मध्य प्रदेश में इस बार चुनावी मुकाबला कितना नज़दीकी रहा इसका अंदाज़ा इसी से लगा सकते हैं कि 11 दिसंबर यानी मतगणना वाले दिन की शाम तक भी कोई यह कहने का जोख़िम नहीं ले रहा था कि अगली सरकार किसकी बन रही है. नतीज़े भी साफ़ होते-होते लगभग 24 घंटे लग गए. और अगले दिन जब स्थिति स्पष्ट हुई तो पता चला कि कांग्रेस को 116 के बहुमत से दो कम यानी 114 सीटें ही मिल सकी हैं. जबकि 15 साल के सत्ताविरोधी रुझान से जूझ रही भारतीय जनता पार्टी 109 सीटें जीत गई है. वह भी कांग्रेस से ज़्यादा वोट प्रतिशत लेकर.

अलबत्ता मध्य प्रदेश से कुछ संकेत ज़रूर मंगलवार को ही एकदम साफ़ हो गए थे जिनके बारे में बात करना मौज़ूं हो सकता है.

1. भाजपा ने किसानों की अनदेखी की और उन्हाेंने पार्टी से नज़र फेर ली

मध्य प्रदेश देश का इक़लौता राज्य है, जिसने भाजपा की शिवराज सिंह चौहान सरकार के नेतृत्व में पांच साल लगातार कृषि कर्मण पुरस्कार जीता. कृषि क्षेत्र में सबसे बेहतर प्रदर्शन के लिए केंद्र सरकार यह पुरस्कार देती है. इस हिसाब से प्रदेश में किसानों की हालत अच्छी ही नहीं बहुत बेहतर होनी चाहिए थी. लेकिन बीते दिनों नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के हवाले से केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने ही लोक सभा में माना कि 2014 से 2016 के बीच मध्य प्रदेश में किसानों की आत्महत्या की दर में 21 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है. जबकि देश के अन्य इलाकों में इसी दौरान इसमें 10 फ़ीसद की कमी दर्ज़ की गई थी.

ऐसे ही प्रदेश के मालवा-निमाड़ क्षेत्र के लिए सोयाबीन की खेती काफ़ी मायने रखती है. यहां साल 2012-13 में 58.13 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में यह फसल बोई गई थी और उत्पादन हुआ था 64.86 लाख टन. लेकिन 2017-18 सोयाबीन की बुवाई घटकर रह गई 50.10 लाख हेक्टेयर और उत्पादन रह गया सिर्फ 42 लाख टन. कुछ साल पहले तक इसी सोयाबीन की वज़ह से मालवा को ‘भारत का मिडवेस्ट’ और इंदौर को ‘शिकागो’ कहा जाता था. इस इलाके में बड़े पैमाने पर होने वाली अफ़ीम की खेती का भी आज यही हाल है.

फिर आती है बात फ़सलों के उचित दाम की, तो याद दिला दें कि मंदसौर मध्य प्रदेश में ही है. वह जगह जहां फसलों की उचित कीमत पाने के लिए आंदोलन कर रहे किसानों में से छह की मौत पुलिस की गोलियों से हुई थी. सिर्फ़ मालवा या मंदसौर ही क्यों, उस बुंदेलखंड का भी बड़ा हिस्सा मध्य प्रदेश में है जहां से रोज़ग़ार की तलाश में लोग बड़े पैमाने पर पलायन करते हैं. मालवा-निमाड़ की तरह यहां की भी लगभग 30-40 फ़ीसदी आबादी हर मौसम में अपने घरों से, जड़ाें से दूर रहने को मज़बूर होती है.

यानी राष्ट्रीय स्तर पर मध्य प्रदेश की ‘कृषि संपन्नता’ की जो तस्वीर बनाने की कोशिश (कृषि कर्मण पुरस्कार आदि के जरिए) की जा रही थी धरातल पर उसकी वास्तविकता कुछ और ही थी. इस सच्चाई का अहसास शायद शिवराज सिंह चौहान की सरकार को भी था. इसीलिए वह पिछले साल इन्हीं दिनों किसानों के लिए ‘भावांतर योजना’ लेकर आई. लेकिन यह भी ‘भंवर में उलझ गई’ और किसानों के बजाय व्यापारियों के लिए ज़्यादा मुनाफ़े की साबित हुई. यानी यह चुनावी दांव कारगर नहीं हुआ. प्रदेश में कृषि उत्पादन के लिए पहचान बना चुके क्षेत्रों (सीहोर, खुरई, आदि) में जिस तरह इस बार 75 से 85 फ़ीसदी तक मतदान हुआ उससे किसानाें के असंतोष की यह बात पुख़्ता होती है.

यही वज़ह है कि अब विशेषज्ञ भाजपा के नेतृत्व वाली नरेंद्र मोदी सरकार को भी इस मसले पर चेता रहे हैं. द इकॉनॉमिक टाइम्स के विश्लेषण में साफ लिखा गया है, ‘देश के किसानों को अब इससे मतलब नहीं कि राहुल गांधी खेती-किसानी के बारे में कितना जानते हैं. उन्हें इससे ज़्यादा सरोकार है कि मोदी सरकार ने उनके लिए क्या किया है.’ यहां बताते चलें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह अपनी रैलियाें में अक्सर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर तंज कसते हैं कि कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें पता नहीं कि चने का पौधा होता या पेड़. जो मूंग और मसूर में फ़र्क़ नहीं जानते वे आज देश को किसानी सिखाने के लिए घूम रहे हैं.’

2. भाजपा ने शिवराज पर आंख बंद कर भरोसा किया और वे आंख की किरकिरी साफ करते रहे

इस बार के परिणामों में दूसरी अहम भूमिका ‘भाजपा के शिवराज पर अंधविश्वास’ ने निभाई. इस बात का प्रमाण ये रहा कि भाजपा ने अपनी मातृ संस्था - राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) - तक की बात तक नहीं मानी. टिकट बंटवारे के समय ऐसी ख़बरें आई थीं कि आरएसएस ने भाजपा को मौज़ूदा 165 में से 78 विधायकों के टिकट काटने का सुझाव दिया था. आरएसएस के प्रचारक जिस तरह ज़मीन से जुड़े होते हैं उसके मद्देनज़र यह सुझाव अहम था. लेकिन भाजपा ने शिवराज के भरोसे सिर्फ़ 54 विधायकों के टिकट काटे. सात की सीटें बदलीं. और उनमें से कई उम्मीदवारों को फिर टिकट दिया जो 2013 में हार गए थे. बताते हैं कि संघ ने मतदान से एक सप्ताह पहले ही शिवराज के साथ हुई एक अहम बैठक में बता दिया था कि भाजपा की लगभग 50-55 सीटें कम हाे रही हैं, जो हुई भीं.

भाजपा ने शिवराज को किस क़दर फ्रीहैंड दिया, इसका प्रमाण तब भी मिला जब पार्टी के किसी वरिष्ठ नेता की उनके आगे नहीं सुनी गई. फिर चाहे वह लोक सभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन हों या राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय. पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर हों या पूर्व केंद्रीय मंत्री सरताज सिंह, जिन्हें पार्टी तक छोड़नी पड़ी. इस तरह हर वह नेता जो शिवराज के लिए आंख की किरकिरी (चुनौती) बना हुआ था या बन सकता था, उसे किनारे होना पड़ा. कर दिया गया. यहां तक कि 2008 और 2013 के चुनाव में प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर शिवराज के विजयरथ के सारथी रहे केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर भी इस बार नेपथ्य में दिखे. उन्हें प्रदेश चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया गया. लेकिन पूरा अभियान सिर्फ़ शिवराज के ही इर्द-ग़िर्द नज़र आया. इससे शुरूआत में ही चुनावी मुकाबला 19-20 का हो गया.

3. कांग्रेस भ्रष्टाचार और घोटालों को हवा देकर ही बढ़त एक़तरफ़ा कर सकती थी लेकिन चूक गई

कांग्रेस ने इस साल मई में जब कमलनाथ जैसे कद्दावर नेता को प्रदेश इकाई की कमान सौंपी थी, तब से ही उसके संगठन में ऊर्जा दिख रही थी. पार्टी कार्यकर्ताओं के जाेश का आलम ये था कि वे ‘ऊपर भोलेनाथ, नीचे कमलनाथ’ का नारा लगा रहे थे. यानी नेतृत्व के प्रति पहली बार वे पूरी तरह आश्वस्त और भरोसे से लबरेज दिख रहे थे. दूसरी तरफ़ इस नेतृत्व (कमलनाथ ही) के पास भी सरकार के ख़िलाफ़ सियासी असलहे की कमी नहीं थी. उसके पास एक तरफ़ व्यापम, अवैध रेत खनन और ई-टेंडरिंग जैसे घोटालों और भ्रष्टाचार के मसले थे. वहीं शिवराज की 21 हजार के करीब घोषणाओं में आधे से अधिक का अधूरा रह जाना इसका प्रमाण था कि अफ़सरशाही मनमानी हो चली है. सड़क, बिजली, पानी, बेरोजगारी, पलायन, खस्ता वित्तीय हाल के मसले ताे थे ही.

कांग्रेस चाहती तो सिर्फ़ इन्हीं को ठीक तरह से जनता तक पहुंचाकर चुनाव एकतरफ़ा कर सकती थी. अपने ‘वचन पत्र’ में किसानाें से कर्ज़ माफ़ी, पेट्रोल-डीज़ल-रसोई गैस के दामों में कमी करने का वादा कर उसने कुछ हद तक ‘जन के मन तक पहुंचने की कोशिश’ भी की. पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह (जिनके शासनकाल को भाजपा मुद्दा बनाती रही है) को पर्दे के पीछे रखकर रणनीतिक परिपक्वता का भी परिचय दिया. लेकिन प्रदेश नेतृत्व शायद अतिउत्साह में कहीं-कहीं चूक कर गया. प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ कभी महिलाओं काे ‘कोटा या सजावट की चीज’ कहकर फंसे तो कभी मुस्लिमों से कांग्रेस के पक्ष में 90 फ़ीसदी मतदान की अपील कर. आरएसएस पर उनकी टिप्पणी ने भी बैठे-बिठाए संघ और भाजपा को हथियार दे दिया. उसनेअपने अंदाज़ में मुद्दों को रंग देने की कोशिश की और नतीज़ा?

प्रदेश में कांग्रेस अगली सरकार तो बना रही है लेकिन बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और कुछ निर्दलीयों के समर्थन के बल पर. क्योंकि वह पूरा जोर लगाने के बावज़ूद सरकार बनाने के लिए सामान्य बहुमत से भी दो सीटें पीछे रह गई.