ऐसे लोग कम ही हुए हैं जो जंग के ख़त्म होने पर अफ़सोस मनाते हों. इस कथानक का किरदार ऐसा ही शख्स था जो जंग की खातिर ही जीता था और जिसे अपनी उपयोगिता सिर्फ़ जंग के दौरान ही नज़र आती थी. ‘जंग मरकर नहीं, मारकर जीती जाती है’, यह डायलॉग अब आम हो गया. पर पहली बार यह कहने वाले जॉर्ज स्मिथ पैटन जूनियर कोई मामूली जनरल नहीं थे. बीसवीं शताब्दी के महान सेनापतियों की अगर सूची बनायी जाए, तो उनका नाम सबसे ऊपर रखा आएगा.

जॉर्ज पैटन की पारिवारिक पृष्ठभूमि भी सेना से जुड़ी थी. उनके पिता और दादा का सैनिक इतिहास बहुत गरिमामय था. उन्होंने अमेरिकी क्रांति और गृह युद्ध में जान गंवाई थी. पैटन का इस इतिहास से प्रभावित होना स्वाभाविक था. पर वे एक संवेदनशील इंसान थे जो इस डर से जी रहे थे कि कहीं जंग में वे कायर न साबित हो जाएं जिससे ख़ानदान पर दाग़ लग जाए.

32 साल की उम्र में पैटन का युद्ध से पहली बार सामना 1918 में हुआ. एक टैंक डिविज़न का नेतृत्व करते हुए वे जर्मन सेना के सामने आ गए थे. पहाड़ी की आड़ से निकलते हुए कुछ सैनिकों को साथ लेकर जैसे ही हमला बोला तो ख़ुद को घिरा हुआ पाया. चूंकि वे जर्मन सैनिकों की नज़र में आ गए थे, तो पीछे हटने का भी अंजाम वही होता, जो आगे बढ़ने पर होता. बताते हैं कि मौत को सामने देख पैटन के पैर कांपने लगे. उन्होंने आसमान की तरफ़ देखा तो पूर्वज उन्हें हिकारत की नज़र से देखते हुए नजर आए. मानो कह रहे हों कि लड़ो और हमारी जमात में शामिल हो जाओ.

पैटन के दिल में उठा तूफ़ान थम गया. ‘एक और पैटन के शहीद होने का समय आ गया है’ कहते हुए वे जर्मनों की तरफ़ बढ़ गए. इसी दौरान एक गोली उनकी जांघ में आकर लगी और वे गिर पड़े. लड़ाई में वे बच गए और इसके साथ ही उनके दिल में जंग के लिए खौफ़ हमेशा के लिए मिट गया. फिर तो वे कई बार अपनी जान जोख़िम में डालकर मैदान-ए-जंग में अपने सैनिकों की हौसला अफज़ाई के लिए पंहुच जाते थे.

दूसरा विश्व-युद्ध

दूसरा विश्व युद्ध अमेरिकी जनरल डी आइजनजहावर (जो बाद में अमेरिका के राष्ट्रपति भी बने) की अगुवाई में लड़ा गया था. उनके दो कमांडर थे. ब्रिटिश जनरल मोंटगोमरी जो फ़्रांस के उत्तरी तट पर तैनात थे. वहीं, अमेरिकी जनरल पैटन दक्षिण का मोर्चा संभाल रहे थे. दोनों ही ज़बर्दस्त जंगजू थे और उनका रिकॉर्ड शानदार था. इसके बावजूद आइजनजहावर की समस्या कुछ और थी. समस्या यह थी कि ये दोनों एक-दूसरे से तुनकते थे. दोनों में जीतने की अदम्य चाह ने उनमें कड़ी प्रतिद्वंदिता पैदा कर रखी थी. दोनों में होड़ थी कि पहले हिटलर की गर्दन कौन पकड़ेगा और कौन पहले जर्मनी पहुंचकर मित्र राष्ट्रों की फ़ौज का झंडा लहराएगा?

दूसरे विश्व युद्ध में उत्तर अफ़्रीका और सिसली के युद्धों में पैटन को शानदार सफलताएं मिली. ख़ुद उनकी नज़र में ‘बैटल ऑफ़ बल्ज’ सबसे बड़ी जीत थी. इस दौरान कई विवाद भी हुए. इनमें सबसे बड़ा था अपने सैनिकों को थप्पड़ मारना. मामला यह था कि घायल सैनिकों के शिविर में निरीक्षण के लिए गए पैटन ने एक हट्टे-कट्टे सैनिक को जंग के खौफ़ से कांपते हुए देखा तो उन्हें गुस्सा आ गया और उन्होंने उसको थप्पड़ रसीद कर दिए. उन्होंने कहा था, ‘किसी बहादुर की मौत पर शोक मानना बेवकूफ़ी है, हमें ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिए कि ऐसे भी लोग जिए हैं. ये दृश्य फ़िल्म पैटन (1970) से लिया गया है.

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पैटन का टैंक प्रेम

पहला विश्व युद्ध ट्रेंच वॉर के नाम से भी जाना जाता है. ट्रेंच माने खाई या खंदक. इस युद्ध के उत्तरार्ध में टैंकों का निर्माण शुरू हुआ. जॉर्ज पैटन टैंक से अभिभूत थे. उन्होंने मानना शुरू कर दिया था कि आने वाले दिनों में टैंक ज़मीन पर फ़ौज की जीत का आधार बनेंगे.

उनका अंदाज़ा सही निकला. दूसरा विश्व युद्ध मशीनों की लड़ाई थी. आसमान में लड़ाकू जहाज और ज़मीन पर दैत्याकार मशीनें यानी टैंक हार और जीत का कारण बने. दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत में ही अमेरिका ने मान लिया था कि देर-सबेर उसे भी इसमें हिस्सा लेना पड़ेगा. दूसरी तरफ, इंग्लैंड के प्रधानमंत्री चर्चिल ने अमेरिकी राष्ट्रपति रूज़वेल्ट से सामरिक सहायता की अपील की थी. इसके मद्देनज़र पैटन ने अमेरिकी फौजी प्रशासन को बख्तरबंद (आर्मर्ड) डिविज़न बनाने का सुझाव दिया. यह मंजूर हो गया और पैटन इसके मुखिया बनाये गए. उन्होंने उन्नत टैंकों के उत्पादन पर अपना पूरा ज़ोर लगा दिया. आर्मर्ड डिवीज़न के बनने पर उनकी ख्याति में ज़बरदस्त इज़ाफ़ा हुआ और वे अमेरिका की प्रमुख जनरलों में गिने जाने लगे.

पैटन का फैंटम वॉर

आइजनहावर ने फ़्रांस में मौजूद जर्मन सेनाओं पर हमला बोलने के लिए ज़बर्दस्त कूटनीति का परिचय दिया. उन्होंने पैटन और मोंटगोमरी की सैनिक क्षमताओं का इस्तेमाल करते हुए हिटलर की फ़ौजों को फ़्रांस से खदेड़कर जंग का रुख मोड़ दिया था. इसमें पैटन ने वह कर दिखाया जो दुनिया में अब तक नहीं हुआ था.

उन्होंने इंग्लैंड के दक्षिण तट पर छद्म सेना खड़ी करके हिटलर और उसके सेनापतियों को धोखे में डाल दिया कि मित्र राष्ट्रों का हमला फ़्रांस के पा डी काले तट पर होगा. हिटलर के जासूसों को इंग्लैंड के दक्षिणी तट पर सेना की मौजूदगी की ख़बर लीक करायी गयी. हिटलर के खोजी विमानों ने मित्र राष्ट्रों की फौज के मूवमेंट को भी कैमरों में कैद कर लिया. एक सोची समझी रणनीति के तहत मित्र राष्ट्रों के अफ़सरों के संवाद जर्मन सैनिकों तक पंहुचाये गए जिनमें पा डी काले पर हमले की रणनीति की बात होती. यही नहीं, स्विट्ज़रलैंड से पा डी काले के तमाम नक़्शे ख़रीदे गए जो इस योजना की तस्दीक कर रहे थे.

हिटलर को अगर किसी से खौफ़ था तो वे पैटन थे. उसे पैटन की टैंक डिविज़न की तस्वीरें भी दिखाई गईं. अब अगर पैटन किसी मोर्चे पर मौजूद हैं तो यह समझना कि जंग कहां होने वाली है, कोई बड़ी बात नहीं थी. दूसरी तरफ़, मोंटगोमरी की शक्ल से मिलते-जुलते एक आदमी को अफ्रीका में अक्सर देखा जाता था. इसका अर्थ था कि मोंटगोमरी की सेना फ़िलहाल यूरोप के युद्ध में शामिल नहीं है. इन सब जानकारियों के आधार पर हिटलर ने निश्चय कर लिया कि हमला पा डी काले तट पर ही होगा और उसने सेनाओं को इसके लिए तैयार रहने को कहा.

रबड़ के टैंक

छह जून, 1944 को हमला तो हुआ, पर पा डी काले से कोई 300 किलोमीटर की दूरी पर नॉर्मंडी के तट पर हुआ. हमला जॉर्ज पैटन की सेना ने नहीं, मोंटगोमरी के सैनिकों ने किया था. यहां हिटलर की फ़ौजें हमले के लिए तैयार नहीं थीं, लिहाज़ा जंग में उनकी हार हुई. इस ऑपरेशन को ‘डी-डे’ कहा जाता है. नॉर्मंडी पर मिली जीत निर्णायक साबित हुई. इसने हिटलर के पतन की शुरुआत कर दी. कई साल बाद जब राज़ खुला तो मालूम हुआ कि पैटन ने सिर्फ जंग का नाटक किया था. जिस टैंक डिविज़न की तस्वीरें हिटलर को दिखाई गई थीं वे सब नकली टैंक थे. टैंक और हवाई जहाज रबड़ के बने हुए थे.

युद्ध के बाद

जर्मनी को नेस्तनाबूद करने के बाद जॉर्ज पैटन को जर्मनी के शहर बावेरिया का गवर्नर नियुक्त किया गया. क़िस्सा है कि एक बार वे कैदी जर्मन सैनिकों की जेल के आगे से गुज़रे तो देखा कि जर्मन सैनिक थके-हारे बैठे हुए हैं. उन्होंने सैनिकों के कर्नल को बुलाकर ताकीद की कि वह एक अफ़सर की तरह अपने सिपाहियों के अन्दर जोश भरे. हारे हैं तो क्या हुआ, हैं तो सैनिक ही!

आईजनहावर ने पैटन को निर्देश दिया था कि वे बावेरिया के प्रशासन को नाज़ी प्रभाव से मुक्त करें. इसका मतलब था कि ऐसे लोगों को निकाल बाहर किया जाए तो नाज़ी विचारधारा से जुड़े हुए थे. इस आदेश को न मानते हुए उन्होंने कहा था कि नाज़ियों और अमेरिकी संसद में बैठे हुए रिपब्लिक और डेमोक्रेट सांसद सब एक जैसे ही हैं. इस बात पर काफ़ी हो हल्ला मचा और उन्हें वहां से कार्यमुक्त कर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. आठ दिसंबर, 1945 को पैटन की कार का एक्सीडेंट हो गया. इस हादसे में उनकी गर्दन की हड्डी टूट गई. उन्हें लकवा मार गया . 21 दिसंबर को नींद में उन्होंने इस दुनिया से विदा ले ली.