पिछले साढ़े चार वर्ष में गाय के नाम पर की गई राजनीति का खामियाजा आम भारतीय को कई तरह से भुगतना पड़ रहा है. इस दौरान कथित गोरक्षकों की अतिसक्रियता ने सांप्रदायिक सौहार्द तो बिंगाड़ा ही है, साथ में कृषि आधारित आर्थिक चक्र को भी तहस-नहस कर दिया. तिस पर मवेशियों की खरीद-फ़रोख़्त से जुड़े पशु क्रूरता निवारण अधिनियम-1960 में संशोधन कर केंद्र सरकार ने किसानों के लिए कोढ़ में खाज का काम किया है.
इस संशोधन के बाद मांस के लिए मवेशियों की बिक्री पर पूरी पाबंदी लग गई है. इसके चलते किसानों के पास अपने अनुपयोगी पशुओं को छुट्टा छोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा. खेती और इससे इतर अन्य कामों में मवेशियों के घटते इस्तेमाल और कम दूध देने की वजह से इन लावारिस पशुओं में गोवंश की संख्या सर्वाधिक देखने को मिलती है. झुंड के झुंड में घूमने वाले ये गोवंश या तो खड़ी फसलों को तबाह करते हैं, या फिर वहां से हांक दिए जाने पर नजदीकी राजमार्गों और प्रमुख सड़कों का रुख करते हैं और दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं. चूंकि इन दिनों टायर की रगड़ से सड़कें अपेक्षाकृत गर्म रहती हैं, इसलिए वहां पशुओं की मौजूदगी और ज्यादा बढ़ जाती है.

एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक 2015 में 550 लोगों को आवारा पशुओं की वजह से हुए हादसों में जान गंवानी पड़ी थी. विशेषज्ञों की मानें तो वास्तविक आंकड़ें इससे कहीं ज्यादा भयावह है. साधारण सी गूगल सर्च के जरिए आप इस बात की पुष्टि कर सकते हैं.

उत्तर भारत के अन्य राज्यों की तरह राजस्थान भी इस समस्या से अछूता नहीं है. बीते दिनों राजधानी जयपुर में आवारा सांड के हमले में एक विदेशी पर्यटक की मौत हो जाने पर प्रशासन और सरकार की जमकर किरकिरी हुई थी. इसी तरह भाजपा के एक बड़े नेता की गाड़ी से सांड के टकराने की ख़बर ने भी खूब चर्चाएं बटोरी थीं. हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों की कवरेज के दौरान ऐसे कई मौके आए जब हमने छुट्टे गोवंश की वजह से होने वाली दुर्घटनाओं को बाल-बाल टलते देखा.

इस रिपोर्ट में खासतौर पर राजस्थान का ज़िक्र इसलिए किया जा रहा है क्योंकि, देश में यही इकलौता राज्य है जहां हाल-फिलहाल तक भाजपा सरकार में गायों के लिए एक अलग से मंत्रालय मौजूद था. यहीं गायों के संरक्षण के लिए सबसे पहले गो-उपकर यानी काउ सेस भी लगाया गया. गायों की तस्करी के शक में सर्वाधिक हत्याएं भी राजस्थान में ही हुईं. और तमाम दावों के बावजूद गोशालाओं में सर्वाधिक गायों के मारे जाने की ख़बरें भी शायद इसी राज्य से आईं. इनमें राजधानी जयपुर की हिंगोनिया और उदयुपर की सरकारी गोशाला के साथ जालोर जिले में स्थित देश की सबसे बड़ी गोशाला मानी जाने वाली पथमेड़ा का नाम प्रमुखता से शामिल है. गायों की ऐसी ही कुछ बदहाली सिरोही, झालावाड़ और कोटा जिलों की गोशालाओं में भी देखने को मिली.

गोशालाओं में सैकड़ों-हजारों गायों की अनायास मौत के कारणों से जुड़ी जानकारी चाहने पर गो-संरक्षण से जुड़े एक कार्यकर्ता बड़ी आशंका ज़ाहिर करते हैं. अपने जवाब को सवाल की शक्ल देकर वे पूछते हैं, ‘किसी ने पता लगाया कि मृत गायों का अंतिम संस्कार कैसे हुआ था? गायों के हाड़ और चमड़े की कीमत बाज़ार में पता करो!’ उधर, अपने बचाव में गोशाला प्रबंधकों की दलील है कि बीते चार साल में लावारिस गोवंश की संख्या इस क़दर बढ़ी है कि उन्हें उचित देख-रेख के साथ आश्रय दे पाना गोशालाओं के बूते के बाहर है.

यह लावारिस गोवंश प्रदेश के ग्रामीण हलकों में कुछ अलग तरह की गंभीर परेशानियों का भी कारण बन रहे हैं. इसकी बानगी कुछ महीने पहले टोंक जिले में देखने को मिली जहां आवारा पशु छोड़ने की बात पर दो गांवों के बीच भारी तनाव हो गया. बुजुर्गों की समझाइश के बाद इन लावारिस पशुओं को दोनों गांवों के बाहर, यानी हाईवे के पास छोड़े जाने की बात पर सहमति बनी. वहीं, उदयपुर जिले के एक जनजाति बहुल गांव ने अपने अनुपयोगी पशुओं को यह कहते हुए जंगल में छोड़ने का फैसला लिया कि उनके मवेशी कम से कम जंगली जानवरों की भूख मिटाने के काम तो आएंगे!

इस तरह के हालात के पीछे अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अमराराम भाजपा और कांग्रेस दोनों को जिम्मेदार ठहराते हैं. वे कहते हैं, ‘भाजपा गाय-गोबर की राजनीति करती है और कांग्रेस उसे सहमति देती है.’ उनके शब्दों में, ‘1995 तक प्रदेश की पैंतीस से चालीस फीसदी आबादी पशुधन पर निर्भर थी. लेकिन तब भाजपा ने पहली बार बछड़े को बाहर न बेचे जाने का कानून बनाकर किसान को मारने का काम शुरू कर दिया.’ राम आगे जोड़ते हैं, ‘उसके बाद दो बार कांग्रेस की भी सरकार बनी, लेकिन उसने भी इस कानून को बढ़ावा दिया.’

सत्याग्रह से हुई बातचीत में किसान महापंचायत के अध्यक्ष रामपाल जाट कहते हैं, ‘गाय केवल सहानुभूति और राजनीति का केंद्र बन कर रह गई है. गाय के हितों की दुहाई देने वाले दलों को नियम बना देना चाहिए कि उनका सदस्य बनने के लिए गाय पालना आवश्यक है.’ जाट के मुताबिक सिर्फ यही एक तरीका है जिससे गाय का सही मायने में भला हो सकता है.

प्रदेश के एक वरिष्ठ पत्रकार का इस बारे में कहना है कि सरकारों के रुख और गोरक्षकों की अतिसक्रियता का ही नतीजा है कि देशभर में प्रसिद्ध राज्य के पशुमेले अब सूने रहने लगे हैं. वे कहते हैं, ‘कथित गोरक्षकों को पाबंद किए जाने के साथ पशु क्रूरता निवारण अधिनियम-1960 में भी बदलाव की जरूरत है ताकि देश के दलित, अल्पसंख्यक और किसान सुरक्षित रह सकें और सड़क पर चलने वाले लोगों की जान पर बनने की नौबत न आए.’
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