2018 में सुप्रीम कोर्ट और अलग-अलग हाई कोर्टों ने ऐसे कई फैसले दिए जो महिलाओं को सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन देने की दिशा में अहम कदम जैसे लगते हैं. जानकारों के मुताबिक ये फैसले निश्चित तौर पर आने वाले सालों में महिलाओं के जीवन को सहज और सशक्त बनाने में मददगार साबित होंगे.

1. पिता की पैतृक संपत्ति में बेटियों को बराबर का हक

इस साल फरवरी में आए एक अहम आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 2005 से पहले पैदा हुई बेटियों पर भी लागू होता है. मतलब कि अब बेटियां जन्म से ही पैतृक संपत्ति में हमवारिस होंगी. अदालत के मुताबिक यह कानून 2005 से पहले के सभी संपत्ति विवादों और लंबित मामलों पर भी लागू होगा. अदालत ने यह फैसला दो बहनों द्वारा दायर की गई एक याचिका की सुनवाई करते हुए सुनाया था.

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 2005 पिता की पैतृक संपत्ति में बेटा-बेटी दोनों को बराबर का हिस्सा देने की बात करता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महिला का इस पैतृक संपत्ति पर पूरा मालिकाना हक है. वह चाहे तो इसे बेच सकती है, या किसी के नाम कर सकती है. यहां तक कि महिला चाहे तो इस संपत्ति से अपने बच्चे को भी बेदखल कर सकती है. विवाह के बाद यदि बेटी का वैवाहिक जीवन सही तरह से न चले तो यह पैतृक संपत्ति उसके सम्मानजनक जीवन का आधार बन सकती है.

2. खतना असंवैधानिक

इसी साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग में लड़कियों का खतना करने की प्रथा पर सवाल उठाते हुए इसे असंवैधानिक बताया. अदालत के मुताबिक लड़कियों का जीवन सिर्फ शादी करने और पति को खुश करने के लिए नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आज के समय में जब महिला अधिकारों को बढ़ावा दिया जा रहा है तो ऐसे में इन्हें उलटी दिशा में कैसे जाने दिया जा सकता है. उच्चतम अदालत ने यह टिप्पणी महिलाओं के खतने पर पूर्ण पाबंदी की मांग करने वाली एक याचिका पर सुनवाई के दौरान की.

मुस्लिमों के दाऊदी बोहरा समुदाय में छोटी लड़कियों का खतना किया जाता है. इस प्रक्रिया में लड़कियों के जननांग के बाहरी हिस्से को काट कर निकाल दिया जाता है. खतने के कारण यौन संक्रमण के साथ-साथ बांझपन की भी संभावना बढ़ जाती है. साथ ही ज्यादा खून बहने से कभी-कभी बच्चियों की मौत तक हो जाती है. कई बार दर्द सहन न कर पाने और सदमे के कारण बच्चियां कोमा में भी चली जाती हैं. भारत में दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय के लोग मुख्यतः महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में रहते हैं.

3. दहेज के मामले में सीधी गिरफ्तारी

एक अन्य अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने दहेज के मामले में महिला की शिकायत पर पति और ससुराल वालों को तुरंत गिरफ्तार करने का आदेश दिया. शीर्ष अदालत ने पिछले साल के अपने फैसले को पलटते हुए कहा कि अब गिरफ्तारी में परिवार कल्याण समीति की कोई भूमिका नहीं होगी. हालांकि आरोपितों के पास अग्रिम जमानत लेने का अधिकार फिलहाल बरकरार है. धारा 498 ए के दुरुपयोग पर दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान पिछले साल शीर्ष अदालत ने ऐसे मामलों में सीधी गिरफ्तारी रोक लगा दी थी.

दहेज उत्पीड़न एक ग़ैर जमानती अपराध है. आईपीसी की धारा 498 ए के तहत दहेज आरोपितों को न्यूनतम तीन साल की सजा का प्रावधान है. देश में 1961 में पहली बार दहेजप्रथा के खिलाफ कानून बना था. तब से लेकर आज तक इस कानून को और ज्यादा प्रभावी बनाने के लिए बहुत तरह के प्रयास किए जा चुके हैं, लेकिन वे सभी बेअसर ही दिख रहे हैं. एनसीआरबी की एक रिपोर्ट के अनुसार आज भी देश भर में औसतन 21 महिलाएं हर दिन दहेज हत्या का शिकार होती हैं. एक अनुमान के मुताबिक दहेज के सिर्फ 35 प्रतिशत मामलों में ही सजा हो पाती है. सख्त कानून के बावजूद दहेज प्रताड़नाएं कम न होने का ये भी एक अहम कारण है.

4. एकल मां पिता का नाम बताने के लिए बाध्य नहीं

मद्रास हाई कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि एकल मांओं को बच्चे के जन्म के पंजीकरण या किसी अन्य मौके पर पिता का नाम बताए जाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. यह फैसला विवाहित और अविवाहित दोनों एकल मांओं पर लागू होता है. एकल मांओं में मूलत: विधवा, तलाकशुदा, परित्यक्ता और अविवाहित माएं आती हैं. हालांकि इस बात के कोई स्पष्ट आंकड़े नहीं हैं कि इस समय हमारे देश में कितनी एकल मांएं हैं. लेकिन देश में बढ़ती एकल महिलाओं की संख्या एकल मांओं की तादाद में वृधि की तरफ स्पष्ट संकेत करती है. पिछले एक दशक में भारत में एकल महिलाओं की संख्या में लगभग 39 फीसदी की वृद्धि दर्ज हुई है. 2001 में देश में जहां पांच करोड़ बारह लाख एकल महिलाएं थीं वहीं 2010 में यह संख्या बढ़कर सात करोड़ 14 लाख हो गई.

मद्रास हाई कोर्ट का यह फैसला एकल मांओं के संबंध में लिए गए पूर्व फैसलों की अगली कड़ी के तौर पर दिखता है. उम्मीद की जा सकती है कि यह फैसला एकल मांओं की चुनौतियों को कम करने के साथ ही उनके प्रति समाज की मानसिकता को बदलने की जमीन भी तैयार करेगा.

5. महिला के रंग पर टिप्पणी तलाक का आधार हो सकती है

इसी साल पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि पति द्वारा अपनी पत्नी के रंग को लेकर तंज कसना तलाक का आधार हो सकता है. अदालत ने यह फैसला महेंद्रगढ़ जिले की एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया. कोर्ट ने कहा कि पति का महिला के रंग पर टिप्पणी करना न सिर्फ दुर्व्यवहार है, बल्कि एक किस्म की मानसिक क्रूरता भी है.

भारतीय समाज में लड़कियों को न सिर्फ ससुराल में बल्कि अपने मायके में भी रंगभेद का शिकार होना पड़ता है. अक्सर ही सांवले रंग की लड़कियों को ज्यादा लाड-प्यार और सम्मान नहीं दिया जाता. साथ ही मायके में भी ‘सांवले रंग के कारण कौन शादी करेगा’ के ताने भी उसे जब-तब सुनने को मिलते रहते हैं. सांवले रंग के कारण खासतौर से लड़कियों को मिलने वाले ताने और उपेक्षा हमारे समाज की बुनियादी सोच का हिस्सा है.

सांवले रंग के कारण लड़कियों को ताने देना हमारे समाज में इतना सहज है, कि यह कभी मानसिक हिंसा माना ही नहीं गया. उम्मीद की जा सकती है कि हाई कोर्ट के इस निर्णय के बाद घरों के भीतर होने वाली इस जैसी अन्य बातों को एक किस्म की मानसिक हिंसा मानने की शुरुआत होगी.