किस्सा है कि अकबर के दरबार में एक बार तानसेन ने एक पद गाया:

‘जसोदा बार-बार यों भाखै,

है कोई ब्रज में हितू हमारो, चलत गोपालहिं राखै.’

अकबर ने सभी सभासदों से इसका अर्थ निकालने को कहा. पहले तानसेन की बारी आई. उन्होंने कहा कि यशोदा पुन: पुन: पुकार लगाती है कि कोई उसके गोपाल को रोक ले. शेख़ फ़ैज़ी ने अर्थ किया - यशोदा बार-बार, यानी रो-रोकर रट लगाती है. बीरबल का कहना था कि ‘बार-बार’ का अर्थ यहां द्वार-द्वार जाकर लोगों से विनती करना है कि गोपाल को जाने से रोको. ख़ाने आज़म कोका ने कहा, ‘बार-बार’ का अर्थ दिन है और यशोदा प्रतिदिन गोपाल को रोकने की रट लगाये हुए है.

अकबर ने अब्दुल रहीम ख़ानख़ाना से भी पूछा. वे बोले, ‘चूंकि तानसेन एक पद को बार-बार गाते हैं, इसलिए उन्होंने ‘बार-बार’ का अर्थ पुनरुक्ति किया है. शेख़ फ़ैज़ी फ़ारसी के शायर हैं तो उन्हें रोने के अलावा कुछ नहीं समझ आया. बीरबल पंडित हैं, उनकी दृष्टि में ये ‘दर-दर’ जाना है. ख़ाने आज़म कोका नुजूमी (ज्योतिषी) हैं, उनका तिथि-वार से ही वास्ता रहता है, इसलिए ‘बार-बार’ का अर्थ उन्होंने दिन-दिन किया, पर हुज़ूर हक़ीक़त ये है कि यशोदा का बाल-बाल यानी रोम-रोम पुकारता है कि कोई तो मिले जो मेरे गोपाल को जाने से रोक ले. देखा जाए तो सभी की व्याख्या उचित है. चूंकि इस पद में मां की ममता झलकती है, तो ‘बार-बार’ का अर्थ रोम-रोम होना सबसे नज़दीक बैठता है.’ आपको बता दें कि बृज भाषा में शरीर के बालों को ‘बार’ ही कहा जाता है.

इस एक पद से अब्दुररहीम (अब्दुल रहीम) ख़ानख़ाना की विद्वता, भाषाई ज्ञान और कृष्ण भक्ति का अंदाज़ा हो जाता है. विद्यानिवास मिश्र और गोविंद रजनीश अपनी किताब ‘रहीम ग्रंथावली’ में लिखते हैं, ‘रहीम की सम्पूर्णता को पहचानने का अर्थ होता है- सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी के साहित्यिक परिदृश्य को पहचानना.’

अब प्रश्न उठता है कि कैसा था उस दौर का साहित्यिक परिदृश्य? वह भक्ति काल था. हिंदुस्तान की सत्ता अकबर के हाथों में थी. हिंदू न हिंदू था और मुसलमान न मुसलमान था. सब गड्डमड्ड हो गए थे. यानी सर्वधर्म का भाव था. अपने चर्चित उपन्यास ‘अकबर’ में शाज़ी ज़मां इस बात की तस्दीक करते हुए एक दोहा कहते हैं जो बृज में कभी अकबर ने कहा था. ‘गाइ है सु हिंदू खावो और मुसलमान सूअर खावो...’ माने हिंदू गाय खाएं और मुसलमान सूअर तो चमत्कार होगा. इस माहौल में सूरदार, रसखान, तुलसीदास आदि कवि थे और इन सब पर कहीं-न-कहीं कबीर का प्रभाव था. रहीम भी इसी दौर के कवि हैं.

रहीम की जिंदगी के कुछ दिलचस्प पहलू

मिर्ज़ा ग़ालिब ने अपनी शान में कहा था: ‘सौ पुश्त है पेशा-ए-सिपहगिरी, कुछ शायरी ही ज़रिया-ए-इज़्ज़त नहीं मुझे.’ माने, सौ पीढ़ियों से मेरा ख़ानदान सैनिक रहा है. शायरी के अलावा इज्ज़त किसी और वजह से भी है. हक़ीक़त में ग़ालिब ने कभी कोई जंग नहीं लड़ी. पर, ग़ालिब से लगभग 250 साल पहले आज के दिन पैदा हुए रहीम का परिवार सैनिक था और रहीम ख़ुद एक मशहूर सेनापति हुए हैं. वे बैरम ख़ान के बेटे थे. मां मेवात के उस राजपूत घराने से थीं, जिसने इस्लाम क़ुबूल लिया था. रहीम के दिल में अपार कृष्ण भक्ति की शायद यही वजह रही होगी. रहीम का जन्म लाहौर में उस वक़्त हुआ, जब बैरम ख़ान ने पानीपत की लड़ाई में हेमू को हराया था. ‘ख़ानख़ाना’ की उपाधि बैरम ख़ान को ही मिली थी.

अकबर ने रहीम की परवरिश की थी. सिर्फ़ शाही परिवार के लोगों को ही दी जाने वाली ‘मिर्ज़ा ख़ान’ की उपाधि उन्हें दी गई. अकबर ने रहीम को सलीम का अतालीक (अभिभावक) भी नियुक्त किया. गुजरात की लड़ाई में अकबर ने उनको सेना के मध्य भाग का सेनापति नियुक्त किया था. ‘रहीम रचनावली’ में सत्यप्रकाश मिश्र लिखते हैं, ‘दुश्मन की 50,000 की फ़ौज के मुक़ाबले, रहीम के पास कुल 9,000 सैनिक थे. पर रहीम ने जिस मनोवैज्ञानिक सामरिक पद्धति से युद्ध किया वह युद्ध विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण मानी जाती है. इस जंग में रहीम ने मुज़फ्फ़र ख़ान को हराया था.

रहीम का सारा जीवन जंगों में हार-जीत और कभी मान-सम्मान और कभी अपमान में गुजरा. अकबर की मौत के बाद, उन्होंने जहांगीर को सहयोग दिया पर दक्कन की लड़ाई में रहीम को मिली हार की वजह से दोनों के रिश्ते ख़राब हो गए. रहीम ने जहांगीर के बेटे शाहजहां के साथ मिलकर मुगल बादशाह के ख़िलाफ़ बग़ावत की थी जिसे जहांगीर ने कुचल दिया था. बाप-बेटे, यानी जहांगीर और शाहजहां, में तो सुलह हो गयी, पर जहांगीर ने रहीम के बेटे दराब ख़ान का सिर काटकर यह कहते हुए भिजवा दिया कि उसने तरबूज़ भेजा है. दुखी रहीम ने कहा, ‘ठीक है, शहीदी है.’ कुछ समय बाद, जहांगीर ने उन्हें दोबारा दक्कन में मुग़लिया झंडा फहराने का हुक्म दिया और इस बार वे कामयाब हुए. कुल मिलाकर रहीम के जीवन में उथलपुथल रही

रहीम का काव्य

रहीम को वह मुक़ाम नहीं मिला जो रसखान, तुलसीदास, मीर तकी मीर, सूरदास, अमीर ख़ुसरो या मिर्ज़ा ग़ालिब को मिला है. जबकि रहीम का काव्य किसी दर्ज़ा कम नहीं कहा जा सकता. बल्कि जिन परिस्थितियों में उन्होंने काव्य रचना की वे उनके कद को बाकियों के मुकाबले और बढ़ा देती हैं. जैसा ऊपर कहा गया है कि रहीम ने जिंदगी जंग में गुज़ारी और इन्हीं हालात में लिखा भी. जबकि ऐसी परिस्थितियों से बाकियों को दो-चार नहीं होना पड़ा था.

सत्यप्रकाश मिश्र उन्हें संतुलन का रचनाकार मानते हैं और इसके पीछे तर्क देते हैं कि रहीम सत्ता और जनता के बीच की कड़ी थे. उनके मुताबिक रहीम की कविताओं में संस्कृति और प्रकृति के द्वंद से उत्पन्न ज्ञानात्मक संवेदन प्राप्त होते हैं और प्रकृति उन्हें व्यावहारिक दार्शनिकता प्रदान करती है. विद्यानिवास मिश्र और गोविन्द रजनीश का मानना है कि रहीम के दोहों का उपदेशात्मक स्वरूप होने की वजह से उन्हें कक्षा 7 या 8 तक ही उन्हें सीमित कर दिया गया है, वरना उनके काव्य का दर्शन भक्तिकाल का प्रमुख आधार माना जा सकता है. उनकी कुल 11 रचनाएं हमारे सामने आती हैं और कई बार ऐसा भी लगता है कि उनके अलावा कोई और भी था जो ‘रहीम’ के तख़ल्लुस से लिखता था. रहीम ने ‘रहिमन’ नाम का ज़्यादा इस्तेमाल किया है.

रहीम ने ‘तुज़ुक-ए-बाबरी’ का फ़ारसी में अनुवाद किया था. उनकी रचनाओं में बृज का पुट और तद्भव का इस्तेमाल ज़्यादा मिलता है क्योंकि अकबर और जहांगीर की राजधानी आगरा थी और इस कारण बृज सिर्फ प्रांतीय भाषा न रहकर आम बोलचाल की भाषा थी. बृज के अलावा उन्होंने अवधी और फ़ारसी में भी लिखा. जिस तरह अमीर ख़ुसरो ने ‘जिहाले मिस्कीं मकुन तगाफुल, दिखाए नैना बनाये बतियां...’ में पहला हिस्सा फ़ारसी और आखिरी अवधी में लिखा है उसी तरह रहीम का ‘खेट कौतुकम’ फारसी और संस्कृत मिश्रित ज्योतिष काव्य है.

रहीम के कुछ और पहलू

रहीम की दानवीरता के भी क़िस्से कम नहीं हुए हैं. कहते हैं कि वे इतने बड़े दानी थे और इसके साथ ही उतने ही विनम्र कि किसी कवि ने कहा कि देते समय ज्यों-ज्यों ही हाथ उठता है, त्यों-त्यों उनकी नज़र नीची होती जाती है और रहीम ने उत्तर दिया कि:

देनहार कोई और है, भेजत है दिन रैन

लोग भरम हम पर धरें, याते नीचे नैन

रहीम को लेकर कुछ मिथक भी गढ़ दिए गए हैं. ‘मआसिरे रहीमी’ और ‘तारीख़ चागत्ता’ जैसे ग्रंथों में उनसे जुड़े अनेक क़िस्सों का उल्लेख मिलता है. कहा जाता है रहीम के पुस्तकालय में 300 लोग काम करते थे. अबुल फ़ज़ल के ‘आईने-अकबरी’ में जिन कवियों और संगीतकारों का ज़िक्र मिलता है, उनमें से ज़्यादातर रहीम के रत्न ही थे. कहा ये भी जाता है कि उन्होंने शतरंज पर भी एक ग्रन्थ लिखा था पर अब वह मिलता नहीं है.

क़िस्सा कोताह यह है कि रहीम के दोहे उस दौर के मज़बूत दस्तख़तों में से एक हैं. अवधी, फ़ारसी और बृज के उनके इस्तेमाल से उस काल की संधिकालीन काव्यभाषा का पता चलता है. उस काल पर जितना अधिकार तुलसी के काव्य का है, उतना ही उनके दोस्त अब्दुल रहीम ख़ानख़ाना का भी है और वे बड़ी पुख्तगी से मिली-जुली संस्कृति के नुमाइंदगी करते नज़र आते हैं. प्रख्यात कवि रामधारी सिंह दिनकर का कहना है कि जितनी धर्म-निरपेक्षता अकबर के दीन-ए-इलाही में नहीं मिलती, उससे कहीं ज़्यादा रहीम के दोहों में झलकती है.