पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे भारतीय जनता पार्टी के लिए काफी अलग रहे. 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से विधानसभा चुनावों में भाजपा को लगातार कामयाबी मिली थी. दिल्ली, बिहार और पंजाब को अपवाद मान लें तो 2014 के बाद हुए अधिकांश विधानसभा चुनावों में भाजपा ने कांग्रेस और दूसरे दलों को सत्ता से बेदखल करने का ही काम किया. पांच राज्यों के हालिया विधानसभा चुनावों में भाजपा द्वारा शासित तीन राज्य दांव पर लगे थे. इनमें भाजपा को सबसे मजबूत छत्तीसगढ़ में माना जा रहा था. लेकिन वहां ही सबसे पहले यह स्पष्ट हो गया कि भाजपा बुरी तरह हार रही है. राजस्थान में भाजपा की जितनी बड़ी हार की आशंका थी, उतनी बड़ी हार नहीं हुई. मध्य प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस में कड़ी टक्कर जरूर हुई लेकिन अंतिम बाजी कांग्रेस के हाथ ही लगी.

जानकारों के मुताबिक इन नतीजों में भाजपा के लिए पांच अहम सबक छिपे हैं:

मोदी का जादू ढलान पर

इन विधानसभा चुनावों के नतीजों से भाजपा के लिए एक स्पष्ट संकेत यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू आम लोगों पर उस कदर नहीं चल रहा है जिस तरह से 2014 के लोकसभा चुनावों में चला था या उसके बाद हुए विधानसभा चुनावों में. हालांकि, इस बार नरेंद्र मोदी ने चुनावी राज्यों में पहले के विधानसभा चुनाव वाले राज्यों के मुकाबले कम सभाएं की हैं. राजस्थान और मध्य प्रदेश में प्रधानमंत्री की दस-दस चुनावी सभाएं हुई थीं और छत्तीसगढ़ में पांच. छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य में पांच चुनावी सभाओं के पहले भी प्रधानमंत्री ने पिछले कुछ महीने में कई सभाएं कीं. इसके बावजूद भाजपा की जितनी बड़ी हार हुई है, उससे यही संकेत मिलता है कि नरेंद्र मोदी का जादू कम हो रहा है. राजस्थान और मध्य प्रदेश में आखिरी मौके पर प्रधानमंत्री की सभाओं का असर भाजपा के पक्ष में उतना नहीं दिखता जितना गुजरात और कर्नाटक जैसे राज्य में दिखा था.

दोहरी सत्ता विरोधी लहर का असर

इन विधानसभा चुनावों के नतीजों का एक सबक यह भी है कि आम लोगों में सत्ता विरोधी लहर का असर है. छत्तीसगढ़ के सुशासन की तारीफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह समेत पार्टी के कई राष्ट्रीय नेता करते रहे हैं. ऐसे ही मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान सरकार के कामकाज की तारीफ भी भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर करती रही है. राजस्थान में जहां वसुंधरा राजे कमजोर दिख रही थीं, वहां केंद्र की मोदी सरकार के कामों का बखान भाजपा ने जमकर किया. इसके बावजूद आम मतदाता इन बातों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है. इन चुनावी नतीजों से भाजपा को यह सबक लेना चाहिए कि जिन राज्यों में उनकी सरकारें हैं, वहां उनके खिलाफ दोहरी सत्ता विरोधी लहर काम कर रही है. ऐसे में भाजपा को तकरीबन छह महीने बाद होने वाले 2019 के लोकसभा चुनावों में अपने पक्ष में माहौल करने के लिए इस सत्ता विरोधी लहर को कुंद करने की दिशा में काम करना होगा.

अमित शाह के प्रबंधन पर सवाल

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में जब मायावती की बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन नहीं हुआ तो कई ऐसे लोग थे जो इसमें भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की भूमिका देख रहे थे. छत्तीसगढ़ में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के नेतृत्व में नई पार्टी के चुनावी मैदान में उतरने और मायावती के साथ इसके गठबंधन को अमित शाह का मास्टरस्ट्रोक बताया जा रहा था. मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी कई छोटे दलों के बारे में यह कहा गया कि वे अमित शाह की शह पर चुनाव मैदान में हैं. इन तीनों राज्यों में कांग्रेस से आए कई नेताओं को अमित शाह ने भाजपा का टिकट दिलाया. लेकिन ये प्रयोग इन चुनावों में बुरी तरह से नाकाम हो गए. इसमें भाजपा के लिए यह सबक छिपा है कि सिर्फ अमित शाह के चुनावी प्रबंधन के बूते कठिन चुनावों को नहीं जीता जा सकता बल्कि कुछ दूसरे तरीके भी आजमाने होंगे.

किसानों की नाराजगी

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनावी नतीजे यह बताते हैं कि किसानों में भाजपा को लेकर नाराजगी का माहौल है. इन तीनों राज्यों में बड़ी संख्या में किसान हैं. इन राज्यों की बड़ी आबादी जीवनयापन के लिए कृषि पर निर्भर है. इन राज्यों में पिछले कुछ महीनों में किसान आंदोलन भी हुए. मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान ने किसानों की नाराजगी दूर करने के लिए भावांतर योजना की शुरुआत की थी. शिवराज सरकार की इन कोशिशों का असर चुनावी नतीजों में भी दिख रहा है. सभी चुनावी राज्यों में मध्य प्रदेश के परिणाम ही ऐसे हैं जहां कांग्रेस और भाजपा के प्रदर्शन में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है. छत्तीसगढ़ और राजस्थान में किसानों का गुस्सा काम करने की कोई प्रभावी पहल भाजपा की ओर से नहीं हो पाई. इस वजह से इन राज्यों में किसानों का गुस्सा बढ़ा और भाजपा के खिलाफ नतीजे आए. अब भी 2019 के लोकसभा चुनावों में छह महीने का वक्त बचा है. भाजपा के पास यह अवसर है कि वह कुछ ऐसे प्रभावी काम करे कि जिससे किसानों का गुस्सा उसके प्रति कम हो सके.

कांग्रेस एक चुनौती

इन विधानसभा चुनावों के नतीजे बताते हैं कि ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ की बात करने वाली भाजपा के लिए कांग्रेस एक मजबूत चुनौती के तौर पर उभर रही है. तकरीबन साल भर पहले हुए गुजरात विधानसभा चुनावों में उसने भाजपा को प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय अध्यक्ष के गृह राज्य में कड़ी टक्कर दी थी. इस बार जिस छत्तीसगढ़ को लेकर भाजपा पूरी तरह से आश्वस्त थी, वहां कांग्रेस ने भाजपा को बुरी तरह पराजित किया. राजस्थान में भी कांग्रेस को कामयाबी मिली. मध्य प्रदेश में भी कड़े मुकाबले में कांग्रेस को कामयाबी हासिल हुई. इससे स्पष्ट है कि अब भाजपा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को अपनी चुनावी रणनीति कांग्रेस को एक चुनौती मानते हुए बनानी पड़ेगी. इन्हें यह भी समझना होगा कि इस बार के विधानसभा चुनावों में भाजपा का सीधा मुकाबला कांग्रेस से था न कि किसी क्षेत्रीय पार्टी से. इसके बावजूद भाजपा कांग्रेस का मुकाबला ठीक से नहीं कर पाई.