छत्तीसगढ़ में कांग्रेस तमाम कयासों को विराम देते हुए 15 वर्षों के बाद मजबूती से सत्ता में वापसी करती हुई दिख रही है. अंतिम चुनावी नतीजे के मुताबिक कांग्रेस ने 90 में से 68 सीटों पर जीत हासिल की है. यानी एक तरह से सूबे की जनता ने भाजपा की रमन सिंह सरकार को पूरी तरह से नकार दिया है. हालांकि, मतदान से पहले तक भाजपा को मजबूत स्थिति में बताया जा रहा था. कुछ लोग यह भी मान रहे थे कि ‘जोगी-माया’ गठबंधन की वजह से कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी फिर सकता है. लेकिन, ऐसा कुछ हुआ नहीं.

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की जोरदार वापसी की बड़ी वजहें ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों की 15 साल की भाजपा सरकार से नाराजगी और बदलाव की चाहत भी हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में मतदाताओं की नाराजगी की बड़ी वजह खेती-किसानी की बुरी स्थिति और फसलों की सही कीमत न मिलना रहा. वहीं, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपनी सभी जनसभाओं में जनता से वादा किया था कि यदि उनकी सरकार बनती है तो 10 दिनों के भीतर वे किसानों की कर्जमाफी करेंगे. कांंग्रेस ने धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 2300 रुपये देने का ऐलान किया था. चुनावी रुझान को देखते हुए माना जा सकता है कि किसानों ने कांग्रेस के इन वादों पर भरोसा किया है.

सूबे में आज कांग्रेस की जैसी स्थिति दिख रही है उसके पीछे महिलाओं की सरकार से नाराजगी की अनदेखी नहीं की जा सकती. छत्तीसगढ़ के चुनावी दौरे में सत्याग्रह के साथ बातचीत में महिलाओं का रमन सिंह सरकार को लेकर गुस्सा साफ दिखा था. इन्होंने कई मुद्दों पर सरकार को घेरा था. इनमें शराबखोरी को बेतहाशा बढ़ावा देना और महंगाई प्रमुख थे. ये दोनों मुद्दे सूबे की आधी आबादी के लिए इसलिए भी अहम थे क्योंकि, इनसे सबसे अधिक प्रभावित महिलाएं ही होती हैं. उनकी तकलीफ इस बात से थी कि कई विरोध प्रदर्शनों के बाद भी सरकार ने शराबबंदी के लिए कुछ खास नहीं किया. महिलाओं की नाराजगी को देखते हुए रमन सिंह सरकार ने गांवों में शराब की दुकानों के बीच की तो बढ़ा दी लेकिन चुनावी साल में शराबबंदी के अपने वादे से वे पलट गये. अब इसका नुकसान उन्हें चुनावी नतीजों से मिलता हुआ दिख रहा है. वहीं, कांग्रेस ने सत्ता में आने पर शराबबंदी का वादा किया है.

दूसरी ओर, इस चुनाव में महिलाओं के बीच महंगाई भी एक बड़ा मुद्दा था. एक ओर भाजपा उज्ज्वला योजना को बतौर एक बड़ी उपलब्धि मतदाताओं के सामने परोस रही थी, वहीं एलपीजी गैस सिलिंडर की कीमत 1,000 रुपये पहुंचने की वजह से मतदाताओं में खासी नाराजगी थी. गरीब और निम्न मध्यम वर्ग से आने वाली अधिकांश महिलाओं की शिकायत थी कि सरकार ने गैस चूल्हा तो बांट दिया है लेकिन, सिलिंडर भरवाना अब मुश्किल हो रहा है. साथ ही, रोजाना इस्तेमाल में आने वाली अन्य चीजों की कीमत बढ़ने से भी महिलाएं खासी नाराज थीं. यहां तक कि एक रुपये किलो चावल और मुफ्त मोबाइल भी उनके इस गुस्से को शांत नहीं कर पाया.

18 साल के इस युवा राज्य में भाजपा सरकार से यदि किसान और महिलाओं में नाराजगी दिखी तो नौजवान भी इससे अलग नहीं थे. युवाओं में रोजगार के मौकों का पर्याप्त संख्या में न होना, उनकी नाराजगी की एक बड़ी वजह बना हुआ है. गांवों में खेती करना नुकसान का सौदा बना हुआ है, सरकारी क्षेत्र में रोजगार के मौके मिलना मुश्किल है, ऊपर से बाहरी कामगारों की वजह से निजी क्षेत्र में अवसर ज्यादा अवसर नहीं हैं. यदि इनमें रोजगार मिलता भी हैं तो कम मजदूरी पर काम करने के लिए मजबूर होना पड़ता है.

इन सारे मुद्दों के बीच नोटबंदी और जीएसटी की वजह से भी भाजपा को छत्तीसगढ़ में मतदाताओं की नाराजगी झेलने के लिए मजबूर होना पड़ा है. राज्य के कई छोटे-बड़े कारोबारी मतदाताओं की तकलीफ है कि इनकी वजह से उनका काम-धंधा पहले से आधा रह गया है. रायपुर स्थित एक कारोबारी का तो इतना तक कहना था कि यदि फिर से भाजपा सरकार आ गई तो दुकान का शटर गिराना पड़ सकता है. वहीं, अधिकांश मतदाताओं ने नोटबंदी को लेकर अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर की. इनका कहना था कि इस बड़े फैसले से सरकार को तो हासिल कुछ नहीं हुआ लेकिन, उनकी मुश्किलें दो साल बाद भी खत्म नहीं हुई हैं.

इन सभी मुद्दों के अलावा सत्ता में 15 साल तक रहना भी भाजपा के लिए मुश्किलें पैदा करने वाला रहा. सूबे के ऐसे मतदाता जिनका झुकाव न तो कांग्रेस की ओर है और न भाजपा की ओर, उनमें से कइयों का साफ-साफ कहना था कि अब सरकार बदलने का वक्त है. यहां तक कि मुख्यमंत्री रमन सिंह के काम से खुश दिखने वाले मतदाता भी सिर्फ सरकार बदलने के लिए उनके खिलाफ वोट करने की बात करते दिखे. इनसे साफ है कि रमन सिंह को अनुमानों से उलट राजस्थान और मध्य प्रदेश से अधिक सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ा है.

यह सत्ता विरोधी लहर इतनी तीव्र थी कि कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी - किसी एक चेहरे का न होना - और ‘जोगी-माया’ फैक्टर भी जमीन पर उसे प्रभावित करते नहीं दिखे. यहां पर रायपुर के एक ऑटो रिक्शा चालक रहमान खान की बात याद आती है - ‘कांग्रेस के पास कोई एक चेहरा नहीं है तो क्या हुआ. 60 साल सरकार चलाने का अनुभव तो है.’ छत्तीसगढ़ का जनादेश रहमान खान की बातों की पुष्टि करता ही दिखता है.

आखिर में, छत्तीसगढ़ चुनाव अन्य राज्यों से इस मायने में अलग रहा कि इसमें हिंदू-मुसलमान और मंदिर-मस्जिद मतदाताओं के बुनियादी मुद्दे और परेशानियों पर हावी होते हुए नहीं दिखें. भारतीय लोकतंत्र के लिए यह सबसे बड़ी उम्मीद की बात है.