दुनिया में जितनी जिज्ञासा नास्त्रेदमस की भविष्यवाणियों ने जगाई है उतनी शायद ही किसी और भविष्यवेत्ता की भविष्यवाणियों ने पैदा की हो. उसे सोलहवीं शताब्दी का सबसे विवादित व्यक्ति भी कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा. पिछले 450 सालों से वह चर्चा में बना हुआ है. उसकी भविष्यवाणियों को आज भी लोग होने वाली घटनाओं के साथ जोड़कर देखते हैं. वह चाहे जॉन कैनेडी की मौत हो या फिर हिटलर और नेपोलियन का उद्भव या पराभव, दो-दो विश्व युद्ध हों या महामारियां और बड़े हादसे, लोग नास्त्रेदेमस की बात करते नहीं थकते. उसकी भविष्यवाणियां विज्ञान को चुनौती देती हुई प्रतीत होती हैं क्योंकि विज्ञान तो भविष्य की अवधारणा को नकारता रहा है.

बचपन

नास्त्रेदमस फ़्रांस के यहूदी परिवार में पैदा हुआ था. उसके जन्म से पहले परिवार ने ईसाई धर्म अपना लिया था. कहते हैं कि डॉक्टरी की उसकी पढ़ाई के दौरान उसके शहर में प्लेग की बीमारी फैली जिसकी वजह से उसने पढ़ाई बीच में छोड़ दी और बीमारों की देखभाल करने लगा. बाद में उसने अधूरी पढ़ाई पूरी कर डिग्री हासिल की. कुछ साल बाद एक बार फिर प्लेग की महामारी फैली, जो उसके परिवार को लील गयी. नास्त्रेदमस को इस झटके से उबरने में लगभग 10 साल लग गए. इस दौरान वह शहर दर शहर भटकता रहा. कहा जाता है कि इसी दौरान एक बार इटली में पादरियों का एक समूह उसके नज़दीक से गुजर रहा था कि तभी एक पादरी के सामने, ‘वो क्यूं न सजदे में झुके’ कहते हुए, घुटने टेक कर बैठ गया. नास्त्रेदमस की मौत के 15 साल बाद वह पादरी ईसाइयों का सर्वोच्च धार्मिक गुरू यानी पोप नियुक्त हुआ था.

नास्त्रेदमस के बारे में प्रचलित है कि वह रात में घंटों तिपाई पर पानी से भरे पीतल के पात्र में भविष्य की घटनाओं को देखता था. जल्द ही वह इन घटनाओं को लिखने लग गया. ये भविष्यवाणियां 1555 में ‘सेंचुरीज’ नाम की क़िताब में दर्ज़ की गईं. नास्त्रेदमस ने भविष्यवाणियों को फ़्रांसीसी भाषा में चौपाई के रूप में लिखा. ये चौपाइयां मुहावरे और मज़ाकिया लहजे में भी लिखी गई हैं. ऐसा करने के पीछे कहा जाता है कि नास्त्रेदमस चर्च की सत्ता से टकराना नहीं चाहता था और न ही यह चाहता था कि आम जन इसे आसानी से पढ़ पाएं. इन भविष्यवाणियों में ज़्यादातर हादसों और दुखद घटनाओं और महामारियों का ज़िक्र है.

‘सेंचुरीज’ किताब ने उसे यूरोप की दुनिया में मशहूर कर दिया. उसके बाद उसने सालों के पंचांग भी बनाए. ‘सेंचुरीज’ में कुल मिलाकर दस सेंचुरी हैं. यहां सेंचुरी का मतलब शताब्दी नहीं है, बल्कि 100 चौपाइयों के संकलन को एक सेंचुरी कहा गया है. किसी एक सेंचुरी में पूरी 100 चौपाइयां न होने के कारण कुल चौपाइयों की संख्या 943 है.

भविष्यवाणियां जो ‘सच’ हुईं

यहां एक बात कहना ज़रूरी है कि नास्त्रेदमस के समर्थकों ने ‘सेंचुरीज’ में दर्ज़ भविष्यवाणियों का भावार्थ किसी घटना के होने के बाद उससे जोड़कर देखने की कोशिश की है. मिसाल के तौर पर एक चौपाई है- ‘इटली के नज़दीक एक राजा पैदा होगा, जिससे राज्य को काफ़ी नुकसान होगा, वो किसी के साथ रिश्ते (राजनीतिक) बनाएगा, तो वो राजा कम और कसाई ज़्यादा नज़र आएगा.’ नास्त्रेदमस ने उसका नाम पोउ-ने-लोरोन बताया है. अक्षरों का क्रम बदलकर देखने में यह नेपोलियन जैसा बनता हुआ दिखता है. उसने आगे लिखा, ‘छोटे बालों वाला सत्ता हथिया लेगा, उस समुद्री शहर में जिस पर दुश्मनों का कब्ज़ा होगा, वो अपने दुश्मनों को निकाल बाहर करेगा, 14 सालों तक शासन करेगा.’ ये बातें आश्चर्यजनक रूप से नेपोलियन की जिंदगी से मिलती हैं.

इसी प्रकार, कुछ चौपाइयों को हिटलर और सत्रहवीं शताब्दी में लगी लंदन की आग से जोड़कर देखा गया है. उसने कहा था कि दुनिया 3 एंटी-क्राइस्ट यानी ईसाइयत विरोधी लोगों से आतंकित रहेगी. पहले दो तो नेपोलियन और हिटलर माने गए हैं जबकि तीसरे के बारे में अब भी कयास ही लगाए जा रहे हैं. कुछ उसे मध्य एशिया में पैदा हुए ओसामा बिन लादेन या सद्दाम हुसैन मानते हैं, कुछ कहते हैं कि वह चीन या मंगोलिया से आयेगा. क्या वह दक्षिण कोरिया का किम जोंग उन हो सकता है जो दुनिया में डर फैलाए बैठा है? इसी प्रकार पहली सेंचुरी की चौदहवीं चौपाई को फ़्रांस की क्रांति से जोड़कर देखा गया.

भारत के संदर्भ में कही गई बातें

10वीं सेंचुरी की 75वीं चौपाई है - ‘काफ़ी इंतज़ार के बाद भी वो यूरोप नहीं आएगा, वो एशिया में अवतरित होगा, ईश्वर का अवतार होगा, पूर्व के सभी राजा उसकी सत्ता स्वीकारेंगे’. इसको भारत से जोड़कर देखा गया है.

सेंचुरी 10 की 96वीं चौपाई में कहा गया है - ‘सागर के नाम वाले धर्म की जीत होगी, अदुलउनकातिफ़ जाति के लड़के से, जिद्दी और रोने वाली जाति डरेगी, दोनों ही अलेफ़ और अलेफ़ के हाथों घायल होंगे.’

सागर के नामवाला धर्म तो हिंदू ही है, तो क्या इस चौपाई में नास्त्रेदमस ने हिंदू और ईसाई धर्म के आपस में लड़ने की बात कही है या किसी अन्य धर्म के हाथों हिंदू धर्म का प्रताड़ित होना बताया है और आख़िर में भारत की जीत बताई है?

पहली सेंचुरी की 50वीं चौपाई में ज़िक्र है- ‘वो ज़मीन जहां तीन समुद्रों के पानी मिलते हैं वहां एक शख्स पैदा होगा, बृहस्पतिवार (गुरुवार) जिसकी पूजा का दिन होगा, ज़मीन और समुद्र में उसकी ख्याति, शासन और ताक़त बढ़ेगी. वो दुनिया को मुश्किल में डालेगा.’ कइयों ने इसे दक्षिण भारत से जोड़कर देखा है. इसके समर्थन में वे यह भी कहते हैं कि सिर्फ़ हिंदू धर्म में ही गुरुवार पूजा जाता है. तो क्या यह मान लिया जाये कि दुनिया का अगला शासक दक्षिण भारत में पैदा होगा?

आलोचकों के मत

विज्ञान का आधार तर्क है. भविष्य देखने वाली बात कुछ लोगों को तार्किक नहीं लगती. मशहूर जादूगर जेम्स रैंडी ने अपनी क़िताब ‘द मास्क ऑफ़ नास्त्रेदमस’ में उसकी भविष्यवाणियों को फर्जी बताया है. रैंडी ऐसी किसी भी असाधारण घटना को सिरे से नकारते हैं. उनके मुताबिक़ एक भी चौपाई किसी घटना से नहीं जुडती. तार्किक लोगों का मानना है कि नास्त्रेदमस ने सभी बातें घुमा-फिरा कर कही हैं और एक भी भविष्यवाणी घटना के पहले नहीं बताई जा सकी है.

फ़्रांस के शासक हेनरी द्वितीय की मौत की भविष्यवाणी, जो बढ़-चढ़कर बताई जाती है, का सच कुछ और भी है. नास्त्रेदमस ने लिखा था कि हेनरी खेल-खेल में आंख में घायल होकर मृत्यु को प्राप्त होगा. इस भविष्यवाणी का ज़िक्र पहली बार 1614 में होता है जबकि उसकी पहली किताब 1555 में ही आ गयी थी. तो क्या नास्त्रेदमस के इर्द-गिर्द एक आभामंडल रचा गया है? क्या यह एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है? रैंडी की बातों का वैज्ञानिक भी समर्थन करते हैं. उनके मुताबिक़ कोई भी गतिविधि रहस्यमयी या जादुई नहीं होती है और भविष्य की उद्घोषणा कल्पना भर है.

नास्त्रेदमस ने 1999 के सातवें महीने में दुनिया पर आसमानी आफ़त के टूटने का ज़िक्र किया है और ऐसा करने वाले को उसने मंगोल के क्रूर शासक चंगेज़ ख़ान के बराबर माना था. पर ऐसा नहीं हुआ. हां, लगभग दो साल बाद न्यूयॉर्क के ट्विन टावर्स पर अलकायदा के हमले को लोग इससे जोड़ते हैं. जिस तीसरे एंटी क्राइस्ट का ज़िक्र उसने किया था, वह उन्हें ओसामा बिन लादेन या सद्दाम हुसैन या फिर इस्लामिक स्टेट के बगदादी में नज़र आता है. उसकी भविष्यवाणियों में एंटी क्राइस्ट के सिद्धान्त को ऐसे समझा जा सकता है. चूंकि नास्त्रेदमस कट्टर ईसाई था और उसके काल में इस्लाम तेज़ी से यूरोप को प्रभावित कर रहा था, कई मोर्चों पर मुसलमान लड़ रहे थे, लिहाज़ा उसने ये सब बातें अपने पूर्वानुमान से कही होंगी.

1999 में दुनिया ख़त्म होने की बात पर कई लेखकों ने साइंस फ़िक्शन गढ़ दिए हैं. चार्ल्स बेर्लित्ज़ की ‘डूम्सडे 1999’ एक बेहद चर्चित किताब थी जो 31 दिसंबर, 1999 को दुनिया के ख़त्म होने का एलान कर रही थी. पर ऐसा नहीं हुआ. समर्थक उसकी भविष्यवाणियों में तीसरे विश्वयुद्ध की संभावना तलाशते हैं. ऐसा होगा, नहीं कहा जा सकता. नास्त्रेदमस के कई पूर्वानुमान सच साबित नहीं हुए हैं.

मनोविज्ञान के स्तर से भी नास्त्रेदमस के प्रभाव को समझा जा सकता है. इंसान की अवचेतना में रहस्य का काफ़ी महत्व है. मनुष्य भविष्य बनाने से ज़्यादा, उसके बारे में जानने को इच्छुक रहता है. ‘कल क्या होने वाला है?’ और ‘कब होगा?’ इन दो सवालों ने उसको उद्गम से ही परेशान कर रखा है. नास्त्रेदमस या अन्य पूर्वानुमानी इस समस्या का फ़ोरी तौर पर हल करते है. ‘कल’ की खोज में वैज्ञानिक और भविष्यवेत्ता जुटे हुए हैं. जहां एक ओर तर्क है, दूसरी ओर सिर्फ़ विश्वास. विज्ञान फ़िलहाल जीतता नज़र आ रहा है.

मृत्यु से जुड़ी भविष्यवाणी

किस्सा है कि एक जुलाई, 1566 की शाम जब अपना काम ख़त्म करके नास्त्रेदमस की सचिव ने कल मिलने की बात कहते हुए आज्ञा मांगी, तो उसने कहा कि वह कल का सूरज नहीं देख पायेगा. अगले दिन ऐसा ही हुआ. उसने अपनी वसीयत में लिख छोड़ा था कि उसे बैठी हुई मुद्रा में दफन किया जाए क्योंकि वह नहीं चाहता कि लोग उसकी कब्र पर चलें. ऐसा ही किया गया और उसकी इच्छानुसार एक लोहे की तख्ती पर कुछ लिखकर उसे लाश के साथ छोड़ दिया गया. 1700 में उसके अवशेष कहीं और दफ़नाने के लिए उसकी कब्र को खोदा गया तो वह तख्ती मिली. उस पर लिखा था- साल 1700.