सबसे ज्यादा गायों वाले उत्तर प्रदेश में गाय इन दिनों सामाजिक और सांप्रदायिक सद्भाव के ताने-बाने को तोड़ने की एक बड़ी वजह बनती जा रही है. योगी सरकार के आने के बाद से गाय को लेकर जो राजनीतिक संवेदनशीलता अचानक बढ़ गई थी वह अब नए-नए सवाल पैदा करने लगी है और नए-नए विवाद भी.

हाल में बुलंदशहर में गोकशी की खबर के बाद हुई हिंसा में एक इंस्पेक्टर की हत्या हो गई. इसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक उच्चस्तरीय बैठक बुलाई थी. इस बैठक के बाद जारी प्रेस नोट में गोकशी में शामिल सभी लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की बात तो कही गई थी लेकिन दंगाइयों के हाथों मारे गए इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या पर इसमें एक शब्द भी नहीं था. सरकार के इस रुख पर आये नसीरुद्दीन शाह के बयान पर भारत से लेकर पाकिस्तान तक राजनीति के तरह-तरह के हथकंडे अपनाये गए. समाज में कटुता पैदा करने की हरसंभव कोशिश की गई. नसीर को भारत छोड़ पाकिस्तान चले जाने की सलाह दी गई. उधर, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने अल्पसंख्यकों के प्रति रवैये को लेकर भारत को घेरने की कोशिश की. इस शोरगुल के बीच गाय को लेकर प्रकट की गई इलाहाबाद हाई कोर्ट की गंभीर चिंता कहीं दब सी गई.

पिछले दिनों गोकशी के एक मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गंभीर चिंता जताते हुए कहा था कि प्रदेश में मांस के कारोबार से नफरत फैल रही है. अदालत की लखनऊ खंडपीठ का कहना था कि यह कारोबार धार्मिक भावनाओं से जुड़कर शाकाहारी और मांसाहारियों के बीच लगातार नफरत की वजह बन रहा है और सरकार को इस मामले पर कारगर नीति बनानी चाहिए. हाई कोर्ट की एकल पीठ के जस्टिस अताउर रहमान ने यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार ने अप्रैल, 2016 में गायों के संरक्षण के लिए जो नोटिफिकेशन जारी किया उसमें उसे दिमाग का उपयोग करना चाहिए था. जस्टिस रहमान के मुताबिक हालांकि अब भी देर नहीं हुई है और सरकार को तुरंत कदम उठाते हुए नागरिकों के मूल अधिकारों का संरक्षण करने के प्रयास करने चाहिए.

हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी हरदोई के विमल शुक्ला नाम के एक व्यक्ति द्वारा जमानत के लिए दायर याचिका पर फैसला देते हुए की. विमल शुक्ला पर 2018 में गोकशी के एक मामले में यूपी गैंगस्टर एक्ट के तहत केस दर्ज हुआ था. इसमें कहा गया था कि वह एक ऐसे गैंग का सदस्य है जो प्रतिबंध के बावजूद गाय के मांस और उसकी खाल के अवैध कारोबार में लिप्त है. इस मामले में गिरफ्तारी के बाद शुक्ला ने जमानत के लिए आवेदन किया तो नवंबर में उसे जमानत मिल गई. लेकिन जेल से रिहाई से पहले ही राज्य सरकार ने उसके खिलाफ गोहत्या के एक अन्य मामले में गैंगस्टर एक्ट लगा दिया. अब हाई कोर्ट ने पूरे मामले की सुनवाई के बाद शुक्ला को सशर्त जमानत दे दी है.

हाई कोर्ट ने विमल शुक्ला के जमानत के आदेश के साथ ही सरकार को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है. उसने राज्य सरकार को गोहत्या अधिनियम की धारा सात के तहत क्षेत्रीय निकायों को आर्थिक सहायता देने की राय भी दी है ताकि गौवंश के मवेशियों के प्रबंध में सुधार लाया जा सके और दंड के बजाय सुधार के जरिए मवेशियों को सुरक्षा दी जा सके. अदालत ने राज्य सरकार से सभी स्थानीय निकायों के साथ-साथ नगर और ग्राम पंचायतों तक में वधशालाओं और मवेशियों के प्रबंधन के इंतजाम करने को भी कहा है. अदालत ने प्रति एक हजार की आबादी पर एक गोशाला बनवाने का भी सुझाव सरकार को दिया. उसने कहा कि इनमें स्थानीय नागरिक गायों को गोद लेकर उनकी देखभाल करें ताकि स्थानीय निकायों पर किसी तरह का वित्तीय बोझ न पड़े.

लगता है राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के इन निर्देशों को इस बार थोड़ी गंभीरता से लिया है क्योंकि अदालत की कड़ी टिप्पणी के बाद एक सप्ताह से पहले ही उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने कैबिनेट बैठक के जरिए छुट्टा पशुओं की समस्या के निराकरण के लिए 250 करोड़ से अधिक की धनराशि देने की घोषणा कर दी है. इस रकम में से प्रदेश के सभी 16 नगर निकायों को 10-10 करोड़ और प्रत्येक जिले को एक करोड़ 20 लाख रुपये की धनराशि मिलेगी. खुद मुख्यमंत्री ने राज्य की जिला पंचायतों को पहले से मौजूद 750 कांजी हाउसों की मरम्मत के अलावा उनका प्रबंधन ठीक कराने और गांवों की गोचर भूमि से अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए हैं. उम्मीद की जानी चाहिए कि योगी सरकार की यह पहल महज कागजी ही नहीं रहेगी और जमीन में भी कुछ काम होता दिखाई देगा.

शायद बुलंदशहर कांड और उसके बाद तीन राज्यों में सत्ता से बाहर होने के बाद भाजपा और उत्तर प्रदेश सरकार गोप्रेम की गंभीरता को जमीनी धरातल पर समझने के लिए मजबूर हुई है. उत्तर प्रदेश में गोहत्या पर ‘गोवध निवारण अधिनियम 1955’ के तहत प्रतिबंध लागू थे, लेकिन हाल के कुछ वर्षों में यहां गोवंश के मवेशियों की खरीद-फरोख्त और तस्करी का गैरकानूनी धंधा 10 हजार करोड़ से भी अधिक का हो चुका है. योगी सरकार के आने के बाद मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ ने जो तेवर दिखाए थे उसके बाद ऐसा लगने लगा था कि यह स्थिति बदलेगी. लेकिन योगी सरकार के अव्यवहारिक और कड़े रुख के कारण स्थितियां और भी बिगड़ती चली गईं. नौबत यहां तक आ गई कि राजनीतिक आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच हाई कोर्ट तक को टिप्पणी करनी पड़ गई कि ‘अब समय आ गया है कि कोर्ट राज्य सरकार से गाय के संरक्षण और प्रबंधन के लिए नीति बनाने को कहे. किसी भी तरह का कानून बनाकर दंड देने से पहले राज्य सरकार को अपनी नीति बदलनी चाहिए.’’

लगभग एक वर्ष पूर्व सातवें राज्य विधि आयोग ने भी 1955 में बने गोवध निवारण अधिनियम में संशोधन का सुझाव योगी सरकार को दिया था. न्यायमूर्ति आदित्यनाथ मित्तल की अध्यक्षता में गठित आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि 1955 के अधिनियम में कई विसंगतियां हैं जिनके कारण गोवध पर प्रभावी रोक नहीं लग पा रही है. विधि आयोग ने अपनी तीसरी रिपोर्ट में गोहत्या व गौवंश से जुड़े अपराधों को चार श्रेणियों में बांटा था. आयोग की रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय सुझाव मांस की बरामदगी को लेकर था. इसमें कहा गया था कि यदि कहीं मांस बरामद होता है तो उसकी पूरी जांच किए बिना किसी व्यक्ति को गिरफ्तार न किया जाए. यह भी कि सिर्फ शक के आधार पर किसी की गिरफ्तारी न की जाए. आयोग ने गोवंश से जुड़े अपराधों पर दो से 10 वर्ष तक की सजा और दो लाख तक जुर्माने का भी सुझाव दिया था.

लेकिन राज्य सरकार ने इन सुझावों पर विचार तक नहीं किया. राज्य में मांस परीक्षण के लिए नई प्रयोगशालाएं खोलने के मामले में भी कुछ नहीं हुआ. इसके उलट राज्य के पुलिस मुखिया की ओर से गोहत्या के आरोपियों पर रासुका लगाने, गो तस्करों पर एनएसए और एंटी सोशल एक्टिविटी कानून का इस्तेमाल करने जैसे आदेश जारी कर दिए गए जिससे स्थितियां और खराब हो गईं.

इस दौरान राज्य में छुट्टा पशुओं की, जिनमें गौवंश के मवेशियों की अधिकता है, समस्या लगातार विकराल होती गई है. इन पशुओं की समस्या को इस बात से ही समझा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में इन दिनों किसानों की मुश्किलों को लेकर जो भी धरने-प्रदर्शन आदि हो रहे हैं उनमें छुट्टा पशुओं से छुटकारे की मांग अनिवार्य रूप से शामिल होती है. अब तो लोगों द्वारा इन पशुओं को सरकारी इमारतों में बंद करने की खबरें भी आ रही हैं.

गोवंश संरक्षण से जुड़े प्रश्न पर अगर हाई कोर्ट को चिंतित होना पड़ रहा है तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि यह समस्या कितनी बड़ी है. अगर राज्य सरकार इस मसले पर अब भी ठोस कुछ नहीं करती है यह मामला उत्तर प्रदेश सरकार के लिए एक बड़ा नासूर बन सकता है.