महिलाओं के लिए अभी कुछ साल नहीं बल्कि सदियां अपने हक के लिए लड़ते और खुद को साबित करते हुए बीतने वाली हैं. 2018 भी उनके द्वारा अपने अधिकारों के लिए लड़ते, आरोपों का सामना करते, खुद को साबित करते, समाज और व्यवस्था के सामने कुछ जरूरी सवाल उठाते और उन्हें अपनी कुछ बुनियादी उम्मीदें बताते हुए गुजरा है. हम यहां उन पांच महिला मुद्दों को याद कर रहे हैं जो अलग-अलग कारणों से 2018 में महिलाओं के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बने रहे.

1. कॉमनवेल्थ खेलों में इस साल सबसे ज्यादा महिलाओं ने पदक जीते

अभी तक हो चुके 21 कॉमनवेल्थ खेलों में यह पहली बार था जब भारतीय महिला खिलाड़ियों ने सबसे ज्यादा पदक जीते. ऑस्ट्रेलिया के गोल्डकोस्ट में भारत को मिले कुल 66 पदकों में से 47 प्रतिशत पदक महिला खिलाड़ियों ने जीते. इससे न सिर्फ पूरे देश ने उनकी क्षमता का लोहा माना बल्कि और अधिक संख्या में लड़कियों के खेल की दुनिया में आने का रास्ता भी तैयार हुआ. अब न सिर्फ सरकारी संस्थाएं बल्कि परिवार भी अपनी लड़कियों को खेलों में आगे बढ़ने के लिए और ज्यादा प्रोत्साहित करते नजर आते हैं. इस माहौल को बनाने में कॉमनवेल्थ और अन्य खेल प्रतियोगिताओं में महिला खिलाड़ियों के पदक जीतने की सबसे बड़ी भूमिका है.

2. 12 साल के कम उम्र की बच्ची के साथ बलात्कार करने वाले को मौत की सजा

बच्चियों और लड़कियों के साथ बलात्कार की बढ़ती घटनाओं को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने पॉक्सो कानून में संशोधन के प्रस्ताव को मंजूरी दी. इसके तहत 12 साल के कम उम्र की बच्ची के साथ बलात्कार करने वाले को मौत की सजा देना तय हुआ. हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे कई राज्य 12 साल से कम उम्र की बच्चियों का यौन शोषण करने वालों के खिलाफ पहले ही मौत की सजा का प्रावधान कर चुके हैं. इस मुद्दे ने बड़े स्तर पर पूरे देश के लोगों का ध्यान भी खींचा. इस पर अलग-अलग लोगों की अलग-अलग राय थी. आम लोगों का मानना था कि ऐसा घृणित अपराध करने वाले को मौत की सजा मिलनी चाहिए. हालांकि बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना था कि ऐसा करने से बच्चियों को बलात्कारी द्वारा मारे जाने की संभावना बढ़ जाएगी.

3. सबरीमला मंदिर में हर उम्र की महिलाओं के प्रवेश को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी

28 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने केरल के सबरीमला मंदिर में हर उम्र की महिलाओं के प्रवेश को मंजूरी दे दी. यह फैसला आते ही इस मुद्दे ने एक आंदोलन की सी शक्ल ले ली. मंदिर में प्रवेश के मुद्दे पर महिलाएं भी दो धड़ों में बंटी दिखाई दीं. कुछ का मानना था कि मंदिर प्रवेश पर सदियों से जो परंपरा चली आ रही है उसी का पालन किया जाना चाहिए. भाजपा सीधे तौर पर ऐसी महिलाओं के समर्थन में उतरी. उधर, कुछ अन्य महिलाओं का मानना था कि मंदिर में प्रवेश उनका अधिकार है. ऐसी महिलाओं ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद स्थानीय पुलिस और प्रशासन की मदद से कई बार मंदिर में प्रवेश की कोशिश की. लेकिन मंदिर प्रशासन के कड़े विरोध के कारण ये कोशिश असफल हो गई. कड़े विरोध को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले पर पुनर्विचार करने की बात कही है.

4. सेना में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की बात

सेना में लड़कियों की भर्ती को प्रोत्साहित करने के लिहाज से यह साल काफी महत्वपूर्ण रहा. जिन सैनिक स्कूलों में अभी तक सिर्फ लड़कों को ही प्रवेश की अनुमति थी, वहां लड़कियों को भी प्रवेश मिलने की शुरुआत हुई. देश में सबसे पहले लखनऊ स्थित सैनिक स्कूल ने 9वीं कक्षा में लड़कियों को प्रवेश की अनुमति दी. उसके बाद भारत के राज्य रक्षामंत्री डॉक्टर सुभाष भामरे ने देश के सभी 28 सैनिक स्कूलों और सात मिलिट्री स्कूलों में लड़कियों को प्रवेश देने की व्यवस्था करने के आदेश दिए.

एक तरफ सैनिक स्कूलों को सेना में सभी आर्थिक तबकों की लड़कियों को शीर्ष पदों पर पहुंचाने के लिए प्रोत्साहित किया गया तो दूसरी ओर थलसेना प्रमुख जनरल बिपिन सिंह रावत ने भी सेना पुलिस में महिलाओं की भर्ती की बात कही. इसके साथ ही उन्होंने दुभाषिए और साइबर विशेषज्ञ जैसी गैर लड़ाकू भूमिकाओं में भी महिलाओं की संख्या बढ़ाने पर जोर दिया. हालांकि जनरल रावत का कहना था कि महिलाओं को लड़ाकू भूमिकाएं देने के लिए अभी न तो सेना ही मानसिक रूप से तैयार है और न ही खुद महिलाएं ही. लेकिन सैनिक स्कूलों और सेना के गैरलड़ाकू विभागों में लड़कियों/महिलाओं का प्रवेश सेना में महिलाओं के एक नए युग की शुरुआत जैसा जरूर है.

5. मी टू अभियान

इस साल का सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरने वाला महिला मुद्दा रहा मी टू अभियान. लगभग सभी तबके की महिलाएं इस अभियान से जुड़ीं. पहली बार मीडिया से लेकर बॉलीवुड तक हर जगह कार्यस्थल पर होने वाले यौन शोषण की घिनौनी तस्वीर इतने साफ तौर पर सामने आई. हालांकि इस अभियान की भी खासियत यह रही कि यहां भी न सिर्फ महिलाएं बल्कि पूरा समाज ही दो धड़ों में बंटा नजर आया. एक तरफ वह तबका था जो इस अभियान को जरूरी समझ रहा था और जिसने इसका समर्थन किया. दूसरी तरफ वह था जो इसे सिर्फ एक शोशेबाजी मानता रहा और इसे समर्थन देने से भी दूर रहा.

मी टू अभियान का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि महिलाओं ने खुद को यौन शोषण से जुड़ी शर्म से दूर किया है. ऐसा पहली बार हुआ है कि महिलाओं ने अपनी पहचान, नाम और चेहरा छिपाए बिना यौन शोषण के खुलासे किए हैं. अब इज्ज़त लुटना पीड़िताओं के लिए नहीं, बल्कि दोषी के संदर्भ में सोचा जाने लगा है. यह भी इस अभियान का सबसे अहम प्रभाव यह रहा कि इसने पहली बार इतने व्यापक स्तर पर यौन शोषण के आरोपितों का बहुत तरह से बहिष्कार करने की मजबूत जमीन तैयार की है. एक तरफ बहुत सारे आरोपितों को अलग-अलग मंचों, प्रोजेक्ट्स आदि से हटाया गया. दूसरी तरफ बहुत सारे लोगों, समूहों और मंचों ने दोषी सिद्ध होने वाले लोगों का बहिष्कार करने की बात भी कही.

मी टू अभियान ने ‘विमन फ्रेंडली सोसायटी’ बनाने की तरफ एक मजबूत कदम उठाया है...और वह भी बिना किसी महिला या लड़की के करियर पर तलवार लटकाए! इन पुराने खुलासों का नुकसान सिर्फ यही है कि सबूतों के अभाव में दोषियों को सजा मिलने के आसार कम हैं.

कुल मिलाकर 2018 में महिलाओं के जो भी मुद्दे चर्चा में रहे वे सभी काफी अहम हैं. ये सभी आने वाले समय में भी महिलाओं को उचित सम्मान और उनका जायज हक दिलवाने में जरूर मददगार साबित होंगे, ऐसी उम्मीद जगती है.