कमलनाथ महज़ 34 साल के थे जब वे छिंदवाड़ा से चुनाव लड़ने के लिए मध्य प्रदेश आए थे. बल्कि कहा तो यह जाता है कि कांग्रेस के नेतृत्व यानी गांधी परिवार ने उन्हें यहां भेजा था. यह बात है 1980 की. जनवरी का महीना था. उस वक़्त तक ‘कमल’ (भारतीय जनता पार्टी) अस्तित्व में नहीं आया था. ‘हलधर किसान’ (जनता पार्टी का चुनाव चिन्ह) था. कमलनाथ पहली बार उसी से मुकाबले के लिए उतरे और उसे चित कर के दंगल छोड़ा. जनता पार्टी के प्रतुल चंद्र द्विवेदी को उन्होंने हराया था उस वक्त. वह भी 70,141 वोटों से.

तब किसी को उम्मीद नहीं थी कि सत्ताधारी (जनता पार्टी तब केंद्र में सरकार चला रही थी) दल के एक दिग्गज को दूर देश (कमलनाथ उत्तर प्रदेश के कानपुर में रहने वाले एक बंगाली कारोबारी परिवार में जन्मे हैं) से आया एक युवा ऐसे हरा देगा. लेकिन कमलनाथ ने यह कर दिखाया. सिर्फ़ इतना ही नहीं, वह चुनाव कमलनाथ के लिए ऐसा आधार भी साबित हुआ जिस पर पैर जमाकर वे 2014 तक लगातार नौ बार ‘कमल के नाथ’ साबित हुए. यानी हर लोक सभा चुनाव में भाजपा या उसके सहयोगी दल पर भारी पड़े.

हालांकि इस बीच मई 1996 में एक ‘क्षेपक’ (सिलसिला तोड़ने वाला) आया. तब जैन हवाला कांड में कमलनाथ का नाम भी आया. उनके ख़िलाफ़ आरोप पत्र दायर हो गया. इसलिए उन्हें कांग्रेस के तत्कालीन नेतृत्व (तब के प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव) ने टिकट नहीं दिया. लेकिन वे पार्टी छोड़कर न जाएं (तब अर्जुन सिंह, नारायणदत्त तिवारी और माधवराव सिंधिया जैसे नेताओं ने कांग्रेस से अलग होकर नई पार्टियां बना ली थीं) इसलिए उनकी पत्नी अल्कानाथ को टिकट दे दिया. कमलनाथ की सीट सुरक्षित रही और जब वे हवाला कांड से बरी हुए तो अल्का ने उनके लिए सीट छोड़ दी. छिंदवाड़ा लोक सभा सीट पर 1997 में उपचुनाव हुआ, जो इकलौता मौका था जब ‘कमल’ ने ‘नाथ’ को शिकस्त दी. भारतीय जनता पार्टी के सुंदरलाल पटवा ने यह कारनामा किया था.

हालांकि इसके अगले ही साल 1998 में कमलनाथ ने फिर वापसी की और तब से अब तक कमल के नाथ साबित होने का उनका सिलसिला टूटा नहीं है. अब इस विधानसभा चुनाव को ही ले लें. चुनाव से महज़ सात महीने पहले मई में कमलनाथ प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बनकर आए थे. कोई मानने को तैयार नहीं था कि भारी-भरकम संगठन, भरे-पूरे खजाने और अपेक्षाकृत ऊर्जावान नेतृत्व (शिवराज सिंह चौहान 59 साल के हैं जबकि कमलनाथ 72 के) से भरी भाजपा के लिए प्रदेशव्यापी स्तर पर वे चुनौती बन सकेंगे. इसकी वज़ह भी थी क्योंकि कमलनाथ ने इससे पहले छिंदवाड़ा के अलावा कभी प्रदेश की राजनीति में ज़्यादा दख़ल दिया नहीं था. इसीलिए इस तरह की धारणा स्वाभाविक थी. लेकिन उन्होंने यह धारणा तोड़ी और इस उम्र में भी साबित किया कि ‘कमल-नाथ’ वे ही हैं.

यही कारण है कि अब जबकि कांग्रेस मध्य प्रदेश में 15 साल के सत्ता वनवास से लौटकर सरकार बनाने जा रही है तो पार्टी ने कमलनाथ को ही अगले मुख्यमंत्री के तौर पर चुना. ख़बरें हैं कि वे 17 दिसंबर को दोपहर 1.30 बजे के आसपास शपथ ले सकते हैं. हालांकि पार्टी के चुनाव जीतने से लेकर मुख्यमंत्री पद तक पहुंचने में उन्हें लगभग 36 घंटे लग गए. बुधवार 12 दिसंबर की शाम जब भोपाल में कांग्रेस विधायक दल की बैठक हुई तो उम्मीद थी कि उनके नाम पर सहमति बन जाएगी. लेकिन उसमें किसी नाम पर फ़ैसला नहीं हो पाया. ज़िम्मेदारी राष्ट्रीय नेतृत्व पर छोड़ दी गई.

इसके बाद अटकलें चल पड़ीं. मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में दो-एक नाम और शुमार हो गए हैं. कमलनाथ की चुनौती बनने वालों में राज्य चुनाव अभियान समिति के मुखिया ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रमुख थे. उन्होंने बुधवार को कहा भी, ‘मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनना मेरे लिए सम्मान की बात होगी.’ इसके बाद भोपाल से दिल्ली से लंबी जद्दोज़ेहद चली. हालांकि अंतिम नतीज़ा कमलनाथ के पक्ष में ही आया. पार्टी नेतृत्व से हरी झंडी मिलने के बाद गुरुवार 13 दिसंबर की रात 11 बजे कांग्रेस विधायक दल ने अपने नेता के रूप में उनके नाम पर मुहर लगा दी.

कमलनाथ अगर मुख्यमंत्री बन रहे हैं तो उसके पीछे उनकी अपनी ख़ासियतें है

कमलनाथ की कुछ अपनी ख़ासियतें हैं जिनके बल पर वे मुख्यमंत्री पद तक पहुंच सके हैं. मसलन- पहले ताे एक दिलचस्प तथ्य जिस पर शायद सब भरोसा न करें लेकिन चर्चा में तो है ही. कमलनाथ का जन्म 18 नवंबर 1946 को हुआ है. इस लिहाज़ से 2018 का साल उनके लिए भाग्यशाली साबित हाे रहा है, अंकज्योतिष वाले ऐसा मानते हैं.

अंकज्योतिष के साथ विधायकों का अंकगणित भी उनके पक्ष में है. कांग्रेस के पास पूर्ण बहुमत नहीं है. उसके 114 विधायक हैं जाे 116 के बहुमत से दो कम है. यानी सरकार बाहरी समर्थन से बन रही है. और ख़बरें हैं कि बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने कमलनाथ के नाम पर ही अपने दो विधायकों का समर्थन कांग्रेस को दिया है.

कमलनाथ काे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का भी सक्रिय समर्थन है. वह भी प्रदेश अध्यक्ष बनने-बनवाने के वक़्त से ही. प्रदेश की राजनीति के जानकार मानते हैं कि दिग्विजय के समर्थन और रणनीति ने ही कमलनाथ को मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचाया है. कमलनाथ के लिए दिग्विजय का यह समर्थन-सहयोग आगे भी निर्णायक होने वाला है क्योंकि पार्टी के नए विधायकों में लगभग दो-तिहाई इन्हीं दोनों के समर्थक हैं. यही नहीं, जो चार निर्दलीय कांग्रेस को समर्थन दे रहे हैं वे भी पार्टी के पूर्व नेता हैं और इनमें से कम से कम दो दिग्विजय समर्थक हैं. ऐसे में कमलनाथ के मंत्रिमंडल पर ‘दिग्विजय की स्वाभाविक छाया’ नज़र आ सकती है.

इस अंकज्योतिष और अंकगणित के अलावा कुछ बातें और. इनमें एक ये कि कांग्रेस ने इस बार चुनाव दो प्रमुख मुद्दों पर लड़ा था. पहला- सरकार बनने के 10 दिन के भीतर किसानों की कर्ज़माफ़ी. दूसरा- युवाओं को रोज़गार. दोनों मसले अर्थतंत्र से जुड़े हैं. राज्य पर 1.87 लाख करोड़ रुपए का कर्ज़ है. ऐसे में कर्ज़माफ़ी तब तक नहीं हो सकती जब तक बाहर से बड़े निवेश की शक़्ल में आर्थिक मदद न मिले. एक अनुमान के मुताबिक नई सरकार को किसानों का कर्ज़ माफ़ करने के लिए ही 50,000 करोड़ रुपए से अधिक की अतिरिक्त रकम की ज़रूरत पड़ सकती है. ऐसे ही रोज़गार का सृजन भी तभी हो सकेगा जब भारी-भरकम निवेश हो.

जानकारों की मानें तो पार्टी के लिए इस माेर्चे पर कमलनाथ जैसा नेता ही काम आ सकता है. कमलनाथ ख़ुद काराेबारी हैं. देश के कई कारोबारी घरानों से उनके अच्छे संबंध हैं. वे केंद्र में उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री रह चुके हैं. वाणिज्य में स्नातक हैं. इस लिहाज़ से उन्हें आर्थिक, कारोबारी और वित्तीय प्रबंधन की बेहतर समझ है, जिसकी नई सरकार को सबसे ज़्यादा ज़रूरत होगी. यह बात अब तक प्रदेश के वित्त मंत्री रहे जयंत मलैया भी कह चुके हैं.

इसके अलावा कमलनाथ की मित्रता दूसरे दलों में भी पर्याप्त है. इसका प्रमाण यह है कि सरकार बनाने का दावा करने के तुरंत बाद वे निवर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से मिलने गए थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी उनके अच्छे संबंध हैं और केंद्र के कई बड़े मंत्रियों से भी. यह स्थिति भी राज्य में सरकार चलाने और लोक सभा चुनाव से पहले बेहतर नतीज़े देने में कांग्रेस के लिए मददग़ार हाे सकती है.

अलबत्ता राजनीति में कभी भी, कुछ भी हो सकता है. ऐसे में ‘श्रीमान बंटाढार’ का तमगा ले चुके दिग्विजय, जो फिलहाल पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व के लिए अब प्राथमिक अहमियत रखने वाले नेताओं में नहीं हैं, का समर्थन-सहयोग तथा उद्योग-कारोबार समर्थक छवि ही आगे कभी कमलनाथ की राह में कांटे बिछाने लगे तो कोई बड़ी बात न कहलाएगी.

ज्योतिरादित्य सिंधिया के पास भी समर्थन कम नहीं

कमलनाथ के मुकाबले ग्वालियर राजघराने के मौज़ूदा प्रमुख ज्योतिरादित्य सिंधिया थे जिन्हें ‘राज-राजनीति’, ‘संपत्ति (20,000 करोड़ रुपए)-संबंध (गांधी परिवार से)’ जैसी सब चीजें विरासत में मिली हैं. मुंबई में एक जनवरी 1971 को जन्मे ज्योतिरादित्य ने ये विरासत तब संभाली जब 30 सितंबर 2001 को उनके पिता माधवराव सिंधिया का एक विमान दुर्घटना में निधन हो गया. इससे राजघराने के प्रमुख की गद्दी और गुना-शिवपुरी लोक सभा सीट (यहां से माधवराव चुने गए थे) दोनों खाली हो गईं. इस सीट पर फरवरी-2002 में उपचुनाव हुआ और ज्योतिरादित्य पहली बार यहां से जीतकर लोक सभा में पहुंचे, 31 साल की उम्र में.

हालांकि इसके बाद वे इसी सीट से लगातार तीन बार लोक सभा का चुनाव जीतकर अपना जनाधार बनाते और बढ़ाते रहे. इसका प्रमाण ये है कि आज कांग्रेस की तरफ़ से प्रदेश के युवाओं में ख़ास तौर पर सबसे लोकप्रिय चेहरा अगर कोई है तो वे सिंधिया हैं. बल्कि अन्य आयु वर्ग के लोग भी उन्हें पसंद करते हैं. वे भी केंद्र में मंत्री रहे हैं. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के विश्वासपात्र भी हैं. इसीलिए पार्टी ने उन्हें 2013 में और इस बार भी लगातार प्रदेश चुनाव अभियान समिति के प्रमुख की ज़िम्मेदारी दी. इसे उन्होंने शिद्दत से निभाया भी.इसका प्रमाण एक छोटे से वाक़ये से मिल सकता है.

अभी 11 दिसंबर को मतगणना वाले दिन की बात है. सुबह नौ-दस बजे से ही प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में कमलनाथ के साथ सिंधिया उन दिग्विजय के साथ मिलकर पल-पल की रणनीति को अंज़ाम दे रहे थे जिनके साथ उनकी अनबन की ख़बरें अक़्सर आती रहती हैं. लेकिन उस रोज तीनों रात को तीन बजे प्रदेश कार्यालय से बाहर निकले. इसके महज़ तीन-चार घंटे बाद ही अगले दिन दिग्विजय के साथ एक गाड़ी में बैठकर सिंधिया फिर कमलनाथ के पास जा पहुंचे. उनके इस सक्रिय समर्थन और सहयोग का पार्टी कार्यकर्ताओं पर कैसा असर हुआ इसका भी एक उदाहरण है. गुरुवार, 13 दिसंबर की सुबह स्थानीय अख़बारों में छपी ख़बरों की मानें तो लगभग 50 कांग्रेस विधायकों ने राजधानी भोपाल के एक होटल में सिंधिया से मुलाकात की थी. इसमें उन्होंने अगले मुख्यमंत्री के तौर पर उनके लिए अपना समर्थन जताया.

लिहाज़ा इस मेहनत और समर्थन के बलबूते उनका मुख्यमंत्री पद के लिए दावेदारी जताना स्वाभाविक था, जो उन्हाेंने जताई भी. वहीं से मामले में पेंच फंस गया और मामला भोपाल से दिल्ली पहुंच गया.

दोनों के बीच से रास्ता किस तरह निकला?

फिर दिल्ली में दोनों नेताओं के बीच सुलह कैसे हुई? इस बाबत सूत्रों के हवाले से शुक्रवार को अख़बारों में तमाम ख़बरें आईं. इनमें बताया गया कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जब सिंधिया और कमलनाथ को मनाने में सफल नहीं हुए तो उनकी मां और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की प्रमुख सोनिया गांधी तथा ‘संकटमोचक’ कही जाने वाली बहन प्रियंका वाड्रा काे दख़ल देना पड़ा. उन्होंने सिंधिया को समझाइश दी कि प्रदेश के मुखिया को सिर्फ़ सरकार नहीं चलानी है. दिग्विजय, सुरेश पचौरी, अजय सिंह, अरुण यादव जैसे दिग्गजों और ख़ुद एक-दूसरे (कमलनाथ-सिंधिया) से तालमेल भी बिठाना है. इसमें कमलनाथ अपने अनुभव और वरिष्ठता के बल पर वज़नदार साबित हो सकते हैं. चुनाव के दौरान उनकी यह ख़ासियत काम आई है, यह कांग्रेस के पक्ष में आए नतीज़ों से पुष्ट भी हुआ है.

इधर ‘सत्याग्रह’ को भी कुछ सूत्रों ने बताया कि राहुल गांधी ने प्रदेश के कई ज़मीनी नेताओं, विधायकों आदि को ख़ुद फोन कर अगले मुख्यमंत्री के तौर पर उनकी पसंद पूछी थी. उसमें भी अधिकांश ने अपनी पहली पसंद कमलनाथ को ही बताया. इस तरह कमलनाथ के लिए रास्ता बनता गया और अब वे अपनी सरकार गठन के रास्ते पर हैं.