निर्देशक : रोहित शेट्टी

लेखक : यूनुस सजावल, साजिद-फरहाद

कलाकार : रणवीर सिंह, सारा अली खान, सोनू सूद, आशुतोष राणा, अश्विनी कलसेकर, अजय देवगन

रेटिंग : 2 / 5

रोहित शेट्टी ने ‘सिंबा’ में ज्यादातर चीजें ‘रीक्रिएट’ की हैं. न सिर्फ ‘आंख मारे’ और नुसरत साहब का ‘तेरे बिन नहीं लगता दिल मेरा ढोलना’ नामक गीत, बल्कि फिल्म भी 2015 की तेलुगु फिल्म ‘टेंपर’ की ज्यादातर कहानी व मुख्य दृश्यों को रीक्रिएट करके कही और बनाई गई है.

‘टेंपर’ के ज्यादातर मुख्य दृश्य और एक्शन-सीन लेकर पटकथा में थोड़ा बहुत हेरफेर भर किया गया है और फिल्म का अंतिम हिस्सा पूरा बदला है. एक्शन डिजाइन करने का क्रेडिट खुद निर्देशक रोहित शेट्टी ने भले लिया हो, लेकिन ‘सिंबा’ में एक तो कारें बेहद कम हवा में उछलती हैं (!) और दूसरे बाकी कई मुख्य एक्शन-सीन की ‘डिजाइन’ टेंपर से ही ली गए है.

हीरो के एंट्री वाले सीन तक में – जो कि वाकई मजेदार है –‘टेंपर’ का ही सीन इस कदर नकल किया गया है कि हीरो द्वारा एक गीले कपड़े से भागते हुए गुंडे को रोकते वक्त, कपड़े का रंग तक लाल रखा गया है और एक-सीन वाले इस गुंडे को ‘टेंपर’ की ही तरह टकला दिखाया गया है! हाथ से होल्डर में रखी गन को थपथपाने से लेकर पुलिस स्टेशन में गुंडों की कुटाई करने जैसी तकरीबन सभी प्रमुख घटनाएं ‘टेंपर’ (Temper) को टैंपर (Tamper) यानी छेड़छाड़ करके ही रची गई हैं.

इसलिए, मौलिकता से दूर होकर ‘सिंबा’ एक छोटे कद की फिल्म है जिसमें केवल रणवीर सिंह ओरिजनल हैं. केवल वे ही रेप-रिवेंज जॉनर के इस लाउड बॉलीवुडीय संस्करण को रोचक और दर्शनीय बनाते हैं. लेकिन, जितना बना सकते थे केवल उतना ही.

‘सिंबा’ के इंटरवल से पहले वाले हिस्से में रणवीर सिंह कहर ढा देते हैं. यह वो हिस्सा है जब सिंबा नाम के नायक को एक भ्रष्ट पुलिस अफसर के तौर पर स्थापित किया जाता है और तमाम कलाकारों को धीरे-धीरे स्थापित करते हुए सिंबा से उनके इंटरेक्शन और फ्रिक्शन दिखाए जाते हैं. वैक्स लगी हुई चमकदार मूंछों के साथ खीसें निपोरते हुए रणवीर सिंह गजब की मौलिकता इस सिंबा नामक मराठी-हिंदी भाषी किरदार में भरते हैं, और लगता है कि जैसे वे ‘गोविंदा’ नाम की कोई भांग की गोलियां गटककर एक्टिंग कर रहे हों!

रोहित शेट्टी की एक खासियत है कि वे कितनी भी नकली लगती फिल्म क्यों न बनाएं, लेकिन मुंबई-गोवा के परिवेश के हिसाब से मराठी का उपयोग संवादों में जहीन करते हैं. ‘सिंबा’ में भी उन्होंने जमकर मराठी संवादों का उपयोग किया है और उन्हें तरल अंदाज में हिंदी से मिलाकर बोलते वक्त रणवीर सिंह निहायत कुशल लगते हैं. हालांकि इससे यह भी हुआ है कि ‘बाजीराव मस्तानी’ के अपने मराठी लहजे वाले किरदार की भी वे याद दिलाते हैं, फिर भी उनकी शानदार परफॉर्मेंस में कोई गलत सुर पकड़ना मुश्किल नजर आता है.

वजह इसकी शायद यह है कि वे सिंबा के किरदार को रणवीर सिंह बनकर ही प्ले करते हैं! जैसे खिलंदड़, मजाकिया, ऊर्जा से लबालब भरे अति नाटकीय रणवीर सिंह हमें ‘ऑफ-स्क्रीन’ वीडियो साक्षात्कारों से लेकर बिग बॉस और कपिल शर्मा के शो पर नजर आते रहे हैं, ठीक वैसे ही चाल-चलन व व्यवहार से इस बार वे अपने ‘ऑन-स्क्रीन’ किरदार को सजाते हैं. गौर किया जाए तो यह बड़ी दिलचस्प बात है, क्योंकि इससे समझ आता है कि यह समझना वाकई बहुत मुश्किल है कि एक्टर लोग आखिर कब अभिनय नहीं कर रहे होते हैं!

‘सिंबा’ का दूसरा हिस्सा भ्रष्ट सिंबा के अंदर के ईमानदार अफसर के जागने व खलनायकों से बदला लेने के बारे में है. यह तब होता है जब उसकी मुंहबोली बहन का बलात्कार होता है और भ्रष्ट नायक का हृदय-परिवर्तन होता है. यहां आकर फिल्म ठीक वैसी हो जाती है जैसे कि 80-90 के दशक के मेलोड्रामा ग्रसित रेप-रिवेंज सिनेमा में बहन के बलात्कार का भाई द्वारा बदला लिए जाने वाली तमाम मसाला बॉलीवुड फिल्में हो जाया करती थीं.

इंटरवल के बाद ‘सिंबा’ अपने खिलंदड़ नायक को अथाह गंभीर कर देती है और आधी हल्की-फुल्की कॉमेडी होने के बाद सीधे बलात्कार जैसे गंभीर विषय का लबादा ओढ़ सोशल ड्रामा का रूप ले लेती है.

यह ‘टोनल शिफ्ट’ लेते ही फिल्म का संतुलन बिगड़ जाता है. क्योंकि रेप-रिवेंज पर दर्शनीय थ्रिलर गढ़ने की जगह ‘सिंबा’ इस वीभत्स बुराई से लड़ने के ऐसे तरीके सुझाने लगती है कि लगता है कि हम लोकतंत्र मानने वाले हिंदुस्तान में नहीं बल्कि मॉब जस्टिस की मानसिकता वाले सऊदी पहुंच चुके हैं.

बड़ी-बड़ी फिल्में बनाने वाले हमारे निर्देशकों के साथ यह एक बड़ी दिक्कत है कि वे पलायनवादी फिल्में बनाते-बनाते गंभीर सामाजिक समस्याओं के पलायनवादी उपाय भी देने लग जाते हैं. और, लगता है कि गंभीर न्यूज देखने के नाम पर वे केवल अर्णब गोस्वामी का ही उग्रता की आग बरसाता शो देखते हैं!

‘सिंबा’ बलात्कार पर निर्भया त्रासदी का उदाहरण लेते हुए कहती है कि बलात्कार करने वालों का सीधे एनकाउंटर होना चाहिए और किसी भी तरह के जस्टिस सिस्टम की हमें आवश्यकता नहीं है. यह बात प्रूव करने के लिए फिल्म का नायक पांच-छह महिलाओं को इकट्ठा करता है और निर्देशक साहब सभी से यह कहलवा देते हैं कि इस खौफनाक कृत्य की सजा मॉब जस्टिस ही है. फिर फिल्म अपनी इस ‘गलत पॉलिटिक्स’ को इंटरवल के बाद वाले हिस्से में लंबे वक्त तक दिखाती है और एकदम लाउड होकर बिना किसी समझदारी के दिखाती है. इंटरवल के बाद वाले इस हिस्से की वजह से ही कद के अलावा ‘सिंबा’ की समझ भी छोटी हो जाती है. पुराने किए-कराए पर भी काफी हद तक पानी फिर जाता है.

रणवीर सिंह इन हिस्सों में भी बेहद मजबूत काम करते हैं और अजय देवगन तक को अपने सामने फीका साबित कर देते हैं. उनकी ही वजह से आप ‘सिंबा’ से आखिर तक जुड़े रहते हैं जबकि ऐसा होना रोहित शेट्टी की फिल्मों में अमूमन मुमकिन नहीं होता. वहीं सारा अली खान को फिल्म जाया करती है और कुछ गानों में याद करने के अलावा फिल्म के शुरुआती घंटे में ही उन्हें थोड़े-बहुत जरूरी सीन देकर भूल जाती है.

‘सिंबा’ में यह भी हास्यास्पद है कि वो सारा अली खान जैसी मुख्य अभिनेत्री के होने के बावजूद बलात्कार जैसे कृत्य का बदला लेने के लिए गैरकानूनी तरीके अख्तियार करते वक्त भी अपनी मुख्य महिला-पात्र का कोई खास उपयोग नहीं करती. घोर नायक-प्रधान रहकर जता देती है कि वो अभी भी उन नहीं बदलने को तैयार फिल्मों में से ही एक है जो कि महिला-प्रधान विषयों में महिलाओं को केंद्र में लाने में हिचकिचाती हैं.

फिल्म में सिंघम के रोल में अजय देवगन मौजूद हैं और उनके होने से दो बातें याद आती हैं. एक तो उनकी ही शानदार फिल्म ‘गंगाजल’, जिसमें ‘सिंबा’ की ही तरह पुलिस वाले कुछ गैरकानूनी तरीकों से जस्टिस हासिल करते हैं और फिर फिल्म उसके परिणामों की पड़ताल करती है. रोहित शेट्टी को ‘सिंबा’ बनाने से पहले ‘गंगाजल’ देख लेनी चाहिए थी.

दूसरी बात रोहित शेट्टी के बारे में कौंधती है और याद आता है कि उनकी आत्ममुग्धता की हमें अलग से दाद देनी चाहिए! जिस तरह वे अपनी फिल्मों में अपनी ही पुरानी पलायनवादी मसाला फिल्मों को याद करते हैं, उन्हें ट्रिब्यूट देते हैं, वैसा करने में तो क्रिस्टोफर नोलन जैसे महान निर्देशक को भी संकोच हो जाए! ‘आंख मारे’ गीत में गोलमाल की टीम का आना, बाकी की कहानी में सिंघम का वॉयस-ओवर, साक्षात कार लेकर सिंघम का कांच की दीवार तोड़ना, सिंबा का सिंघम जैसे ही कपड़े और चश्मे पहनना...टू मच आत्ममुग्धता जनाब! टू मच!