छत्तीसगढ़ की जनता ने 15 साल पुरानी रमन सिंह सरकार को चुनावी दंगल में पटखनी देकर कांग्रेस के सिर पर ताज रख दिया है. हालांकि, 90 सीटों में से दो-तिहाई सीटें हासिल करने के बाद भी अभी पार्टी का वह चेहरा सामने आना तय है जिसके माथे पर यह ताज रखा जाना है. पार्टी नेतृत्व की मानें तो इसके लिए उसके पास कई योग्य उम्मीदवार हैं.

बीते अगस्त में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस नेता टीएस सिंह देव ने कहा था कि चुनाव के बाद कांग्रेस ‘स्वयंवर’ के जरिए मुख्यमंत्री का चयन करेगी. इस लिहाज से देखें तो स्वयंवर में पार्टी के कुल चार उम्मीदवार दिख रहे हैं. इनमें खुद टीएस सिंह देव, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल और पूर्व केंद्रीय मंत्री चरणदास महंत हैं. साथ ही, आखिरी वक्त में पार्टी नेतृत्व ने सूबे के इकलौते पार्टी सांसद ताम्रध्वज साहू को चुनावी मैदान में उतारकर इस सूची को और बड़ा कर दिया है. हालांकि, जानकारों का मानना है कि अब बहुमत हासिल करने के बाद पार्टी लोक सभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए किसी एक बड़े चेहरे के साथ अन्य चेहरों को भी अहम जिम्मेदारी और पद देने का रास्ता अपना सकती है. यह उत्तर प्रदेश में ‘भाजपा मॉडल’ की तरह हो सकता है, जहां पार्टी के भीतर असंतोष को रोकने के लिए दो उप-मुख्यमंत्री बना दिए गए.

भूपेश बघेल

भूपेश बघेल ने साल 2014 में राज्य इकाई की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली थी. इससे पहले 2013 में एक माओवादी हमले में कांग्रेस ने अपने शीर्ष नेतृत्व को खो दिया था. मंगलवार को कांग्रेस ने जो बड़ा जनादेश हासिल किया है उसके पीछे का श्रेय भूपेश बघेल को ही जाता है. बताया जाता है कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान पार्टी संगठन को मजबूत करने का काम किया है. इसकी वजह से पार्टी कार्यकर्ताओं की बड़ी संख्या उनके साथ दिखती है.

वहीं, सूबे में जातिगत समीकरण भी भूपेश बघेल के पक्ष में दिखते हैं. वे कुर्मी समुदाय से आते हैं. इसकी सूबे की आबादी में हिस्सेदारी करीब 20 फीसदी है. साथ ही, यह समुदाय ओबीसी वर्ग में आता है, जिसकी आबादी करीब 36 फीसदी है. इस स्थिति में पार्टी हाईकमान के लिए इस समुदाय को नाराज करना आसान नहीं होगा. इसकी वजह पार्टी को हासिल जनादेश ही है. माना जा रहा है कि ओबीसी समुदाय के समर्थन के बिना कांग्रेस को इतनी सीटें नहीं मिल सकती थीं. जानकारों के मुताबिक इसलिए अगले लोक सभा चुनाव से पहले कांग्रेस इस समुदाय को नाराज करना नहीं चाहेगी.

ताम्रध्वज साहू

इस सूची में भूपेश बघेल के बाद ताम्रध्वज साहू का नाम आने के कई कारण हैं. इनमें पहला यह है कि कांग्रेस ने दुर्ग (ग्रामीण) विधानसभा क्षेत्र से पहले से घोषित पार्टी उम्मीदवार का टिकट काट कर सूबे से अपने इकलौते सांसद को विधानसभा चुनाव में उतार दिया. इसके पीछे की वजह मुख्यमंत्री बनने की चाहत में आपसी प्रतिद्वंदिता में उलझे नेताओं पर लगाम कसना माना गया. साथ ही, ताम्रध्वज साहू को उतारकर कांग्रेस ने साहू समुदाय के मतों को भी अपनी ओर खींचने की कोशिश की. ओबीसी तबके में आने वाले इस समुदाय की राज्य की आबादी में करीब 12 फीसदी हिस्सेदारी है.

साल 2014 में मोदी लहर के बीच चुनाव जीतने वाले ताम्रध्वज साहू को पार्टी की राष्ट्रीय ओबीसी सेल का प्रमुख बनाया गया. साथ ही, उन्हें राष्ट्रीय कार्यकारिणी कमिटी में भी शामिल किया गया है. इन सभी वजहों से भूपेश बघेल के साथ उनकी दावेदारी भी मजबूत दिखती है.

टीएस सिंह देव

अब तक विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभाने वाले टीएस सिंह देव मुख्यमंत्री पद की रेस में शामिल हैं. वे कांग्रेस पार्टी की ओर से सबसे अमीर विधायक रह चुके हैं. बताया जाता है कि राज्य में पार्टी को चलाने के लिए वित्तीय संसाधन जुटाने में उनकी अहम भूमिका रहती है. इस बार पार्टी का घोषणापत्र तैयार करने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर डाली गई थी. इस घोषणापत्र में कांग्रेस ने सभी वर्गों के मतदाताओं को लुभाने के लिए कई वादे किए हैं. टीएस सिंह देव पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के करीबी नेताओं में भी शामिल हैं.

चरण दास महंत

मनमोहन सिंह सरकार में केंद्रीय मंत्री और तीन बार लोक सभा रह चुके चरण दास महंत भी इस सूची में शामिल हैं. राजनीतिक अनुभव की दृष्टि से देखा जाए तो वे अन्य तीन के मुकाबले 20 साबित होते हुए दिखते हैं. उन्होंने अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत साल 1980 में विधानसभा चुनाव जीतकर की थी. इसके बाद वे 1985 में भी चुने गए. अविभाजित मध्य प्रदेश की सरकार में उन्होंने गृह विभाग सहित कई अन्य बड़ी जिम्मेदारियां संभाली थीं. वहीं, केंद्र में भी चरणदास महंत कृषि राज्य मंत्री रह चुके हैं. वे कई संसदीय समितियों और पार्टी के भीतर अहम भूमिका में भी रहे हैं.