पिछले महीने नवंबर में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और सरकार के बीच विवाद चरम पर था. उस वक्त जानकार मान रहे थे कि आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल किसी भी समय इस्तीफा दे सकते हैं. लेकिन तभी उर्जित पटेल की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मुलाकात होती है और फिर आरबीआई-सरकार के बीच सुलह के संकेत मिलते हैं. आर्थिक मसलों पर नजर रखने वाले जानकार भी इसे युद्ध विराम मान लेते हैं और एेसा लगने लगता है कि आरबीआई-सरकार के बीच फिलहाल सबकुछ ठीक हो गया है. बाजार भी इस बात से अाश्वस्त हो जाता है.

लेकिन एक महीना बीतते ही अचानक खबर आती है कि आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल ने इस्तीफा दे दिया. मोदी सरकार में हुए अन्य इस्तीफों की तरह उर्जित पटेल ने भी इस्तीफे की वजह ‘निजी’ बताई और तत्काल प्रभाव से अपना पद छोड दिया. पद छोड़ने की उनकी टाइमिंग भी हैरान करने वाली थी. 10 दिसंबर को उर्जित पटेल ने उस समय इस्तीफा दिया जब 14 दिसंबर को होने वाली आरबीआई बोर्ड की बैठक की तैयारी चल रही थी.

आखिर, एेसा क्या हुआ कि उर्जित आरबीआई-सरकार केे बीच ‘युद्ध’ मेें तो डटे रहेे, लेेकिन जब ‘युद्ध विराम’ घोषित हो चुका था तो उन्होंने इस्तीफा दे दिया? जानकार अब इसकी वजह यह मान रहे हैं कि सरकार-आरबीआई के बीच ऊपरी तौर पर जो सुलह दिखाई दे रही थी, वह दरअसल दोनों पक्षों की ‘तू डाल-डाल, मैं पात-पात’ वाली रणनीति थी.

आरबीआई की गतिविधयों पर नजर रखने वाले जानकारों का कहना है कि जब यह विवाद शुरु हुआ कि सरकार आरबीआई के कोष से 3.5 लाख करोड़ रुपये चाहती है तो शुरु में सरकार ने इस मसले पर आक्रामक रवैया अपनाया. यहां तक कि उसने आरबीआई एक्ट की धारा 7 तक के इस्तेमाल की सोच डाली. इस धारा का इस्तेमाल कर सरकार रिजर्व बैंक को निर्देश दे सकती है. लेकिन रिजर्व बैंक के 83 साल के इतिहास में किसी भी सरकार ने इसका इस्तेमाल नहीं किया है. सरकार के ज्यादा आक्रामक होने का नतीजा यह हुआ कि बात आरबीआई की स्वायत्तता पर केंद्रित हो गई. जानकारों के मुताबिक उर्जित पटेल ने उस समय यह साफ कर दिया कि अगर धारा 7 इस्तेमाल की गई तो वे तत्काल इस्तीफा दे देंगे. उस समय सीबीआई विवाद में उलझी मोदी सरकार एक साथ दो फ्रंट नहीं खोलना चाहती थी. इसलिये उसने अपना रवैया नरम कर लिया, लेकिन भीतरी पेशबंदी होती रही.

नवंबर की पिछली बोर्ड बैठक में तय हुई जिन बातों को सरकार और आरबीआई के बीच ‘सुलह का दस्तावेज’ माना जा रहा था, उनमें एक यह थी कि आरबीआई ने प्राम्पट करेक्टिव एक्शन (पीसीए) के तहत जिन 11 सरकारी बैंकों के कर्ज बांटने पर रोक लगा दी है, उन्हें ऐसा करने की छूट दी जाएगी. बोर्ड बैठक मे तय हुआ था कि आरबीआई की एक आंतरिक कमेटी इस पर बैठक कर कर्ज बांटने में की जा रही सख्ती में ढील देगी. 19 नवंबर की बोर्ड बैठक में इस बात पर भी सहमति बन गई थी कि एमएसएमई (लघु और मध्यम उद्योग) को दिये जाने वाले 25 करोड़ तक के कर्ज की शर्ते अासान कर दी जाएंगी.

जानकार मानते हैंं कि मोदी सरकार के थोड़ा नर्म होजाने के पीछे सोच यह थी कि पहले चुनावी साल में बाजार और लघु उद्योगों की धन की समस्या को ठीक किया जाए, अारक्षित कोष वाले मसले को बाद में सुलझा लिया जाएगा. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया क्योंकि शायद उर्जित पटेल भी कुशल आर्थिक पेशेवरों की तरह सोच रहे थे.

पीसीए फ्रेमवर्क में ढील देने की बात पर उर्जित और उनकी टीम इसलिये राजी हुई थी कि वे भी पहले सरकारी दबाव को कुछ कम करना चाहते थे. इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि आरबीआई ने अब तक इस मामले में कोई ढील नहीं दी है. सूत्रों के मुताबिक पिछले हफ्ते इस ढील पर विचार करने को लेकर आरबीआई की आंतरिक कमेटी (बीएफएस-बोर्ड आफ फाइनेंशियल सुपरविजन) की बैठक भी हुई. लेकिन उसमें बैंकों को कर्जे बांटने में रियायत देने पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया. इसके अलावा जीएसटी और नोटबंदी के दुष्प्रभावों से जूझ रहे एमएसएमई सेक्टर को आसान शर्तों पर कर्ज देने के मामलेे में भी बात बहुत ज्यादा बात बनती नहीं दिख रही थी.

जानकारों का कहना है कि सरकार को लग रहा था कि इन दोनों मसलों पर तो उसे तुरंत ही सहूलियत मिल सकती है. लेकिन आरबीआई जिस कड़े ढंग से इस पर विचार कर रहा था, उससे बैठक के बीस दिन बाद भी इन पर कोई फैसला नहीं हो सका. चुनावी साल है और सरकार के पास अब समय कम बचा है, एेसे में अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर पहले से परेशान मोदी सरकार को उर्जित पटेल के इस रुख ने और बेचैन कर दिया.

अब तक वित्त मंत्रालय को यह भी महसूस हो गया कि बैंकों को कर्ज बांटने में ढील देने जैसे मुद्दों पर ही जब उर्जित पटेल इतने कड़े फैसले ले रहे हैं तो आरबीआई के अारक्षित कोष पर तो वे कतई नहीं मानेंगे. जानकारों का मानना है कि सरकार चुनाव से पहले आरबीआई के रिजर्व में से पैसे हासिल कर लोकलुभावन योजनायें घोषित करना चाहती है. इस मसले पर उसके दबाव का असर यह रहा कि आरबीआई की पिछली बोर्ड बैठक में यह सहमति बन गई कि आरबीआई को कितना पैसा आरक्षित रखना चाहिए और कितना सरकार को अंशदान देना चाहिए, इस पर दोनों मिलकर कमेटी गठित करेंगे.

बोर्ड बैठक के बाद ही वित्त विभाग के अधिकारियों ने बयान जारी करने शुरु कर दिए कि जल्द ही आरबीआई का कैपिटल फ्रेमवर्क तय करने के लिए विशेषज्ञ कमेटी बन जाएगी जो एक महीने में इस पर अपनी रिपोर्ट दे देगी. जानकार इसे सरकार के आरबीआई पर दबाव बनाने के तौर पर ले रहे थे. लेकिन अभी तक इस मामले में भी कोई प्रगति नहीं हुई है. सूत्र बताते हैं कि आरबीआई और सरकार में इस बात पर मतभेद हैं कि कमेटी किसके नेतृत्व में बनाई जाए.

इन सभी वजहों से 19 नवंबर की बोर्ड बैठक के बाद सरकार औऱ आरबीआई में जो ‘सद्भाव’ दिख रहा था, वह खत्म होने लगा. इसके बाद, जानकार मानते हैैं कि सरकारी इच्छा के प्रतिनिधि माने जाने वाले गुरुमूर्ति और उनके खेमे को बोर्ड की अगली बैठक में वह मुद्दा उठाने का इशारा मिल गया जो सीधे आरबीआई की स्वायत्तता से जुड़ा है. गुरुमूर्ति ने पिछली बोर्ड बैठक से पहले यह कहा था कि आरबीआई एक्ट के मुताबिक रिजर्व बैंक का मुखिया गवर्नर नहीं बल्कि उसका बोर्ड है. जबकि पारंपरिक तौर पर आरबीआई की स्वायत्ता का मतलब इस बात से लगाया जाता है कि बोर्ड सामान्य प्रबंधन और आर्थिक मसलों पर अपनी राय दे सकता है. लेकिन नीतिगत निर्णय गवर्नर और उनकी टीम ही लेती है.

जानकारों का मानना है कि अब तक इस बात से परहेज कर रही मोदी सरकार भी गुरुमूर्ति की इस राय से सहमत हो चुकी है कि बोर्ड संचालित आरबीआई का सरकार के साथ तालमेल बेहतर रहेगा. विशेषज्ञ इस बात को इस तरह से भी देखते हैं कि इससे आरबीआई में सरकार की राय के मुताबिक फैसले होंगे और गवर्नर की भूमिका न्यूनतम हो जाएगी. जबकि पूरी दुनिया का अर्थ जगत अब तक यह बात मानता रहा है कि भारत का केंद्रीय बैंक सरकार के नियंत्रण सेे मुक्त है.

कहा जाता है कि उर्जित पटेल यह तो पहले ही भांप गए थे कि अारबीआई-सरकार का यह विवाद किसी वैचारिक असहमति से ज्यादा अारबीआई पर नियंत्रण का हो चला है और इसके तार अर्थशास्त्र से कम राजनीतिशास्त्र से ज्यादा जुड़े हैं. लेकिन फिर उन्हें यह भी लगने लगा कि इन सब बातों को लेकर उन्हें निजी तौर पर निशाना बनाया जा सकता है. जानकार मानते हैं कि इसलिए उन्होंने 14 दिसंबर की बोर्ड बैठक से पहले ही इस्तीफा दे दिया.

उनकी यह आशंका गलत थी, एेसा भी नहीं लगता है क्योंकि पिछले दिनों चर्चा चली थी कि सरकार आरबीआई गवर्नर के पद पर किसी अर्थशास्त्री के बजाय अपने मनपसंद आईएएस अधिकारी को चाहती है. उर्जित पटेल की जगह अब रिटायर्ड आईएएस शक्तिकांत दास ले चुके हैं.

आखिरी बात यह कि उर्जित पटेल और मोदी सरकार के बीच किस तरह का रिश्ता हो चुका था इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि अपने लिखित इस्तीफे में उन्होंने प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को औपचारिक धन्यवाद तक नहीं दिया.