दुनिया एक बार फिर हक्की-बक्की है. सभी जानते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का ‘ट्रंप-कार्ड’ (तुरुप का पत्ता) यही है कि वे कब क्या कह बैठें, इसे कोई नहीं जानता. शायद वे खुद भी नहीं जानते. 19 दिसंबर के दिन यही हुआ. उन्होंने ‘बिन बादल बरसात’ की तरह यह कह कर सब को चक्कर में डाल दिया कि इस्लामी ख़लीफ़त वाली ‘आईएस’ मिलिशिया पर विजय मिल चुकी है, इसलिए सीरिया में तैनात दो हज़ार अमेरिकी सैनिकों को अब वापस बुला लिया जायेगा. इस घोषणा से नाराज़ रक्षामंत्री जेम्स मैटिस ने एक ही दिन बाद ट्रंप को अपना त्यागपत्र थमा दिया कि वे भी अब वापस जा रहे हैं.

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने निर्णय को सही बताते हुए ट्वीट किया, ‘अमेरिका को क्या मध्यपूर्व की पुलिस बने रहना चाहिये? हमें हमेशा के लिए वहीं रहना चाहिये? वहां अमेरिकी उपस्थिति की क़ीमत हमारे सैनिकों की जान और ग़ैरों की रक्षा के लिए अरबों डॉलर का ख़र्च है. समय आ गया है कि अब दूसरे वहां लड़ें-भिड़ें.’ आगे उन्होंने लिखा कि रूस, ईरान, सीरिया और कई दूसरे (देश) भी अब जरा आईएस और उन दूसरों से लड़ कर देखें, जिनसे वे घृणा करते हैं.’

‘नाटो’ के देश भी परेशान

अमेरिकी नेतृत्व वाले ‘नाटो’ सैन्य संगठन के कम से कम तीन प्रमुख देश जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन परेशान हैं क्योंकि वे भी सीरिया में सक्रिय हैं. उनका क्या होगा? तीनों की समझ में नहीं आ रहा है कि ट्रंप ने इतना बड़ा निर्णय उन्हें पूछे-बताये बिना कैसे ले लिया? तीनों देश इसे निगल नहीं पा रहे हैं कि ‘आईएस’ मिलिशिया पर मानो कोई ऐसी अंतिम विजय मिल गयी है कि अब उससे कोई ख़तरा ही नहीं रहा!

जर्मन विदेश मंत्री हाइको मास ने इसे अमेरिकी पक्ष का अचानक रास्ता बदलना’ बताते हुए कहा, ‘आईएस को पीछे ज़रूर धकेल दिया गया है, पर इससे ख़तरे का अंत नहीं हो गया है.’ ब्रिटेन के विदेश मंत्रालय ने एक वक्तव्य में लिखा, ‘आईएस के विरुद्ध सारी सफलताओं के होते हुए भी अभी बहुत कुछ करना बाक़ी है. इस बात की अनदेखी नहीं की जा सकती कि बिना ज़मीनी क़ब्ज़े के भी यह जिहादी मिलिशिया ख़तरे का एक बड़ा स्रोत है.’ फ्रांस की रक्षा मंत्री फ्लोरेन्स पार्ली ने ट्वीट किया, ‘आईएस’ नक्शे पर से मिट नहीं गया है. उस पर (पहले) पूरी सैन्य विजय पानी है.’ यूरोप के मीडिया ने लगभग एक स्वर में ट्रंप की घोषणा को उन कुर्दों के साथ विश्वासघात’’ बताया, जिन्होंने अमेरिका पर विश्वास करते हुए ‘आईएस’ के जिहादियों को पछाड़ने में अपनी जान गंवाई.

तुर्की की रणनीति

सच्चाई यह है कि डोनाल्ड ट्रंप ने सीरिया से अमेरिकी सैनिक वापस बुलाने की घोषणा अपनी समझ से नहीं, तुर्की के चतुर राष्ट्रपति रजब तैय्यब एर्दोआन की बातों में आकर अपनी नासमझी से की है. एर्दोआन ने एक ही हफ्ते पहले कहा था कि उनकी सेना तुर्की से सटे उत्तरी सीरिया में कुर्दों की ‘वाईपीजी’ (जन प्रतिरक्षा) मिलिशिया को कुचलने के लिए कुछ ही दिनों में एक बड़ा अभियान छेड़ने जा रही है. मंगलवार को ही उनके एक मंत्री मौलूद जावेश उगलू का बयान आया कि तुर्की उत्तरी सीरिया से कुर्द लड़ाकों को हर हाल में खदेड़ कर रहेगा.

एर्दोआन ‘वाईपीजी’ पर लंबे समय से कुपित हैं. वे उसे एक आतंकवादी संगठन बताते हैं. उत्तरी सीरिया के मनबीज इलाके और फ़रात नदी के पूर्वी हिस्से पर ‘वाईपीजी’ का ही क़ब्ज़ा है. उसके कुर्द लड़ाकों ने, अमेरिकी प्रशिक्षकों और अमेरिका से मिले हथियारों के बल पर वहां के ‘आईएस’ जिहादियों को खदेड़ दिया है. वहां कुर्दों की ही एक स्वायत्तशासी अंतरिम सरकार काम कर रही है.

राष्ट्रपति एर्दोआन को कुर्द वैसे भी फूटी आंखों नहीं सुहाते. वे कम से कम तीन कारणों से ‘वाईपीजी’ वाले उत्तरी सीरिया पर तुर्की का आधिपत्य चाहते हैं. पहला यह कि ‘वाईपीजी’ मिलिशिया ने ही उस ‘आईएस’ की कमर तोड़ी है, जिसे अतीत में तुर्की ही पालता-पोसता रहा है. दूसरा यह कि ‘वाईपीजी’ की इस सफलता में उन दो हज़ार अमेरिकी सैनिकों का भी बड़ा हाथ है, जो उत्तरी सीरिया के कुर्दों को अमेरिकी हथियारों से लैस करने और उनके इस्तेमाल का प्रशिक्षण देने के लिए वहां तैनात हैं. तीसरा यह कि इस इलाके को एक तथाकथित ‘’बफ़र ज़ोन’’ बता कर एर्दोआन वहां उन सीरियाई शरणार्थियों को बसाना चाहते हैं, जिन्हें वे तुर्की में नहीं देखना चाहते. यह तीसरा कारण ‘अंगुली पकड़ कर बांह पकड़ने वाली’ एक ऐसी रणनीतिक चाल है, जिसके द्वारा एर्दोआन एक दिन उत्तरी सीरिया को हथिया लेने के सपने देख रहे हैं.

एर्दोआन का नया तुर्की

आज का तुर्की 2023 में अपनी स्थापना की सौवीं जयंती मनायेगा. राष्ट्रपति एर्दोआन तब तक तुर्की को एक ऐसा ‘नया तुर्की’ बना देना चाहते हैं, जिसमें उनका स्थान तुर्की के भूतपूर्व सुल्तानों जैसा हो. इसके लिए देश की सीमाओं के विस्तार सहित उन्हें कुछ ऐसा कमाल कर दिखाना है, जो आधुनिक तुर्की के पिता कहलाने वाले कमाल अतातुर्क सहित पिछले सौ वर्षों में कोई तुर्क शासक नहीं कर पाया. उत्तरी सीरिया के कुर्दों को खदेड़ कर उनकी ज़मीन को हड़प लेना और वहां लाखों शरणार्थियों को बसा कर तुर्की में जगह ख़ाली करना अपनी जनता की सस्ती वाह-वाही लूटने का उन्हें सबसे सरल कमाल लगता है.

कुर्दों की ‘वाईपीजी’ मिलिशिया के लड़ाकों को तुर्की के टैंक तो आसानी से रौंद देते. लेकिन, उन्हें शिक्षित-प्रशिक्षित करने और हथियार देने वाले दो हज़ार अमेरिकी सैनिकों का क्या किया जाये? उन पर गोली चलाने का मतलब होता, ‘नाटो’ का सदस्य रहते हुए उसी अमेरिका से टकराना, जो नाटो का मुखिया है और तुर्की के लिए हथियार पाने का मुख्य जरिया भी. इसलिए बुद्धिमत्ता इसी में थी कि अमेरिका को किसी तरह राज़ी किया जाय कि वह उत्तरी सीरिया से अपने सैनिक हटा ले और वहां के कुर्दों को अकेला छोड़ दे.

ट्रंप-एर्दोआन टेलीफ़ोन वार्ता

समाचार एजेंसी एसोशिएटेड प्रेस (एपी) के सूत्रों का कहना है कि तुर्की के राष्ट्रपति द्वारा अमेरिका समर्थित ‘वाईपीजी’ कुर्द मिलिशिया के खिलाफ जल्द ही सैनिक कार्रवाई शुरू करने की घोषणा के बाद अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने पहले खुद यह जानने का प्रयास किया कि तुर्की आख़िर चाहता क्या है. कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिलने पर उन्होंने ट्रंप और एर्दोआन के बीच 14 दिसंबर को एक टेलीफ़ोन वार्ता की व्यवस्था की.

विदेश मंत्री पॉम्पियो, रक्षा मंत्री मैटिस और अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा टीम के कुछ दूसरे सदस्यों ने राष्ट्रपति ट्रंप को उन तथ्यों और तर्कों की एक लिस्ट दी, जिनकी टेलीफ़ोन वार्ता के समय उन्हें ज़रूरत पड़ सकती थी. उनके आधार पर ट्रंप को चाहिये था कि वे एर्दोआन को समझाते कि समस्या का निपटारा बातचीत से किया जाना चाहिये. लेकिन ट्रंप ने लिस्ट वाली पर्ची की परवाह ही नहीं की. बल्कि, शेखी बघारने के चक्कर में अपनी ही तरफ़ से कुछ ऐसी बातें कह दीं, जिसके बाद वही होना था, जो हुआ.

‘तो फिर आप वहा हैं ही क्यों?’

‘एपी’ के सूत्रों के अनुसार, ट्रंप ने टेलीफ़ोन पर कई बार कहा कि अमेरिकी सैनिक सीरिया में आईएस को हराने के लिए भेजे गये हैं और उन्होंने 99 प्रतिशत सफलता पा ली है. उनकी इस शेखी के बाद स्वाभाविक ही था कि एर्दोआन यही कहते कि जब काम हो गया है ‘तो फिर आप वहां हैं ही क्यों?’ जानकारों के मुताबिक ट्रंप के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन भी टेलीफ़ोन वार्ता के समय वहां मौजूद थे. उन्होंने ट्रंप से कहा कि 99 प्रतिशत सफलता पूरी जीत नहीं है, क्योंकि बात सिर्फ़ ज़मीनी क़ब्ज़े की नहीं है. ट्रंप तब भी अपनी बात पर अड़े रहे कि सीरिया में तैनात अमेरिकी सैनिक वापस बुला लिये जायेंगे.

इस बातचीत में तुर्की के राष्ट्रपति ने एक ऐसा चुग्गा फेंका था जिसे देखते ही ट्रंप उनके जाल में फंस गये. एर्दोआन ने 21 दिसंबर को बताया कि उन्होंने ट्रंप को यह आश्वासन दिया कि सीरिया से अमेरिकी सौनिक चले जाने के बाद आईएस के बचे-खुचे जिहादियों का सफ़ाया तुर्की की सेना करेगी. इसके लिए अमेरिका की ओर से यदि ‘लॉजिस्टिक’ की सहायता मिल जाये, तो वही काफ़ी होगी. ट्रंप इस आश्वासन पर मुग्ध हो गये.

हथियारों का सौदा

‘लॉजिस्टिक’ की सहायता से मतलब था हथियारों का सौदा. एर्दोआन ने डोनाल्ड ट्रंप से कहा कि अपनी वायुसेना के लिए वे अमेरिकी ‘पेट्रियॉट’ रॉकेट चाहते हैं. उन्होंने साढ़े तीन अरब डॉलर के सैदे का लालच दिखाया. ट्रंप पिघल गये. सौदा हो गया. इससे पहले अमेरिकी नाराज़ थे कि ‘नाटो’ का पुराना सदस्य होते हुए भी तुर्की अपनी वायुसेना के लिए रूसी रॉकेट ख़रीदने जा रहा है.

राष्ट्रपति ट्रंप को या तो पता ही नहीं था, या उनके लिए इस बात का कोई महत्व ही नहीं था कि जिस एर्दोआन ने एक समय आईएस के जिहादियों को पाला-पोसा और 2017 में सीरिया के अफ़रीन प्रदेश के कुर्दों के विरुद्ध अभियान में इस्तेमाल किया, वही एर्दोआन आईएस का क्या पूरी ईमानदारी के साथ सफ़ाया करना चाहेंगे. यूरोप का शायद ही कोई तुर्की-विशेषज्ञ यह मानने को तैयार है कि एर्दोआन अपने इस आश्वासन को निभायेंगे.

कुर्दों को भी बख्शा नहीं जायेगा

तुर्की के राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप के साथ हुई बातचीत के अनुसार ही हमारी कार्ययोजना बनेगी, लेकिन कुर्दों को भी बख्शा नहीं जायेगा. तुर्की के मीडिया में कहा जा रहा है कि अब केवल इस बात की प्रतीक्षा है कि अमेरिकी सैनिक कब सीरिया से जाते हैं.

तुर्की देर तक प्रतीक्षा नहीं करेगा. तुर्की के राष्ट्रपति पहले ही पर्याप्त संकेत दे चुके हैं कि वे हर क़ीमत पर कुर्दों की ‘वाईपीजी’ मिलिशिया का पूर्ण उन्मूलन चाहते हैं. वही कुर्दों की इस समय सबसे जुझारु मिलिशिया है. एर्दोआन डरते हैं कि उसके नियंत्रण वाला उत्तरी सीरिया, जिसे ‘पश्चिमी कुर्दिस्तान’ भी कहा जाने लगा है, कुर्दों का ऐसा पहला स्वतंत्र देश बन सकता है, जिससे तुर्की के कुर्दों को अपने स्वतंत्र कुर्दिस्तान के लिए नयी प्रेरणा मिलने लगेगी.

कुर्दों के जनसंहार पर चूं तक नहीं

मध्यपूर्व के सबसे अधिक कुर्द तुर्की में ही रहते हैं. तुर्कों की तरह वे भी मुसलमान ही हैं. तब भी, वे सदियों से अपने साथ दमन और अत्याचार भुगत रहे हैं. सबसे अजीब बात तो यह है कि जो इस्लामी जगत फ़िलीस्तीनियों पर चली हर गोली के लिए आसमान सिर पर उठा लेता है, वही इस्लामी जगत तुर्की द्वारा कुर्दों के जनसंहार पर चूं तक नहीं करता. इस्लामी जगत ही नहीं, रूस और अमेरिका सहित दुनिया के लगभग हर देश ने मान लिया है कि फ़िलीस्तीनियों को तो एक स्वतंत्र देश मिलना चाहिये, कश्मीरियों को भी, लेकिन कुर्दों को कतई नहीं. कुर्द कम से कम तीन सदियों से अपने एक अलग देश के लिए तरस रहे हैं. जब भी वे अपने लक्ष्य के नजदीक होते हैं, कोई न कोई महाशक्ति उन्हें धोखा दे जाती है.

एर्दोआन की इच्छानुसार अमेरिकी सैनिक सीरिया से यदि चले भी जाते हैं, तब भी रूसी और ईरानी सैनिक वहां बने रहेंगे. ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी हाल ही में तुर्की में थे. वे और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद के सबसे बड़े शुभचिंक और संरक्षक हैं. इन दोनों का सहारा न रहा होता, तो बशर अल असद की लुटिया कब की डूब चुकी होती.

तीन महानुभावों की मिलीभगत

तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन ही बशर अल असद की लुटिया डुबाने पर सबसे अधिक उतारू थे. अब इन्हीं तीनों महानुभावों की मिलीभगत हो गयी है. कज़ाकस्तान की राजधानी अस्ताना के नाम पर बने ‘अस्ताना ग्रुप’ की बैठकों में वे सीरिया के भाग्य का फ़ैसला करते हैं. कहने की आवश्यकता नहीं कि सीरिया से अपने सैनिक वापस बुलाने की अमेरिकी घोषणा पर रूसी राष्ट्रपति तालियां बजा रहे हैं और ईरानी राष्ट्रपति भी राहत की सांस ले रहे हैं. सीरिया में अब उन्हीं की निर्बाध हेकड़ी चलेगी.

दूसरी ओर, अमेरिका के यूरोपीय मित्र बेचैन हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप अपने बेतुके निर्णय से सीरिया को ही नहीं, पूरे मध्यपूर्व को इस तिकड़ी के हवाले करने जा रहे हैं. इन देशों को लग रहा है कि अमेरिका के बिना वे मध्यपूर्व में नेतृत्व-विहीन हो जायेंगे. यही चिंता कूटनीतिक तरीके से जताते हुए जर्मनी के विदेश मंत्री हाइको मास ने कहा, ‘हमें अब अपने सहयोगियों के साथ मिल कर एक ऐसी राजनैतिक प्रक्रिया बनानी होगी, जिसकी नेतृत्वकारी भूमिका संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के पास रहेगी.’

जर्मनी का नया सिरदर्द

जर्मनी को अब अचानक इस प्रश्न का भी उत्तर ढूंढना पड़ रहा है कि नाटो की कमान के अंतर्गत जर्मनी के जो टोर्नैडो विमान सीरिया के ऊपर टोही उड़ाने भरते हैं, उनका क्या होगा? ये उड़ानें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के किसी समुचित प्रस्ताव के बिना ही होती रही हैं. यानी, वे अंतरराष्ट्रीय क़ानून सम्मत नहीं हैं. जर्मन विमान जो गोपनीय तस्वीरें लेते हैं, वे ‘नाटो’ का सदस्य होने के नाते तुर्की के हाथ भी लगती हैं. हो सकता है कि तुर्की उनसे लाभ उठा कर कुर्दों के ठिकानों पर बमबारी करता रहा हो और आगे भी कर सकता है.