दिसंबर 2018 में उर्जित पटेल ने अचानक भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर पद से इस्तीफा देकर सबको हैरान कर दिया था. उनका कार्यकाल खत्म होने में तब करीब एक साल बाकी था. उर्जित पटेल के इस फैसले की वजह केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता को लेकर उसके और सरकार के बीच मची खींचतान को बताया गया था.

वैसे यह पहली बार नहीं हुआ था. पहले आरबीआई गवर्नर ऑस्बॉर्न एर्कल स्मिथ के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था. या कहें कि इससे भी बुरा हुआ था तो ग़लत नहीं होगा. आइये, देखें कब हुआ? कैसे हुआ? कौन-कौन किरदार थे? क्या माजरा था? और क्या अंजाम हुआ?

यह पूरी दास्तां आज़ादी के पहले की है जब ब्रिटिश सरकार के भारत में कुछ अंतिम साल रह गए थे. आरबीआई अस्तित्व में नहीं आया था. तब इंपीयिरल बैंक था. 1926 में बैंक ऑफ़ इंग्लैंड के तत्कालीन गवर्नर मॉन्टेग्यू नॉर्मन को आस्ट्रेलियाई ऑस्बॉर्न स्मिथ को भारत के केंद्रीय बैंक का गवर्नर नियुक्त करने का विचार आया था. स्मिथ ने लगभग 20 सालों तक ऑस्ट्रेलिया के सबसे बड़े ट्रेडिंग बैंक, बैंक ऑफ़ न्यू साउथ वेल्स की कमान संभाली थी. बाद में वे कॉमनवेल्थ बैंक ऑफ़ ऑस्ट्रेलिया की लंदन ब्रांच के मैनेजर बनाए गए. 1926 में वे इंपीयरियल बैंक के मैनेजिंग गवर्नर बने और वैश्विक मंदी (1929-1939) में बैंक को डूबने से बचाया.

नॉर्मन का विचार था कि भारतीय रिज़र्व बैंक देश के आर्थिक ढ़ांचे की देखभाल का सर्वेसर्वा तो हो, पर वह बैंक ऑफ़ इंग्लैंड के समकक्ष न खड़ा हो सके. उसमें भारतीयों का वर्चस्व तो हो पर कमान कोई विदेशी संभाले. 1927 और 1928 में इंग्लैंड की संसद में आरबीआई बिल पारित नहीं हो सका और ऑस्बॉर्न स्मिथ को अप्रैल 1935 तक, यानी आरबीआई के अस्तित्व में आने तक, इंतज़ार करना पड़ा. उनकी नियुक्ति को हाथों-हाथ लिया गया पर महज़ डेढ़ साल बाद अक्टूबर 1936 में उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया और जून 1937 में वे कार्यमुक्त हो गए.

किरदार कौन-कौन?

यूं तो इस क़िस्से का पूरा ज़िक्र कहीं नहीं मिलता पर दादाभाई बख्तावर ने ‘बरोंस ऑफ़ बैंकिंग’ में तफ़सील से इस बारे में लिखा है. यहां दो नाम उभर कर आते हैं. एक जेम्स ग्रिग जो उस वक़्त फाइनेंस मेंबर थे और दूसरे जेम्स ब्रैड टेलर जो बाद में आरबीआई के डिप्टी गवर्नर बने. ये दोनों ही ब्रिटिश आईसीएस अधिकारी थे. ऑस्बॉर्न स्मिथ भारत की आज़ादी के पैरोकार थे. उन्हें मशहूर अर्थशास्त्री एडी श्रॉफ़ और पुरषोत्तमदास ठाकुरदास, जो कपास के व्यापारी और आरबीआई में निदेशक थे, का साथ मिला हुआ था.

माजरा क्या था?

देखा जाए तो यह केंद्रीय बैंक और कार्यपालिका का टकराव था. स्मिथ बैंक की स्वायत्तता कायम करना चाहते थे और कार्यपालिका इसे अपने कब्ज़े में रखना चाहती थी. जब बैंक की स्थापना हो रही थी तो सरकार ने मन यही बनाया था कि पहला गवर्नर सरकारी अधिकारी न हो जिससे बैंक की बुनियाद में स्वायत्तता भरी जा सके. पर इसके बीच काफ़ी तूफ़ान उठे, जिनकी वजह से मामला बगड़ गया.

ऑस्बॉर्न स्मिथ जब वैश्विक मंदी के दौरान इंपीरियल बैंक के मैनेजिंग गवर्नर थे तभी से ग्रिग- टेलर की जोड़ी से उनका टकराव शुरू हो गया था. यह जोड़ी चाहती थी कि सरकार को रिज़र्व बैंक के शेयरों पर 3.5 फीसदी का रिटर्न यानी आमदनी मिले जबकि स्मिथ तीन फीसदी देना चाहते थे. आपको बता दें कि शुरुआत में रिज़र्व बैंक को पांच करोड़ की नकद राशि से शुरू किया गया था. इसमें मात्र दो लाख बीस हज़ार रुपये सरकार की तरफ से थे. यह पूरी तरह से एक निजी बैंक था पर इस पर नियंत्रण बैंक ऑफ़ इंग्लैंड का था. पर स्मिथ अपने कार्य में न लंदन और न ही ब्रिटिश इंडियन गवर्नमेंट का दखल चाहते थे. आखिर वे इसी तरह काम करने के आदी थे.

फ़साद की दूसरी जड़ें क्या थीं?

दो और मुख्य वजहें थीं-पौंड-रुपये के बीच अनुपात और बैंक ब्याज दर. पहले मुद्दे पर ग्रिग का मानना था कि स्मिथ पौंड के मुकाबले रुपये के अवमूल्यन के पक्ष में हैं जिससे हिंदुस्तानी व्यापारियों को फ़ायदा हो. इसके अलावा स्मिथ चाहते थे कि ब्याज दर 3.5 से घटाकर तीन फीसदी कर दी जाए जिससे भारतीय व्यापारियों को कर्ज़ लेने में सहूलियत हो. ग्रिग यथास्थिति बरक़रार रखना चाहते थे. स्मिथ ने उनकी न सुनी और ब्याज दर घटाकर तीन फीसदी कर दी. यकीनन, इससे भारतीय व्यापारियों को फ़ायदा हुआ.

स्मिथ की वित्तीय गड़बड़ियां

दूसरी तरफ, दबी-ढकी ज़ुबान में ऑस्बॉर्न स्मिथ की वित्तीय गड़बड़ियों की बात हो रही थी. कहा जा रहा था कि स्मिथ कुछ भारतीय व्यापारियों की मदद कर रहे हैं. दादाभाई लिखते हैं कि इस बात के पीछे सबसे बड़ा सुबूत था कलकत्ता की सेंट्रल इंटेलिजेंस ब्यूरो की एक रिपोर्ट जिसमें आरबीआई के शेयरों में बार-बार हो रही उठापटक का ज़िक्र था. इससे यह अफ़वाह उड़ी कि स्मिथ भारतीय व्यापारी बद्रीदास गोयनका और मांगीराम बांगड़ को बैंक की अंदरूनी जानकारी देकर उन्हें फ़ायदा पहुंचा रहे हैं. इसे वित्तीय भाषा में ‘इनसाइडर ट्रेडिंग’ कहते हैं.

जांच एजेंसी ने बैंक के पूर्वी स्थानीय बोर्ड के दो डायरेक्टरों को तलब किया. उन्होंने बताया कि यह कोई असंभव बात नहीं है. एक डायरेक्टर अमर कृष्ण घोष ने स्वीकारा कि स्मिथ ने मांगीराम बांगड़ और एक निजी फ़र्म से कुछ पैसे कमाए हैं.

वह ‘कौन’ थी?

एक आरबीआई अफ़सर की पत्नी के साथ ऑस्बॉर्न स्मिथ के अनैतिक संबंधों का भी हवाला दिया जा रहा था. उस महिला का नाम था आरएबी एलन. बताते हैं कि ग्रिग-टेलर से टकराव के दौरान स्मिथ ने एलन से कहा कि टेलर ग्रिग के साथ मिलकर बैंक चलाने के कोशिश कर रहे हैं. स्मिथ ने कभी अपने रिश्ते को नहीं छिपाया, पर इसने बैंक में अफवाहों का बाज़ार गर्म कर रखा था. उनके डिप्टी सिकंदर हयात ख़ान ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जब स्मिथ उनके और टेलर के बीच मतभेद की बात एलन से कर रहे थे तो एक स्टॉक ब्रोकर ने सब सुन लिया और फिर यह बात जंगल की आग के माफ़िक फैल गयी. दादाभाई लिखते हैं कि ग्रिग ने अपने स्तर से नीचे गिरते हुए स्मिथ और एलन की फ़ोन टैपिंग भी की थी. हालांकि, उसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं था.

स्मिथ की ‘फ़ाइल तैयार’ होने लगी

सरकारी भाषा में ‘फ़ाइल तैयार’ करने का मतलब कार्यवाही को अंजाम देना होता है. सबसे पहली आपत्ति दर्ज़ हुई कि स्मिथ तुनुकमिज़ाजी हैं और सरकारी आदेशों की अनदेखी करते हैं. उनकी शराबनोशी का भी ज़िक्र किया गया. भारतीय व्यापारियों को फ़ायदा पंहुचाने की बात भी की गयी और हल्के स्तर पर उस रिश्ते का भी ज़िक्र किया गया.

आरबीआई के पहले भारतीय गवर्नर चिंतामन द्वारकानाथ देशमुख का मानना था कि मिज़ाज के अलावा टकराव बैंक की दरों को लेकर हुआ था. स्मिथ सोने पर कर (कस्टम ड्यूटी) बढ़ाकर उसका निर्यात रोकना चाहते थे. दादाभाई बख्तावर का मानना है कि चूंकि देशमुख टेलर के चहेते आईसीएस अधिकारी थे तो संभव है जो उन्होंने कहा वह टेलर का ख़्याल हो. उनके मुताबिक़ स्मिथ पर नॉर्मन का वरदहस्त था जबकि ब्रिटिश ग्रिग-टेलर की जोड़ी उस ऑस्ट्रेलियाई (इंग्लैंड का उपनिवेश राज्य) बैंक अधिकारी के यूं सिर उठाने को नहीं पचा पा रही थी जिसके दिल में भारतीय राष्ट्रवाद के समर्थकों के प्रति रहमदिली थी.

ग्रिग को बैंक के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स में हिंदू व्यापारियों का आधिपत्य भी खल रहा था. इसलिए ग्रिग ने टेलर और सिकंदर हयात ख़ान को डिप्टी गवर्नर नियुक्त किया. इन नियुक्तियों के बारे में स्मिथ की कोई राय नहीं ली गयी थी. सिकंदर ख़ान को बैंकिंग का कोई तजुर्बा नहीं था.

ग्रिग और टेलर दांत-काटी रोटी थे. आईसीएस की परीक्षा में ग्रिग का पहला और टेलर का दूसरा स्थान आया था. सो, टेलर स्मिथ को भरोसे में लिए बिना ही फाइनेंस मेंबर ग्रिग से आदेश प्राप्त करने लग गए. इस वजह से स्मिथ और टेलर के रिश्ते इतने ख़राब हो गए कि दोनों एक दूसरे से कन्नी काटने लगे. इस सबसे परेशान होकर 1935 में स्मिथ छह महीने की छुट्टी लेकर इंग्लैंड चले गए. जब वापस आये तो तो टेलर छह महीने के लिए लंदन रवाना हो गए. अब जब टेलर हिंदुस्तान आए तो स्मिथ फिर इंग्लैंड चले गए. बस, इसी दौरान टेलर और ग्रिग ने मिलकर स्मिथ की हमेशा के लिए रवानगी की स्क्रिप्ट तैयार कर ली.

वायसराय को बीच-बचाव के लिए आना पड़ा

ग्रिग-टेलर ने तत्कालीन वाइसराय लिनलिथगो को चिठ्ठी लिखकर हालात से रूबरू कराया और स्मिथ को लंदन में ही रोकने की मांग की. आरबीआई गवर्नर को यूं हटाने से सरकार की किरकिरी हो जाती. लिहाज़ा, तय हुआ कि उन्हें भारत आने दिया जाए, यहां आकर वे ख़ुद अपना इस्तीफ़ा पेश करें और सरकार नया गवर्नर नियुक्त करे.

बैंक ऑफ़ इंग्लैंड के गवर्नर नॉर्मन को इन सब बातों की जानकारी दी गयी. उन्होंने भी स्मिथ को ‘सेफ़ पैसेज’ की बात कही. आख़िरकार, यही तय किया गया. स्मिथ हिंदुस्तान आए, ‘निजी कारणों’ के चलते इस्तीफ़ा दिया और सरकार ने उनकी सेवाओं की तारीफ़ करते हुए उन्हें उत्तराधिकारी चुने जाने तक पद पर बने रहने के लिए कहा. जैसा स्क्रिप्ट में लिखा था, ग्रिग ने अपने दोस्त और डिप्टी गवर्नर जेम्स टेलर का नाम सुझाया जिसका सभी ने अनुमोदन किया. उधर ऑस्बॉर्न स्मिथ को उनकी शानदार सेवाओं के चलते कई उपाधियों से नवाज़ा गया और एक दिन वे एलन को लेकर लंदन चल दिए.