प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महात्वाकांक्षी बुलेट ट्रेन परियोजना घाटे का सौदा साबित हो सकती है. यह आशंका किसी और ने नहीं बल्कि महाराष्ट्र के शहरी विकास मंत्रालय ने जताई है. यही नहीं द हिंदू के मुताबिक सूचना के अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत दायर के एक अर्ज़ी के ज़वाब में मंत्रालय ने अपनी इस आशंका को सार्वजनिक भी किया है.

अख़बार के मुताबिक महाराष्ट्र के कई मंत्रालयों ने इस परियाेजना को लेकर आपत्तियां जताई हैं. ये सभी आपत्तियां शहरी विकास मंत्रालय की रिपोर्ट में दर्ज़ हैं. इनमें से एक ये है कि मुंबई के बांद्रा-कुर्ला परिसर में प्रस्तावित बुलेट ट्रेन के स्टेशन की फ्लोर स्पेस इंडेक्स (एफएसआई) का पूरी तरह इस्तेमाल न हो पाए. सीधे शब्दों में कहें तो यहां जितना निर्माण होना है उसका समुचित उपयोग मुश्किल है क्योंकि इस क्षेत्र में ज़्यादा ऊंची इमारत बनाने पर प्रतिबंध लगा हुआ है. इसका अर्थ यह भी लगाया गया है कि बुलेट ट्रेन स्टेशन परिसर का समुचित इस्तेमाल न हो पाने से वित्तीय नुकसान हो सकता है.

दूसरी बात बुलेट ट्रेन के लिए मिल रहे कर्ज़ का बोझ किस पर कितना आएगा यह भी स्पष्ट नहीं है. इसके अलावा यह भी साफ नहीं है कि अगर बुलेट ट्रेन परियोजना में लंबी अवधि के दौरान घाटा हुआ तो उस स्थिति में कौन-कितना भार उठाएगा. विभाग की मानें को परियोजना में घाटे की संभावना वैसे भी काफ़ी अधिक है. इसे राज्य के वित्त विभाग ने भी माना है. उसके मुताबिक, ‘बुलेट ट्रेन पर आने वाले ख़र्च की तुलना में उससे होने वाला संभावित मुनाफ़ा बहुत कम है.’

प्रदेश के परिवहन विभाग की आपत्तियां और आशंकाएं भी इसी तरह की हैं. उसने भारतीय रेलवे से तो यह भी स्पष्ट रूप से जानना चाहा है कि महाराष्ट्र से गुजरात के बीच ‘कितने यात्री नौकरी या व्यवसाय के सिलसिले में बुलेट ट्रेन से आवाज़ाही करेंगे.’ इन्हीं कारणों से आरटीआई दायर करने वाले कार्यकर्ता जीतेंद्र गाडगे भी सरकारों पर सवाल उठाते हैं. उनके मुताबिक, ‘एक बात साफ़ है कि राज्य की देवेंद्र फडणवीस सरकार ने इन आशंकाओं के बावज़ूद परियोजना को केंद्र के दबाव में ही मंज़ूरी दी है. वरना पहले वह राज्य के हितों और परियोजना की व्यावहारिकता को ध्यान में ज़रूर रखती.’