मशहूर इतिहासकार रामचंद्र गुहा का मानना है कि आजादी के वक्त मुस्लिम उच्च और मध्य वर्ग के पाकिस्तान चले जाने से हिंदुस्तान के मुसलमान मुख्यधारा में आने से वंचित रह गए. ऐसा हो सकता है और नहीं भी. भारत में इस्लामिक ब्रदरहुड की बात करें तो इसके सबसे पहले पैरोकार आगा ख़ान दिखाई देते हैं जिन्होंने 1906 में मुसलमानों को अलग से प्रतिनिधित्व देने की बात कही थी. फिर जिन्ना और इकबाल नज़र आते हैं. अली बंधु ख़िलाफ़त आंदोलन तक ही गांधी का दामन पकड़े नज़र आते हैं. इसी कड़ी में तत्कालीन मध्य असेंबली के स्पीकर और भूतपूर्व जज सर अब्दुल रहीम का यह बयान भी जुड़ता है कि हिंदू पड़ोसी के बनिस्बत भारत का मुसलमान ख़ुद को किसी अफ़ग़ान या तुर्क के नज़दीक पाता है.

लेकिन यह आधा सच है. दूसरी तरफ़, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे दिग्गज भी हैं जो बंटवारे के ख़िलाफ़ थे. 25 दिसंबर, 1880 को ग़ाज़ीपुर, उत्तर प्रदेश में पैदा हुए इस लेख के किरदार मुख़्तार अहमद अंसारी भी इसी जमात के हैं. यह वही शख्सियत है जिसके नाम पर दिल्ली में अंसारी रोड है. एमए अंसारी के बारे में एक जानकारी यह भी है कि पूर्व उपराष्ट्रपति डॉक्टर हामिद अंसारी और कुख्यात बाहुबली मुख़्तार अंसारी उनके रिश्तेदार हैं.

जड़ें और तालीम

बताते हैं कि एमए अंसारी का परिवार मुहम्मद बिन तुगलक के ज़माने में हिंदुस्तान आया था. यानी वे कुछ पीढ़ी पहले मुसलमान बने जिन्ना या इकबाल से ज़्यादा ‘ख़ालिस’ मुसलमान कहे जा सकते हैं. कई पुश्तें अदालतों और तलवारों के साए में गुजरीं और उनकी बारी आते-आते फ़ाके काटने की नौबत आ गई.

शुरुआती तालीम के बाद एमए अंसारी हैदराबाद चले गए जहां निज़ाम के दरबार में इनके दो भाई हाजिरी बजाते थे. मद्रास यूनिवर्सिटी से ही डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी करके निज़ाम के वजीफ़े की बदौलत आगे की पढ़ाई के लिए वे लंदन गए. वहां 1905 में अंसारी ने सर्जरी में डिग्री हासिल की. वे पहले भारतीय थे जो लंदन के लॉक हॉस्पिटल के रजिस्ट्रार नियुक्त हुए और बाद में यहीं के चेरिंग क्रॉस अस्पताल में सर्जन बने. अंसारी ने उपदंश (सिफ़लिस) बीमारी पर एक पेपर जारी किया था जिसके आधार पर इस बीमारी का इलाज तय किया गया. उन्होंने यौन संक्रमण से जुड़ी बीमारियों पर काफ़ी काम किया था और आम-ओ-ख़ास इनके मरीज़ होते थे. इसका ज़िक्र आगे करेंगे. फ़िलहाल उस दौर की राजनीति और आज़ादी के आंदोलन में इनकी भूमिका पर बात की जाए.

गांधी और जिन्ना के क़रीबी

एमए अंसारी उन चंद लोगों में से थे जो इंडियन नेशनल कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ही में अपना वजूद रखते थे. लंदन में उनकी दोस्ती मोतीलाल नेहरू से हुई जिनकी वजह से कांग्रेस में उनका वजन बढ़ गया. 1916 में हुए ‘लखनऊ समझौते’ में एमए अंसारी की अहम भूमिका थी. आपको याद दिला दें कि लखनऊ समझौते के तहत अल्पसंख्यकों को अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था की गई थी.

1918 में मुस्लिम लीग के अधिवेशन में एमए अंसारी का भाषण इस कदर राष्ट्रीयता की बात करता हुआ था कि ब्रिटिश सरकार को उसे ख़ारिज करना पड़ा. 1927 में वे इंडियन नेशनल कांग्रेस (आईएनएसी) के अध्यक्ष चुने गए. इतिहासकार पी राजेश्वर राव लिखते हैं, ‘आईएनसी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जाना उनकी देशभक्ति का सबसे बड़ा ईनाम था.’ दिल्ली में इनके ग़रीबख़ाने का नाम ‘दारुस्सलाम’ (शिक्षा का घर) था जो बेहद शानदार था. महात्मा गांधी जब भी दिल्ली आते, इन्हीं के घर रुकते थे. इन्होंने साइमन कमीशन के ख़िलाफ़ आंदोलन में कांग्रेस की अगुवाई की थी. 1935 के चुनावों में उन्होंने कांग्रेस की सेंट्रल असेंबली की जीत में अहम भूमिका निभाई.

जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी

इसकी स्थापना का साल 1920 का है. तब अलीगढ़ हिंदुस्तान में मुस्लिम रेनेसां (पुनर्जागरण) का बड़ा केंद्र था. लाहौर से भी मुस्लिम विद्वान यहीं आते थे. जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी की स्थापना अलीगढ़ में ही हुई थी और इसमें एमए अंसारी एक मुख्य स्तंभ थे. बाद में इसे जब दिल्ली में स्थापित किया गया तो वे इसके उपकुलपति (वाइस चांसलर) नियुक्त हुए थे.

पर राजनीति और शिक्षा के अलावा एमए अंसारी की शख्सियत का एक और पहलू था. वह था उनका डॉक्टरी पेशा और इसकी वजह से वे काफ़ी जाने गए.

राजाओं के यौन रोगों के चिकित्सक

एमए अंसारी के भाई यूनानी पद्धति से उपचार करते थे जबकि उन्होंने पश्चिमी विज्ञान का सहारा लिया. जैसा कि ऊपर जिक्र है, उन्होंने सिफ़लिस पर काफ़ी महत्वपूर्ण काम किया था. 1912 में एमए अंसारी ने एशिया माइनर (तुर्की) में रेडक्रॉस के एक मिशन की अगुवाई की. हिंदुस्तान आने पर उन्हें लाहौर मेडिकल कॉलेज का प्रिंसिपल बनने का न्यौता मिला जिसे ठुकराकर उन्होंने कलकत्ता में मेडिकल प्रैक्टिस शुरू की. बाद में वे दिल्ली जा बसे. एमए अंसारी अलवर, रामपुर और भोपाल के नवाबों के मुख्य चिकित्सक थे और इस वजह से उन पर रईसी बरपा हुई.

एक नए विज्ञान की शुरुआत

बीसवीं सदी के शुरुआती दौर में बुजुर्गों में कामेच्छा जागृति पर काफ़ी खोज की गयी. ज़ेनोट्रांसप्लांटेशन की पद्धति का विकास हुआ जिसमें अन्य जीवों के ऊतक (टिश्यू) और कोशिकाएं (सेल) इंसानों में प्रत्यारोपित करने पर काम हो रहा था. डॉ अंसारी भी इसमें अपना हाथ आज़माने निकल पड़े. डॉक्टर सेर्गी वेरेनोफ़, डॉ रोबर्ट लीचिन्सटर्न, डॉ युजीन स्टेनियाक इस दिशा में क्रांतिकारी खोज कर रहे थे, जिसके तहत कुछ ख़ास जानवरों के अंडकोष इंसानों में लगाने का प्रयास चल रहा था. डॉ अंसारी ने इस विषय पर काफ़ी जानकारी हासिल की और हिंदुस्तान में इसका उपयोग किया.

अपने जीवन के आख़िरी दशक में उन्होंने लगभग 700 ऑपेरशन करके जानवरों के अंडकोष मनुष्यों में प्रत्यारोपित किए जिनमें ज़्यादातर प्रॉपर्टी एजेंट, खिलाड़ी, सरकारी अफ़सर और तत्कालीन राजपरिवारों के लोग शामिल थे. उन्होंने तकरीबन 400 मरीज़ों को ऑपेरशन के बाद अपनी निगरानी में रखा. उन्होंने दावा किया कि वे ज़्यादातर लोगों में ज़ेनोट्रांसप्लांटेशन पद्धति से कामेच्छा जागृत करने में सफल हुए थे.

एमए अंसारी ने महात्मा गांधी को अपनी क़िताब ‘रीजनरेशन ऑफ़ मैन’ पढ़ने के लिए दी थी जिसे उन्होंने एक दिन में पढ़ डाला! इसे पढ़कर गांधी ने अंसारी से पूछा कि ऐसे पौरुष का क्या महत्व जिसे मनुष्य दो सेकंड बाद ही खो देता है?

1936 की गर्मियों में रामपुर के नवाब का इलाज करके एमए अंसारी मसूरी से लौट रहे थे कि ट्रेन में दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हो गई.

क़िस्सा कोताह यह है कि नवाबी रुख़, गोरी रंगत और भरी-भरी मूंछों वाले डॉक्टर अंसारी वे व्यक्ति थे जो अगर कुछ साल और जी जाते तो शायद रामचंद्र गुहा सरीखे विद्वानों को मुसलमानों के ताज़ा हालात पर मलाल न होता. डॉक्टर अंसारी वे शख्स हैं जिन्होंने बढती उम्र को पीछे धकलने का प्रयास किया था और इसमें कुछ कामयाबी भी हासिल की थी. इस पर एक शेर से बात को अंजाम पर ले जाया जाए.

‘ये दुनिया अजब फ़ानी देखी, हर चीज़ आनी-जानी देखी,

जो आकर न जाए बुढ़ापा देखा, जो जाकर न आये जवानी देखी.’