‘द जंगल बुक’ के लेखक रुडयार्ड किपलिंग को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि वे भारतीय समाज को पश्चिम के ड्राइंग रूम तक ले गए. कइयों के ज़ेहन में प्रश्न उठ सकता है कि इससे भारतीयों को क्या हासिल हुआ. जी हां, हासिल कुछ न हुआ हो, पर जिस धुंध की परतों से यूरोप भारतीय समाज को देखता आ रहा था, इससे वह हट गयी. ऐसा कहते वक़्त हम किपलिंग के उपनिवेशवादी या नस्लवादी ख़्यालों को दरकिनार कर रहे हैं, क्योंकि फ़िलहाल लेखन की बात हो रही है. और, ऐसा कहते वक़्त हम रबींद्रनाथ टैगोर, तोरू दत्त, रमेश दत्त के साथ भी अन्याय नहीं कर रहे हैं, और न ही नीरद सी चौधरी या वीएस नायपॉल के लेखन को कम आंक रहे हैं. इन सभी ने अंग्रेज़ी में लिखा है और अच्छा लिखा है. पर इनके लेखन में या तो रोमांटिसिज्म है या फिर स्याहपन. हिंदुस्तानी समाज कहीं न कहीं पीछे छूटा है. हां, पर जब बात मुल्क राज आनंद की कहानियों की होती है तो हम कह सकते हैं कि हिंदुस्तानी समाज के यथार्थ के साथ अंग्रेज़ी भाषा में न्याय हुआ है.

जो भारतीय समाज प्रेमचंद के ‘कफ़न’ या ‘गोदान’ में नज़र आता है, या जयशंकर प्रसाद की कहानियों में झलकता है, वही समाज और उसका दर्द, अंग्रेज़ी के लेखक मुल्क राज आनंद की कहानियों में भी दिखता है. और इसमें कोई शक़ नहीं कि वे अंग्रेज़ी फ़िक्शन के सबसे बड़े हिंदुस्तानी लेखक हुए हैं. 1905 में पेशावर में पैदा हुए मुल्क राज आनंद के परिवार के बारे में कम ही ज्ञात है. बड़ी मुश्किल से मालूम हुआ और बल्कि ईमानदारी से कहा जाए तो डॉ जोवा सी मारक (एक शोधकर्ता) की किताब से ही मालूम चल सका कि वे ठठेरों के परिवार से आते थे. परिवार कोई रईस नहीं था. मुल्क राज ने खालसा कॉलेज से स्नातक की डिग्री लेने के बाद इंग्लैंड की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की और दर्शन में पीएचडी की.

वह आजादी का दौर था. हिंदुस्तान में गांधी का सत्याग्रह साम्यवाद और उपनिवेशवाद के साथ दो-दो हाथ कर रहा था. मुल्क राज आनंद उपनिवेशवाद की सबसे उर्वरक ज़मीन इंग्लैंड से सर्वहारा का ख़याल लेकर हिंदुस्तान आए. यहां आकर उनकी मुलाकात कृष्ण चंदर, मंटो, बलराज साहनी, अली सरदार जाफ़री या मजाज़ जैसे दिग्गजों से हुई और इंडियन प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन की स्थापना में उन्होंने अहम किरदार निभाया.

भारत के संदर्भ में कहा जा सकता है कि उपनिवेशवाद की दिक्कतों और रूस में क्रांति के बावजूद, यहां साम्यवाद अपनी जडें नहीं जमा पाया. साम्यवाद ने जहां रूस में ज़ार शासन को उखाड़ फेंका था, वहीं हम अपने ‘ज़ारों’ को अन्नदाता मानते रहे थे. हमने तरक्की पसंद शायरों और लेखकों के काम को बड़े चाव से तो पढ़ा, पर उनके विचारों से दोस्ती नहीं की. हम घूम-घूमकर गांधी के पास ही लौटते रहे और गांधी अपने चरखे से साम्यवाद के सूत को कातकर हिंदुस्तानियों के लिए काबिल बनाते रहे. गांधी ने साम्यवादियों की तरह गांवों और किसानों की बात के साथ-साथ अध्यात्म का भी पाठ पढ़ाया. हमें भी शायद यही पसंद आया.

देखिये, आप कह सकते हैं कि जब भी उस दौर की बात की जाती है, क्यूं गांधी का ज़िक्र बार-बार किया जाता है? क्या करें? गांधी एक रेफ़रेन्स पॉइंट के तौर पर उभरते हैं. हर सामाजिक, आर्थिक, या साहित्यिक (वैचारिक) पहलू या तो उनके पहले है, या उनके बाद. लेखकों ने भी गांधी को अपने लेखों और कहानियों में तोला है.

मुल्क राज आनंद की सबसे पहली कहानियों में से एक ‘अनटचेबल’ यानि अछूत एक ऐसे व्यक्ति, भाखा की कहानी है जो मैला ढोता है और अपनी ज़िन्दगी और इस काम से परेशान है. उसके गांव में एक दफ़ा गांधी आते हैं और भाषण देते हैं. कहानी के अंत में उसके पास दो विकल्प हैं जो उसके जीवन को तारने में सहायक हैं; या तो वह मिशनरियों से बप्तिस्मा करवा ले, या गांधी के अध्यात्म को अपनाए. उसे समझ नहीं आ रहा है. तभी उसे ख़याल आता है कि गांधी ने भाषण में नयी शौच प्रणाली, यानी फ्लश वाले टॉयलेट, का ज़िक्र किया था. मुल्क राज आनंद, एक लेखक की सामाजिक ज़िम्मेदारी निभाते हुए और गांधी के विचारों से टकराने से बचते हुए, भाखा को फ्लश वाले टॉयलेट के ख़याल के नज़दीक ले जाते हैं और अपने पहले प्रयोग में सफल हो जाते हैं.

इसी तरह ‘कुली’ (1936) में सर्वहारा के दर्द को उन्होंने बख़ूबी दिखाया. इसका पात्र मुन्नो अनाथ है और जीने का सामान जुटाने के लिए कभी घरेलू नौकर बनता है, तो कभी कुली. कभी फैक्ट्री में मज़दूर है, तो कभी रिक्शा चलाता है और अंतत: मर जाता है. यह अप्टन सिनक्लैर या गोर्की के लेखन से प्रेरित कहानी नज़र आती है. यूरोप के कारख़ानों में मज़दूरी करते बच्चे वहां की हक़ीक़त थे.

मुल्क राज के बारे में यह बड़ी ही दिलचस्प बात है कि इंग्लैंड में उनकी दोस्ती जॉर्ज ओरवेल से थी लेकिन दोनों के राजनैतिक ख़याल एकदम जुदा थे. हालांकि ऑरवेल उनके बड़े प्रशंसक थे. आनंद की ‘द सोर्ड एंड द सिकल’ (तलवार और हसिया) पर अपने विचार रखते हुए ऑरवेल का कहना था कि आनंद का उपन्यास (भारतीय) सांस्कृतिक जिज्ञासा जगाता है. यही वह बात है जिसका ज़िक्र हमने ऊपर किया था. इसके अलावा ऑरवेल ने मुल्क राज आनंद के साहित्य के बारे में चर्चा करते हुए एक जगह अंग्रेज़ी भाषा में ‘भारतीय साहित्य के जन्म’ को ‘हैरत’ की बात भी कहा था.

मुल्क राज के चर्चित उपन्यास ‘टू लीव्स एंड अ बड’ (एक कली दो पत्तियां-1937) में सर्वहारा पूंजीवाद से टकराता है. यहां लेखक उसे हिंसा का रास्ता छोड़कर गांधी के अहिंसा के मार्ग पर ले जाते हैं. मशहूर निर्माता-निर्देशक के अब्बास ने इस कहानी पर ‘राही’ (1956) फ़िल्म बनाई थी. इसमें रमेश बने देव आनंद मालिकों के हुक्म पर चाय बागानों में कामगारों से हंटर के ज़ोर पर काम करवाते हैं. इसमें एक दृश्य है जहां एक लड़की की पीठ पर हंटर मारते हुए रमेश उसे काम करने की सीख दे रहा है. इसकी प्रतिक्रिया में लड़की कहती है कि वो क्या, उसकी पीठ भी ये बात समझ गई है. इसी फिल्म में आगे चाय बागान के एक अंग्रेज़ हाकिम के हाथों उस लड़की को गोली लग जाती है. इस पर फिल्म में डॉक्टर बने बलराज साहनी कहते हैं, ‘उसने लड़की को नहीं अपने साम्राज्य को गोली मारी है.’ ये घटनाक्रम कहानी को एक अद्भुत संवेदनशीलता देते हैं. वहीं इस कहानी में अब्बास को भारतीय समाजवाद के उभार का एक पहलू नजर आया था.

‘प्राइवेट लाइफ़ ऑफ़ इंडियन प्रिंस’ में मुल्क राज कांग्रेसियों से भिड़ते हुए नज़र आये हैं. इस कहानी का पात्र एक राजा है जिसकी प्रजा काफ़ी ग़रीब है. अंग्रेज़ भारत छोड़ रहे हैं और उसे डर है कि कहीं भारत में उसके राज्य का विलय उसे ही न मिटा दे. वह सरदार पटेल से मिलकर विलयपत्र पर दस्तख़त कर देता है. अब राजा का आर्थिक ख़याल तो रख लिया जाता है पर प्रजा की हालत जस की तस ही रहती है.

उनके लेखों में पात्रों की ज़िंदगी यथार्थ से बार-बार टकराती है. वे पहले अंग्रेज़ी के लेखक कहे जा सकते हैं जिन्होंने अपने लेखन में पंजाबी और हिंदी शब्दों का उपयोग किया. मुल्क राज के उपन्यासों और कहानियों के पात्रों की सबसे खास बात है कि वे शोर नहीं मचाते. वे चुपचाप अपना दर्द लिए उन क़िस्सों में गुज़रते हैं. यही हिंदुस्तान के सर्वहारा की हकीकत भी है. वह तकलीफ होने पर भी फ़्रांसीसियों की तरह शोर नहीं मचाता. कहा जा सकता है कि ये पात्र उन भारतीय किसानों की तरह हैं जो मुंबई की सड़कों पर हज़ारों की संख्या में होने के बावजूद चुपचाप रात में मार्च करते हैं ताकि शहर के बच्चों की पढ़ाई में व्यवधान उत्पन्न न हो और अगले दिन बच्चे बिना किसी संकट के परीक्षा दे सकें. देश के सर्वहारा को शायद गांधी ने यही सिखाया था और आज भी वह यही करता है. हुक्मरान कब इनकी सुनेंगे, न मुल्क राज को मालूम था और न गांधी को.

लेकिन इसके साथ यह भी सच है कि सर्वहारा सिर्फ अपने समय की प्रतीक्षा करता है और जब-जब समय आता है तो हुक्मरानों को सबक सिखा देता है. कल भी देश के राजनीतिक पटल पर कुछ-कुछ ऐसा ही हुआ था.

मुल्क राज आनंद की कहानियां आज़ादी के पहले और उसके बाद के दौर का आखों-देखा बयान सरीखी हैं. 1946 में लिखी अपनी किताब ‘अपॉलॉजी फॉर हीरोइज्म’ में वे समाजवाद को इंसान की सभी समस्याओं का हल मानते हैं. उनके मुताबिक़ इसी से आर्थिक और राजनैतिक आज़ादी प्राप्त होगी और ऐसा कभी नहीं हो सकता कि मानवता इस धरती से ख़त्म हो जाए. वे मानते रहे कि मनुष्य हर सूरत में आगे बढ़ सकता है और उसे बढ़ना ही होगा. यही जिजिविषा उनके 25 उपन्यासों और कई कहानियों के किरदारों में नज़र आती है. उन्होंने भारत में अंग्रेज़ी लेखन को नए विचार से जोड़ा था और आज के तमाम अंग्रेजी लेखकों वे पितामह कहे जा सकते हैं.