ (1964) था जो कि 1962 के वक्त के इटली में मार्क्सवादी विचारों से प्रभावित नायक और गैर-राजनीतिक विचारधारा वाली नायिका के बीच पनपे प्यार पर बनी एक रोमांटिक-ड्रामा फिल्म थी. 1970 में पॉलिटिकल-ड्रामा फिल्म ‘द कन्फॉर्मिस्ट’ के बहाने उन्होंने फासीवाद और अंध-राष्ट्रवाद पर उंगली उठाई थी. 1972 में हवस की पराकाष्ठा के मनोविज्ञान को चित्रित करने वाली ‘लास्ट टैंगो इन पेरिस’ से उठ खड़े हुए बवंडर बराबर विवादों के फौरन बाद चार घंटे की लंबी अवधि की ‘1900’ (1976) बनाई थी, जो कि इटली के किसानों के संघर्षों की महागाथा थी और वामपंथ तथा दक्षिणपंथ के टकराव को चित्रित करती थी.

और फिर, जिस फिल्म ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ फिल्म व सर्वश्रेष्ठ निर्देशक जैसे नौ ऑस्कर्स से सम्मानित किया उस ‘द लास्ट एम्परर’ (1987) में भी उन्होंने चीन के आखिरी महाराजा की कहानी कही थी. यह शानदार फिल्म सामंतवाद के दौर से शुरू होकर माओ द्वारा लाए गए रेवल्यूशन के बाद बदल रहे चीन पर खत्म हुई थी.

एक इतावली निर्देशक क्रांति से जुड़ी कहानियां कहने के लिए कहां-कहां नहीं भटका! क्रांतियों की सफलता-असफलता को टटोलता-परखता रहा. फासीवाद की लगातार आलोचनाएं करता रहा और उन्हें अपनी कहानियों में पिरोता रहा. ऐसे में बर्नार्डो बेर्तोलुची को केवल नग्नता, सेक्स-सीन और उनके ग्राफिक विवरण के लिए ही याद रखना नासमझी नहीं तो और क्या है!

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