श्रीनगर का शिवपोरा इलाका. इस इलाके में कभी एक साइबर कैफे हुआ करता था जो अब मोबाइल उपकरण और रीचार्ज की दुकान बन चुका है. 17 साल के उबैद अहमद भट हर शनिवार को अपनी आठ जीबी की पेन ड्राइव लेकर इस दुकान पर पहुंचते हैं, दुकानदार को सौ रुपये देते हैं और बदले में पेन ड्राइव में एक दर्जन से ज्यादा फिल्में लेकर लौटते हैं. उबैद को फिल्में देखने का शौक है और हफ्ते भर वे इन्हीं डाउनलोडेड फिल्मों से काम चलाते हैं. उबैद ने कभी भी सिनेमाहाल में फिल्म नहीं देखी है.

उबैद की यह कहानी कश्मीर की पूरी नौजवान पीढ़ी की कहानी है. सत्याग्रह से बातचीत में उबैद कहते हैं, ‘मेरे घर से कुछ ही दूर कश्मीर का मशहूर सिनेमा हुआ करता था- ब्रॉडवे. मैं रोज वहां से गुज़रता हूं और रोज़ यही सोचता हूं कि कब मैं किसी सिनेमाहाल में अपने पसंदीदा कलाकारों को देखूंगा.’

कश्मीर के हज़ारों युवा जो कभी घाटी से बाहर नहीं गए हैं, उन्होंने अभी तक सिनेमाहाल में फिल्म नहीं देखी है क्योंकि कश्मीर घाटी के 14 से ज़्यादा सिनेमाघर पिछले 29 साल से बंद पड़े हुए हैं. हाल ही में खबर आयी थी कि राज्यपाल ने कश्मीर में फिर से सिनेमाघर खोलने की प्रक्रिया पर काम शुरू करने का आदेश दिया है. इस आदेश का क्या होगा, यह तो अभी दूर की बात है, लेकिन कश्मीर में एक समय बहुत अच्छा कारोबार करने वाले सिनेमाघरों के साथ आखिर ऐसा क्या हुआ कि लगभग पिछले तीन दश्क से यहां ताले पड़े हैं.

कभी कश्मीर में फिल्मों की भरी-पूरी संस्कृति थी

कश्मीर की उम्रदराज पीढ़ी, जिसने घाटी के पैलेडियम, नीलम और ब्रॉडवे जैसे सिनेमाघरों में बॉलीवुड और हॉलीवुड की फिल्में देखी हुई हैं, उस दौर की स्मृति को बड़ी भावुकता से याद करती है. 55 साल के गुलाम कादिर शेख सत्याग्रह से बातचीत में कहते हैं, ‘सिनेमा कश्मीर की संस्कृति में बसा हुआ था. एक तो हिंदी फिल्मों का रोमांच और दूसरा कश्मीर में 70 और 80 के दशक में सैकड़ों हिंदी फिल्मों की शूटिंग हुआ करती थी. लोग सितारों को कश्मीर में अक्सर घूमते-फिरते देखते थे जो कश्मीर को लोगों का फिल्मों से एक अलग संबंध जोड़ता था.’

कादिर शेख याद करते हैं कि वे अपने पिता के साथ दक्षिण कश्मीर के मशहूर पयर्टन स्थल पहलगाम में परचून की दुकान पर बैठा करते थे. पहलगाम उन दिनों फ़िल्मी सितारों का पसंदीदा ठिकाना हुआ करता था. शेख बताते हैं, ‘मैं शम्मी कपूर का दीवाना था और उनकी हर फिल्म देखा करता था. फिर एक दिन अचानक पहलगाम में शम्मी कपूर दिखे. उस मुलाकात ने जैसे जादू कर दिया. इसके बाद हर दूसरे-तीसरे दिन मैं फिल्म देखने श्रीनगर पहुंच जाता था.’

80 के दशक में श्रीनगर का मशहूर पैलेडियम सिनेमा
80 के दशक में श्रीनगर का मशहूर पैलेडियम सिनेमा

कादिर शेख जिस जमाने की बात कर रहे हैं वह जमाना घाटी में फिल्मों की दीवानगी का था. कश्मीर के सिनेमाघर खचाखच भरे रहते थे और फिल्म के शौकीनों में स्टूडेंट्स, सरकारी नौकर, दुकानदार सब थे. कश्मीर के फिल्म निर्माता और निर्देशक हुसैन खान बहुत दर्द के साथ याद करते हैं कि कैसे वे अपनी क्लास बंक करके फिल्म देखने जाते थे. वे कहते हैं, ‘एक जमाना था जब लोग सिनेमाहाल की लाइनों में टिकट लेने की लिए चोट लगने तक की परवाह नहीं करते थे. अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘कालिया’ देखने के लिए मैंने आधी रात तक टिकट का इंतजार किया. टिकट तो नहीं मिला लेकिन घर में पिता जी से मार जरूर मिल गई.’

हुसैन के मुताबिक यही वह दौर था जब उन्होंने सोचा था कि वे भी आगे चलकर फिल्में बनाएंगे. लेकिन फिर उनका उत्साह निराशा में बदल जाता है. वे कहते हैं, ‘यह अफ़सोस की बात है कि हमारी अपनी फिल्में अपने लोगों को दिखाने का हमारे पास कोई माध्यम ही नहीं है.’

जानकार बताते हैं कि घाटी में फिल्मों की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 60, 70 और 80 के दशकों में जो हॉलीवुड फिल्में देश के अन्य भागों में कम चला करती थीं, उनका कारोबार कश्मीर में बेहद अच्छा होता था. 1939 में बना और 1989 तक चलने वाला पैलेडियम सिनेमा अंग्रेजी फिल्मों के लिए मशहूर था. इसके मालिक मनमोहन गावरी बताते हैं, ‘हमारे सिनेमा की साख इतनी अच्छी थी कि दिल्ली में रिलीज़ होने से पहले ही पैलेडियम सिनेमा में अंग्रेजी फिल्मों की स्क्रीनिंग हुआ करती थी. हजारों की भीड़ टिकट की कतार में हुआ करती थी.’

फिर अचानक क्या हुआ?

कश्मीर के सिनेमाघर भले ही 1989 में बंद हुए हों, लेकिन सिनेमा के खिलाफ माहौल बनाने की शुरुआत इससे पहले हो चुकी थी. 1985 में श्रीनगर के रीगल सिनेमा में लीबिया के जाने माने स्वतंत्रता सेनानी ओमर मुख़्तार के जीवन पर आधारित हॉलीवुड फिल्म ‘लायन ऑफ़ डेज़र्ट’ दिखाई जा रही थी. इस्लामिक स्टूडेंट्स लीग के जावेद अहमद मीर भी अपने कुछ साथियों के साथ फिल्म देखने पहुंचे थे. फिल्म के दौरान ही इन लोगों ने अलगावादी नारे लगाने शुरु कर दिए.

जावेद मीर उस वाकये को याद करते हुए कहते हैं, ‘फिल्म में कुछ दृश्य ऐसे थे जो हमारी सोच और हमारे आंदोलन की गूंज थे, हमने जज्बात में नारे लगाने शुरु कर दिए.’ लेकिन यहीं से कश्मीर की फिल्म संस्कृति पर खौफ का साया मंडराने लगा. मीर और उनके साथियों के खिलाफ केस दर्ज हुए, ‘लायन ऑफ़ डेज़र्ट पर कश्मीर में प्रतिबंध लगा जो अभी तक जारी है.

कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार इफ्तिखार खान बताते हैं कि कैसे 1985 की उस घटना के बाद कश्मीर के सिनेमाघरों का माहौल पूरी तरह बदल गया. वे कहते हैं, ‘पुलिस पहले सिर्फ टिकट ब्लैक करने वालों पर नजर रखती थी, लेकिन अब इस बात पर जोर दिया जाने लगा कि कहीं कोई अलगाववादी हरकत न कर बैठे.’

कुछ सालों तक ऐसा ही चलता रहा और 1989 में जब कश्मीर घाटी के हालात बिगड़े तो अन्य व्यवसायों के साथ साथ सिनेमाघर भी लगभग खाली रहने लगे. वरिष्ठ पत्रकार इफ्तिखार कहते हैं, ‘इसके बावजूद कुछ लोग जाते रहे. लेकिन 18 अगस्त 1989 को ‘अल्लाह टाइगर्स नाम के एक गुट ने फिल्मों और शराब को हराम घोषित किया. इसके बाद खौफ के चलते लोगों ने सिनेमाहाल जाने से परहेज शुरु करना दिया.’ श्रीनगर में पुराने लोग बताते हैं कि ‘अल्लाह टाइगर्स’ के मिलिटेंट बाक़ायदा शहर में घूम कर यह देखते थे कि कहीं कोई सिनेमा या बार खुला तो नहीं है. श्रीनगर के नाज सिनेमा के बाहर दुकान चलाने वाले अब्दुल हमीद कहते हैं, ‘सिनेमाहाल मालिकों ने शुरुअात में कोशिश की सिनेमाघर चलते रहें, लेकिन जनवरी 1990 में आखिरकार कश्मीर के सिनेमाहालों के पर्दे एेसे गिरे कि अभी तक नहीं उठ सके.

कश्मीर के सिनेमाहाल अलगाववादियों की हरकतों के कारण बंद हुए, कुछ लोग इस बात से असहमति भी जताते हैं. तब के जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के एक मुख्य कमांडर जावेद मीर इस बात से इंकार करते हुए कहते हैं, ‘कश्मीर में खून खराबा हो रहा था और ऐसे में लोगों ने सिनेमाघरों की तरफ देखना तक भी बंद कर दिया था. कश्मीर में मातम था, और सिनेमाघर बंद हो जाना एक सामान्य सी चीज़ थी.’

ये दावे-प्रतिदावे अपनी जगह हैं, लेकिन हकीकत यह है कि 90 के दशक के पहले एक-दो सालों में कई सिनेमाघर जला दिए गए, जिनमें सब से मशहूर पैलेडियम सिनेमा भी था. फिर रातों-रात श्रीनगर के लगभग सारे सिनेमाघरों में सुरक्षा बलों ने डेरा डाल दिया. जो जगहें लोगों के मनोरंजन के लिए थीं, वहां कांटेदार तारें लगी हुई थीं और दरवाजों खिड़कियों पर रेत के बोरों से बने बंकर थे. एक सिनेमाघर को अस्पताल बना दिया गया. अस्पताल बनने वाले सिनेमाघर के मालिक सत्याग्रह को बताते हैं, ‘खतरा इसलिए ज्यादा था कि यह अज्ञात लोगों की तरफ से अा रहा था. इसलिए हमने वक्त रहते सुरक्षित रहने के लिए इसे अस्पताल में बदल दिया.’

दूसरी कोशिश

1999 में जब हालात थोड़े बेहतर हुए तो सरकार ने तीन सिनेमाघरों के मालिकों को फिर से हाल शुरु करने को कहा. इसके बाद नीलम, रीगल और ब्रॉडवे फिर से फिल्में दिखाने लगे. लेकिन यह कोशिश सरकारी कोशिश भर थी. ज्यादातर सिनेमाहाल खाली पड़े रहते थे और डर का माहौल था. 24 अगस्त 1999 को रीगल सिनेमा पर हुए ग्रेनेड हमले ने भय के माहौल को और गहरा कर दिया. हमले के वक्त श्रीनगर पुलिस कंट्रोल रुम में तैनात एक पुलिस अधिकारी बताते हैं कि उस समय वहां प्यार कोई खेल नहीं नाम की फिल्म चल रही थी. हमले में एक व्यक्ति मारा गया और 114 लोग घायल हो गए. इस हमले के बाद रीगल सिनेमा हमेशा के लिए बंद हो गया. इसके बाद ब्रॉडवे भी बंद हो गया.

लेकिन नीलम सिनेमाहाल चलता रहा. एक पुलिस अधिकारी बताते हैं, ‘सितंबर 2005 में आमिर खान की फिल्म मंगल पांडेय चल रही थी और करीब 70 लोग अंदर बैठ के फिल्म देख रहे थे. तभी आतंकियों ने सिनेमाघर में सुरक्षाबलों पर हमला कर दिया था. सत्तर लोग कई घंटों तक गोलीबारी के बीच नीलम सिनेमा के अंदर फंसे रहे. उस हमले में एक मिलिटेंट मारा गया.’ इस वारदात के बाद नीलम सिनेमा भी हमेशा के लिए बंद हो गया.

लोगों की उम्मीद और विरोध

कश्मीर में हर साल एक फिल्म समारोह आयोजित करने वाले फिल्म निर्माता मुश्ताक़ अली सवाल उठाते हैं, ‘फिल्म संचार का एक माध्यम है. मेरी समझ में यह नहीं आता कि अगर कश्मीर में अखबार बिना रोक-टोक चल रहे हैं तो सिनेमाघर क्यों बंद हैं?’ अली कहते हैं, ‘कश्मीर के ज़्यादातर नौजवानों ने कभी सिनेमा नहीं देखा है, लेकिन तब भी हर साल कश्मीर यूनिवर्सिटी में सैंकड़ों बच्चे ‘फिल्म मेकिंग’ पढ़ने आते हैं. इससे पता चलता है कि युवा पीढ़ी को फिल्मों में कितनी रूचि है. इनको इस माध्यम से दूर रखना इनके साथ ज़्यादती है.’

अली की तरह ही फिल्म निर्माता हुसैन खान भी चाहते हैं कि कश्मीर में सिनेमा घर अब खुल जाने चाहिए। खान ने हाल ही में ‘कश्मीर डेली’ नाम की फिल्म बनाई है और बड़ी मुश्किल से कश्मीर के शेर-ए-कश्मीर कांफ्रेंस सेंटर में कुछ चुनिंदा लोगों को दिखाई. खान कहते हैं, ‘होना तो यह चाहिए था कि हमारे यहां खुद की फिल्म इंडस्ट्री हो, लेकिन हमारे पास फिल्म दिखाने तक की जगह नहीं है.’

2017 में पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के मंत्री नईम अख्तर ने कहा था, ‘हमने अपने बच्चों को वास्तविक मनोरंजन से दूर रखा हुआ है. आजकल तो हर इंसान की जेब में सिनेमा है तो फिर मसला क्या है अगर हम अपनी नयी पीढ़ी को भी मनोरंजन का यह जरिया फिर से दे दें. ज़रुरत है कि समाज में इस बात को लेके एक राय बने और सरकार भी कोशिशें करे.’ नईम अख्तर का यह बयान सऊदी अरब में सिनेमाहाल खुलने की खबर के फ़ौरन बाद आया था.

लेकिन इसके साथ ही साथ अलगाववादी नेता सईद अली गिलानी ने सिनेमाघरों को गैर-इस्लामी बता सऊदी अरब पर टिप्पणी कर दी थी. जिसके बाद लोगों में यह संदेश गया कि अलगाववादी अभी भी कश्मीर में सिनेमाहाल खोलने के खिलाफ हैं. हालांकि कुछ लोग इसे दूसरी तरह से देखते हैं. उनका मानना है कि सरकार की मंशा सिनेमाहाल चालू कराने की कम, इन्हें जैसे-तैसे खोलकर यह दिखाना है कि कश्मीर में हालात ठीक हैं.

वरिष्ठ पत्रकार शम्स इरफ़ान सत्याग्रह को बताते हैं, ‘दुर्भाग्यवश कश्मीर में हर चीज़, चाहे वह टूरिज्म हो या सिनेमाघरों का वापस खुलना, यहां के हालात से जोड़ी जाती है. सिनेमाघरों को खोला जाए, लेकिन यह कह कर नहीं कि अब हालात ठीक हैं. ज़रुरत इस बात की है कि मनोरंजन, व्यापार और कला को यहां के हालात से अलग करके देखा जाए.’ इरफ़ान आगे कहते हैं कि कश्मीर के युवा जो खून खराबे के अलावा कुछ नहीं देखते इस मनोरंजन के ज़्यादा हक़दार हैं, सरकार को चाहिए कि इन सब चीज़ों को राजनीति से अलग रखा जाए.

राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने पहल तो कर दी है, लेकिन देखना है कि यह पहल अंजाम तक जाती है या कश्मीर के हालात की पेचीदगी में उलझ जाती है. तब तक उबैद और उनके जैसे सैकड़ों फिल्म के शौकीन युवा अपनी पेनड्राइव लेकर पास के साइबर कैफे से फिल्में डाउनलोड कराते रहेंगे.