भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और सरकार के बीच चल रही तकरार के बीच गवर्नर उर्जित पटेल के इस्तीफे से उठी धुंध अब काफी हद तक बैठ चुकी है. केंद्रीय बैंक के नए मुखिया शक्तिकांत दास ने कमान संभाल ली है. गवर्नर बनने के बाद अपने पहले बयान में उनका कहना था कि आरबीआई की स्वायत्तता और विश्वसनीयता बरकरार रखना उनकी पहली प्राथमिकता है.

सवाल उठता है कि क्या ऐसा होगा. शक्तिकांत दास की अध्यक्षता में 14 दिसंबर को हुई आरबीआई की बोर्ड बैठक के बाद साफ तौर पर कुछ ऐसे संकेत मिलते हैं कि केंद्रीय बैंक की कार्यप्रणाली में कुछ अहम बदलाव हो सकते हैं.

इस बैठक में रिजर्व बैंक के संचालन की व्यवस्था पर चर्चा हुई और इस दौरान बोर्ड की भूमिका महज सलाहकार से ज्यादा होने पर जोर दिया गया. आरबीआई और सरकार के बीच तनातनी की शुरुआत ही इस बात से हुई थी कि बोर्ड में सरकार द्वारा नियुक्त किये गए एस गुरुमूर्ति जैसे निदेशक नीतिगत मामलों में बोर्ड का दखल बढ़ाने की वकालत कर रहे थे. यहां से बढ़ता विवाद आरबीआई के आरक्षित कोष से सरकार को मिलने वाले अंशदान से होता हुआ, उर्जित पटेल के इस्तीफे तक आ पहुंचा.

आर्थिक जानकारों का कहना है कि आरबीआई-सरकार के इस पूरे विवाद के दौरान बोर्ड ताकतवर बनकर उभरा और उसे सरकार और वित्त मंत्रालय की पूरी शह रही. आरबीआई द्वारा बैंक पर कर्ज बांटने में सख्ती या सरकार द्वारा आरबीआई के आरक्षित कोष से पैसे की मांग जैसे मुद्दे इसके आगे गौण हो गए कि आरबीआई का संचालन बोर्ड द्वारा होना चाहिए न कि गवर्नर द्वारा. जानकारों की मानें तो इसके पीछे सरकार की सोच यह है कि अगर आरबीआई के नीतिगत मसलों में बोर्ड का दखल बढ़ता है तो बाकी मुद्दे सरकार की इच्छा के मुताबिक अपने आप सुलझ जाएंगे.

आरबीआई का गवर्नेंस फ्रेमवर्क (संचालन ढांचा) आगे क्या होगा, यह अभी तय नहीं है. लेकिन इतना तो साफ हो चुका है कि उर्जित पटेल के इस्तीफे के बाद बोर्ड ने आरबीआई के आंतरिक प्रबंधन पर काफी हद तक दबाव बना लिया है. जानकार मानते हैं कि सरकार द्वारा नियुक्त डायरेक्टर जिस तरह से आक्रामक हैं, उसे देखते हुए आने वाले दिनों में यह दबाव और बढ़ेगा. संभव है कि आरबीआई बोर्ड से संचालित हो जाये या ऐसा अगर घोषित तौर पर न हो तो भी उसके नीतिगत फैसले बोर्ड की इजाजत से लिये जाएं. अगर ऐसा होता है तो अर्थव्यवस्था से लेकर दुनिया भर में आरबीआई की साख तक पर नए सिरे से सवाल उठेंगे.

आरबीआई गवर्नर बनने को कोई बड़ा नाम राजी नहीं होगा

आर्थिक उदारीकरण लागू होने के बाद देश में आरबीआई की भूमिका पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हुई और देश के राजनीतिक तंत्र में मोटे तौर पर यह सहमति बनी रही कि भारत के केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता पर कोई आंच नहीं आनी चाहिए. 1991 के बाद आरबीआई गवर्नर अगर नौकरशाही से भी आए तो ख्याल रखा गया कि वे आर्थिक मामलों के अच्छे जानकार हों. आरबीआई गवर्नर के रूप में रघुराम राजन जैसे बड़े अकादमिक अर्थशास्त्री की नियुक्ति से दुनिया में यह संदेश गया कि भारत का केंद्रीय बैंक उच्चस्तर के पेशेवरों द्वारा संचालित है.

लेकिन रघुराम राजन की स्वदेशी लॉबी द्वारा आलोचना और फिर सरकार द्वारा उनका कार्यकाल न बढ़ाये जाने से इस संदेश पर संदेह के बादल घिरते दिखे. हालांकि उसके बाद गवर्नर पद पर उर्जित पटेल की नियुक्ति से सरकार कम से कम यह भरोसा दिलाने में सफल रही कि वह इस पद पर आर्थिक पेशेवरों की नियुक्ति के मामले में गंभीर है. लेकिन जिन हालात में उर्जित पटेल को इस्तीफा देना पड़ा और सरकार ने वित्त मंत्रालय के पूर्व नौकरशाह को इस पद पर नियुक्त किया उसने इस धारणा को धक्का पहुंचाया.

इन विवादों के बाद अगर आरबीआई के संचालन में बोर्ड की भूमिका बढ़ती है या वह बोर्ड के जरिये संचालित होता है तो कोई भी बड़ा अकादमिक अर्थशास्त्री इस पद पर आने में रुचि नहीं दिखाएगा. बोर्ड की भूमिका जरूरत से ज्यादा बढ़ने पर गवर्नर का पद काफी हद तक शोभा का पद हो जाएगा और नीतिगत निर्णय लेने में सरकार द्वारा नियुक्त निदेशकों की चलने की ज्यादा संभावना होगी. ऐसे में पेशेवर लोगों के लिए इसमें कोई आकर्षण नहीं बचेगा.

आर्थिक विशेषज्ञता पर नौकरशाही को तरजीह मिलेगी

आरबीआई के बोर्ड संचालित होने के बाद उदारीकरण से पनपा यह विचार भी दम तोड़ सकता है कि आर्थिक मामलों में हरफनमौला प्रशासनिक अफसरों की जगह आर्थिक विशेषज्ञों को ही वरीयता दी जाए. आर्थिक सुधारों को गति देने के लिए पिछली कई सरकारों में नौकरशाही से ज्यादा भरोसा पेशेवर आर्थिक सलाहकारों पर किया गया.

जानकारों का कहना है कि आरबीआई को बोर्ड से संचालित करने के सरकार के तर्क के पीछे कोई ठोस विचार या नीतिगत सुधार जैसी बात नहीं दिख रही है, बल्कि इस पूरी कवायद की वजह सिर्फ यह लगती है कि सरकार आरबीआई में ऐसा प्रबंधन चाहती है जो उसे मनचाही सहूलियत दे और उसकी किसी मांग पर टोकाटाकी न करे.

विशेषज्ञ मानते हैं कि आरबीआई में सरकार जिस मकसद से बोर्ड का दखल बढ़ा रही है, वह सिर्फ रिजर्व बैंक ही नहीं बल्कि आर्थिक प्रशासन के पूरे ढांचे को प्रभावित करेगा. उनके मुताबिक इससे उस दौर की वापसी हो सकती है जब आर्थिक नीति पर प्रशासनिक सेवा हावी हुआ करती थी. आरबीआई-सरकार के बीच तनातनी में वित्त मंत्रालय के अधिकारियों के रवैये में यह झलक मिली भी है.

बोर्ड संचालित आरबीआई की कानूनी स्थिति क्या होगी?

सरकार और आरबीआई के बीच विवाद के दौरान सरकार द्वारा नियुक्त अंशकालिक निदेशक एस गुरुमूर्ति ने कहा था कि आरबीआई एक्ट के मुताबिक रिजर्व बैंक का मुखिया गवर्नर नहीं बल्कि बोर्ड है. एक्ट की यह व्याख्या कानूनन कितनी सही या गलत है, इस पर भी चर्चा की जरूरत है क्योंकि आरबीआई के अब तक के काम करने के तरीके में बोर्ड की भूमिका सलाहकार की ही रही है. हालांकि जानकारों केे मुताबिक आरबीआई एक्ट में बोर्ड में वोटिंग का प्रावधान है लेकिन, अब तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि बोर्ड बैठक में वोटिंग की नौबत आई हो.

इसके अलावा अभी आरबीआई एक्ट के मुताबिक गवर्नर संसद के प्रति जवाबदेह है. अब अगर आरबीआई बोर्ड से संचालित होता है तो क्या पूरा बोर्ड संसद के प्रति जवाबदेह होगा या सिर्फ गवर्नर. अगर पूरा बोर्ड जवाबदेह होगा तो बोर्ड के डायरेक्टरों की नियुक्ति का जो तरीका है, उस प्रक्रिया पर भी सवाल उठेंगे. आरबीआई में कई तरह से डायरेक्टरों की नियुक्ति होती है. सरकार की नियुक्ति के अलावा कुछ डायरेक्टर उद्योग जगत से भी आते हैं, ऐसे में हितों के टकराव का मसला भी सिर उठाएगा.

सरकार के समर्थक डायरेक्टरों का तर्क है कि बैंक ऑफ इंग्लैंड भी बोर्ड द्वारा संचालित केंद्रीय बैंक है. इस पर आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य का कहना है कि अगर सरकार उस तर्ज पर आरबीआई का प्रबंधन चाहती है तो उसे आमूलचूल बदलाव करने पड़ेंगे. बैंक ऑफ इंग्लैंड में निदेशकों की नियुक्ति पूर्णकालिक होती है और वहां निदेशक रहते हुए कोई भी अन्य किसी जगह से किसी तरह का जुड़ाव नहीं रख सकता. आरबीआई के मामले में भी क्या ऐसा होगा? इस बारे में अभी कुछ भी साफ नहीं है.

अर्थशास्त्र पर हावी रहेगा राजनीतिशास्त्र

जानकारों का कहना है कि आरबीआई और सरकारों के बीच विवाद पहले भी होते रहे हैं, लेकिन इस बार के विवाद के मूल में सरकार की चुनावी चिंता रही है. पहले दबी-छिपी और एक हद में चलने वाली यह तनातनी इस बार संस्थागत टकराव में बदल गई.

जानकार कहते हैं कि अगर यह मान भी लिया जाए कि आरबीआई को बोर्ड की सलाह को गंभीरता से लेना चाहिए तो भी सवाल उठता है कि क्या बोर्ड अपना फैसला पेशेवर तरीके से ले रहा है. जानकारों के मुताबिक हाल के बरसों में आरबीआई बोर्ड में राजनीतिक रुझान वाले लोगों का चलन बढ़ा है और मौजूदा भाजपा सरकार ने इसे और तेजी दी है. उनका कहना है कि ऐसे में अगर आरबीआई बोर्ड से संचालित होगा तो उससे निष्पक्ष फैसले की उम्मीद कैसे की जा सकती है.

जानकार मानते हैं कि जिस तरह से आरबीआई बोर्ड में राजनीतिक नियुक्तियोंं की परंपरा बनती जा रही है, वैसे में इस बात का डर स्वाभाविक है कि बोर्ड संचालित प्रबंधन सरकारों को सियासी लाभ देने वाले मौद्रिक फैसले ले सकता है जो अर्थव्यवस्था को दूरगामी नुकसान पहुंचा सकते हैं.

आरबीआई की साख

आरबीआई के संचालन को लेकर एक्ट क्या कहता है और परंपरागत तौर पर वह कैसे काम कर रहा है, यह बहस का मुद्दा हो सकता है. लेकिन एक बात साफ है कि मौजूदा कार्यप्रणाली में आरबीआई ने एक साख बनाई है और उसे दुनिया के बेहद पेशेवर केंद्रीय बैंकों में गिना जाता है. हालिया विवाद ने इस साख को नुकसान ही पहुंचाया है. कइयों के मुताबिक अब अगर बोर्ड का दखल बढ़ने या आरबीआई के बोर्ड संचालित होने की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और पेशेवर न रही तो दुनिया भर के वित्तीय बाजार इसे आरबीआई की स्वतंत्रता में दखल के तौर पर भी ले सकते हैं. यह अर्थव्यवस्था के लिए बेहद चिंताजनक बात होगी.

जाहिर है कि आरबीआई के संचालन का ढांचा कैसा हो, यह नीति से ज्यादा नीयत का मामला है. सरकार अगर इस पर राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर पेशेवर ढंग से सोचे तो यह अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर होगा.