ज़रीना बेगम, सुशीला देवी, संज़ीदा बेगम, अखिलेश कुमारी. इनमें से किसी के नाम अब से पहले तक इनके घर-परिवार और चंद जान-पहचान वालों के दायरे से बाहर नहीं निकले थे. ऐसी कोई वज़ह भी नहीं थी इनके पास कि इनके नाम सुर्ख़ियां बटोरें. ये सब आम घरेलू महिलाएं जो हैं. इनके पति स्टेट इन्फ्रास्ट्रक्चर एंड इंडस्ट्रियल डेवलेपमेंट कॉरपोरेशन ऑफ उत्तराखंड लिमिटेड (सिडकुल) में संचालित इंटरार्क कंपनी में काम करते हैं. और ये महिलाएं अदद गृहिणी की तरह घर संभालती हैं. एक-दो महीने पहले तक यह कंपनी भी इन्हें नहीं जानती थी. लेकिन अब जानने लगी है. बल्कि यूं कहें कि कंपनी के पेशेवर प्रबंधन को अब इन सीधी-सादी सी दिखने वाली घरेलू महिलाओं के हौसले और ताक़त का अहसास हो चुका है तो भी ज़्यादा ग़लत नहीं होगा. क्योंकि इन महिलाओं ने काम ही ऐसा किया है.

इन महिलाओं ने कुछ दिनों के लिए चूल्हा-चौका और अपने बच्चों तक को छोड़कर पतियों के कंधे से कंधा मिलाकर उनकी मांगों के लिए भूख हड़ताल की है. पुलिस की लाठियां खाई हैं. और अंत में कंपनी प्रबंधन को झुकने पर मज़बूर किया है. कैसे? ये जानने में किसी की भी दिलचस्पी हो सकती है. और किस्सा बताने के लिए ये महिलाएं ही सबसे उम्दा किरदार हो सकती हैं. इनमें से कईयों ने ‘सत्याग्रह’ से ख़ासतौर पर बातचीत भी की है. लिहाज़ा इन्हीं की ज़ुबानी जानते हैं कि इस पूरे वाक़ये की कहानी...

‘पता भी नहीं था आमरण अनशन कैसे होता है पर हक़ के लिए लड़ते हुए सब सीख लिया’

इंटरार्क के दो संयंत्र हैं. एक पंतनगर और दूसरा किच्छा में. पान मुहम्मद किच्छा संयंत्र की मजदूर यूनियन के अध्यक्ष हैं. ज़रीना बेगम उनकी पत्नी. वे बताती हैं, ‘लड़ना मज़बूरी थी. पति की नौकरी ही नहीं रहती तो परिवार का क्या होता? पुलिस ने पति को जेल भेज दिया था. इसलिए बेटे को भाई की देखरेख में देकर आंदोलन में शरीक़ होने आई. पहले किच्छा में बैठे. लेकिन वहां से पुलिस ने लाठीचार्ज करके खदेड़ दिया. इसके बाद सब पंतनगर ही आ गए. वहां अनशन करने वालों को हाथ उठाने को कहा गया तो सबसे पहले मैंने उठाया. मुझे देखकर अन्य महिलाओं ने भी हाथ खड़े किए. हमने 19 दिन अनशन किया. इस बीच जबरन अस्पताल ले जाकर अनशन तुड़वाने की कोशिश हुई. जब मुंह नहीं खोला तो पीटा गया. बदसलूकी की गई. धमकाया गया. लेकिन सभी एकजुट थे. इसलिए न कभी डर लगा, न कोई पीछे हटा. पहले हम में (महिलाओं) से किसी को पता भी नहीं था कि आमरण अनशन कैसे होता है. लेकिन हक़ के लिए लड़ते-लड़ते सब सीख लिया.’

ऐसी ही एक हैं अखिलेश कुमारी, जिन्होंने 18 दिन अनशन किया. वे कहती हैं, ‘जब बेटा-बेटी में भेदभाव नहीं करना चाहिए तो पति और पत्नी संकट में एक साथ खड़े क्यों न हों? हमने सोच लिया था कि जब आग में कूद ही गए तो डरना कैसा. इसीलिए आखिर तक हम साथ रहे.’ इसी तरह सुशीला देवी. इनका चार साल का बच्चा है. उसे साथ लेकर इन्होंने नौ दिन तक अनशन किया. सुशीला पढ़ी-लिखी नहीं है. लेकिन अब ये सीख चुकी हैं कि हक मांगकर न मिले तो छीनना पड़ता है. उनके मुताबिक, ‘पति पर संकट आया तो आंदोलन में आना पड़ा. उनका साथ देना हमारा फ़र्ज़ था. रही बात डर की तो वह कभी लगा नहीं क्योंकि एक तो सबका साथ था और दूसरा पुलिसवाले भी तो हमारी तरह इंसान ही हैं.’ लेकिन संज़ीदा बेगम तो यहां तक कहती हैं कि अगर ‘पुलिस हम पर गोली भी चला देती तब भी हम पीछे नहीं हटते. हमारे पास कोई और चारा भी तो नहीं था. हमें अपने पतियों के हक़ के लिए लड़ना ही था और उसे लेकर रहना था. वह हमने किया.’

खाना-पीना, ठहरना सब धरना स्थल पर, जो एक शिविर में तब्दील हो चुका था

अपने पतियों के संघर्ष में हमकदम बनने वाली महिलाओं का जज़्बा देखिए. कंपनी प्रबंधन जब अपनी ज़िद पर अड़ गया तो इन्हाेंने भी अपने इरादे से टस से मस होने से इंकार कर दिया. जहां धरना-अनशन शुरू किया था वहीं सर ढंकने के लिए पन्नियों से शिविर बना लिया. घरों से बिस्तर, बर्तन और चूल्हे वग़ैरह ले आए गए. महिलाओं के लिए शौचालय की ज़रूरत महसूस हुई तो नजदीक ही गटर का ढक्कन हटाकर टॉयलेट सीट फिट कर दी गई. उसे सब तरफ़ से ढंक दिया गया. इस तरह अनशनस्थल एक बड़े शिविर में तब्दील हो गया.

कुछ मदद आसपास से मिली. शुरू-शुरू में संयंत्र परिसर के भीतर मौज़ूद कुछ लोगों ने चोरी-छिपे मदद की. आंदोलनकारियों को पीने के पानी की आपूर्ति वहां से हुई. हालांकि आख़िरी समय में वह भी बंद कर दी गई. तबे अंतिम 10 दिनों में रुद्रपुर के गुरुद्वारे से सहायता मिली. खाना, पानी चाय सब वहां से मिलता रहा. सभी ने शुरुआत में ही एक-एक हजार रुपए चंदा जमा किया था. उससे भी कुछ ख़र्च चल रहा था. इस तरह पांच-छह सौ पुरुष और महिलाएं किसी योद्धा की तरह मैदान में तब तक डटे रहे जब तक उनकी मांगें नहीं मान ली गईं.

शुरूआत और बीच का सिलसिला तक़लीफ़देह था लेकिन अंत भला सो सब भला

करीब 700 करोड़ सालाना टर्नओवर वाली कंपनी इंटरार्क के किच्छा और पंतनगर संयंत्रों में लगभग 1,000 कुशल मजदूर स्थायी हैं. उन्हें 20,000 रुपए से ज्यादा वेतन मिलता है. इस कंपनी में मजदूर यूनियन अप्रैल-2017 में अस्तित्व में आई. जबकि कामग़ारों और प्रबंधन के बीच तनाव इस साल अगस्त से शुरू हुआ. उस वक़्त प्रबंधन ने कामग़ारों को 1,200 वेतन वृद्ध देने फ़ैसला किया था. जबकि कर्मचारी 5,000 रुपए की वेतन वृद्धि मांग रहे थे. इस मसले पर तनाव बढ़ा तो प्रबंधन ने दोनों संयंत्रों की मजदूर यूनियनों के महामंत्रियों को निलंबित कर दिया. किच्छा संयंत्र की यूनियन के अध्यक्ष पान मुहम्मद को 17 अगस्त को निलंबित किया गया. फिर 21 अगस्त को यूनियन के कोषाध्यक्ष, संयुक्त मंत्री समेत आठ मजदूरों को निलंबित कर दिया गया. आरोप लगाया गया कि ड्यूटी के दौरान ये लोग अन्य मजदूरों से चंदा जमा कर रहे थे. यहीं से तनाव ने जोर पकड़ा. संयंत्र परिसर के भीतर ही कामग़ार धरने पर बैठ गए. तीन दिन तक वहीं जमे रहे. कैंटीन की ख़ुराक़ से काम चलाया.

इसी बीच 22 अगस्त को आंदोलनकारी मजदूरों की पत्नियों ने मोर्चा खोल दिया. उनका धरना रुद्रपुर के अंबेडकर पार्क में शुरू हुआ. मामला मीडिया की सुर्ख़ियों में आया तो प्रशासन ने दख़ल दिया. लेकिन बात बनी नहीं. धरना-प्रदर्शन का सिलसिला चलता रहा. एक महीना बीत गया. इसी बीच मालूम चला कि आठ नामज़द समेत 200 प्रदर्शनकारी महिलाओं पर गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर दिया गया है. इससे महिलाएं डरने की जगह और ज्यादा निडर हो गईं. उनकी रैलियों, प्रदर्शन को अब कई सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने खुलकर समर्थन देने लगे थे. हालांकि अभी कंपनी प्रबंधन झुकने को तैयार नहीं था. बल्कि उसने सख़्ती बढ़ाते हुए कई मज़दूरों के वेतन में कटौती कर दी. इससे आंदाेलन और भड़क उठा. स्थानीय विधायकों का घेराव भी हाेने लगा. हालांकि इसी बीच उत्तराखंड में नगरीय निकायों के चुनाव के लिए आचार संहिता लागू हो गई. तीज-त्योहार भी आ गए. लिहाज़ा अक्टूबर-नवंबर की हल्की ठंडक शुरू होने के साथ आंदोलन भी कुछ ठंडा पड़ा.

अलबत्ता लौ अभी शांत नहीं हुई थी. बल्कि कामग़ाराें को जब ये पता चला कि प्रबंधन ने नवंबर के वेतन में भी कटौती कर दी है तो यह पूरे वेग से भड़क उठी. नवंबर की 22-23 तारीख़ों में लगभग 22 मज़दूरों के निलंबन ने इस लौ में घी डाल दिया. अब तो मज़दूर और उनकी पत्नियां घरों में ताला डालकर बच्चों के साथ किच्छा संयंत्र के दरवाज़े पर आ डटे. वह 24 नवंबर की तारीख़ थी. इसके चार दिन बाद यहीं से आमरण अनशन शुरू हो गया. स्थिति गंभीर हो रही थी इसलिए प्रबंधन ने पुलिस की मदद ली. पुलिस ने एक दिसंबर को किच्छा संयंत्र में डटे आंदोलनकारियों का टेंट उखाड़ फेंका. उन पर लाठियां बरसाईं. क़रीब 61 मज़दूरों और 18 महिलाओं को ग़िरफ़्तार कर लिया. दो दिसंबर को क़रीब 56 लोगों पर शांतिभंग के आरोप में चालान कर दिया गया. मज़दूर यूनियन के पांच नेताओं पर तीन-तीन मुक़दमें दर्ज़ कर उन्हें जेल भेज दिया गया. वे 11 दिसंबर को जमानत पर बाहर आ सके. इसी बीच अनशनकारियों का जबरन अनशन तुड़वाने की कोशिश भी की गई.

हालांकि ज़ोर-ज़बर्दस्ती की ये कोशिशें आंदोलनकारियों के हौसले पस्त नहीं कर पा रही थीं. अब तक आंदोलन की पूरी जुटान पंतनगर संयंत्र के सामने हो चुकी थी. इसी बीच 12 दिसंबर को जब प्रबंधन ने 28 अन्य लोगों को निलंबन नोटिस थमाया तो अगले ही दिन लगभग 400 मज़दूरों ने विपरीत हालात में संयंत्र के भीतर ही धरना शुरू कर दिया. कंपनी का उत्पादन ठप हो चुका था और प्रबंधन की कमर झुकने लगी थी. बातचीत से समाधान खोजने की कोशिशें शुरू हो गई थीं. पूर्वोत्तर रेलवे कार्मिक यूनियन अपने संबद्ध संगठन के जरिए, उत्तराखंड के श्रम मंत्री हरक सिंह रावत अपने स्तर पर और सिडकुल मजदूर संयुक्त मोर्चा अपनी कोशिशों से. सब सक्रिय हुए और हल निकला. आख़िरी तीन दिनों की कामबंदी से क़रीब 70-80 करोड़ रुपए का फटका खाने के बाद सभी बर्खास्त/निलंबित कामग़ारों की बहाली के लिए प्रबंधन राज़ी हुआ. साथ ही दो हजार रुपए वेतन वृद्धि और बीते समय में हुई वेतन कटौती वापस लेने पर भी उसने सहमति दी.

इस तरह 15 दिसंबर की रात करीब 10 बजे इंटरार्क के कामग़ारों और उनके परिजनों के चेहरे पर महीनों बाद मुस्कान लौटी, जिसमें स्त्रीशक्ति की आभा अलग से दमक रही थी.