इस पुस्तक के अध्याय ‘मगध की शांति’ का एक अंश -

‘मेरे गांवों की सड़क जो अधपकी बीच में ही बनकर रह गई थी, वह पिछले 20 सालों से वैसी ही है. बिजली कभी-कभी अतिथि-सा आ जाती है. प्राथमिक स्कूल में मास्टर साहब बच्चों को हांकते रहते हैं. इन्हें देखकर नागार्जुन के ‘दुःखरन मास्टर’ की याद ताजा हो जाती है...पूरे इलाक़े के लिए एक खस्ताहाल अस्पताल है, जिसमें किसी गर्भवती महिला या मरीज के लिए खून देने की भी व्यवस्था नहीं है...

बिहार में जब तक शिक्षा और स्वास्थ्य की व्यवस्था नहीं सुधरेगी तब तक विकास की कोई भी बात बेमानी है. लेकिन जैसा कि ‘मगध’ कविता-संग्रह की एक कविता में श्रीकांत वर्मा ने लिखा है : कोई छींकता तक नहीं/इस डर से/कि मगध की शांति भंग ना हो जाए/मगध को बनाए रखना है, तो/मगध में शांति रहनी ही चाहिए.

ऐसा लगता है चुनावी महापर्व में वर्षों बाद बिहार में आई शांति को मीडिया अपने सवालों से भंग नहीं करना चाहता.’


पुस्तक : बेखुदी में खोया शहर

लेखक : अरविंद दास

प्रकाशक : अनुज्ञा बुक्स प्रकाशन

कीमत : 375 रुपए


हममें से हर एक व्यक्ति एक साथ कई स्तरों पर जीता है. एक स्थाई और बाहरी जीवन है जिसका तरीका, व्यस्तता, जिम्मेदारियां, जोखिम और तनाव सभी कुछ पूर्व-निर्धारित तरीके से आगे बढ़ता रहता है. दिल, दिमाग, देह, सभी के सहयोग और परस्पर संयोजन से काम होता जाता है. लेकिन साथ ही एक ऐसा भीतरी जीवन भी होता है जो सिर्फ दिल और दिमाग के स्तर पर अनवरत चलता जाता है. जिसे कोई देखता नहीं. जो तमाम व्यस्तताओं और जिम्मेदारियों के बीच जब-तब, घड़ी-घड़ी हमारे जेहन में सिर्फ भावना के स्तर पर जीया जाता है.

हर एक व्यक्ति इस अदृश्य, अनियोजित जीवन को टुकड़ों में जीता है, लेकिन उसकी कहीं शिनाख्त नहीं होती. अरविंद दास की यह किताब दिमाग में अनवरत आने वाले ऐसे ही असंख्य ख्यालों में से कुछ को दर्ज करती है. किताब के नोट्सनुमा लेख पाठकों को अपने साथ मिथिला के गांवों से लेकर, देश के कई बड़े महानगरों से होते हुए लंदन, पेरिस, वियना और शंघाई तक के सफर पर ले जाते हैं.

अपने सभी लेखों में अरविन्द कवियों, लेखकों, चित्रकारों, संस्कृतिकर्मियों, लोक-कलाकारों को जब-तब शिद्दत से याद करते हैं. इस कारण इन नोट्स में देसीपन का स्वाद है. यहां अपनी जड़ों से जुड़ाव है और उन मजबूत जड़ों का हिस्सा होने का गौरव भी है. लेखक की भाषा और लहजा कहीं एक पत्रकार वाला है तो कहीं साहित्यिक भी हो जाता है. फ्रांस की सेन नदी के तट पर केदारनाथ अग्रवाल की कविता की एक पंक्ति को याद करते हुए लेखक रूमानी होकर लिखता है -

‘नदी एक नौजवान ढीठ लड़की है’...केदारनाथ अग्रवाल ने ऐसा लिखा है. शायद केन नदी के बारे में. यदि वे केन के बारे में ऐसा नहीं लिखते, तो मैं सेन के बारे में यह कहता...सेन ढीठ है. वह आपका रास्ता नहीं छोड़ती.

वह आपसे लिपटना चाहती है. लिपटती है. वह आपको चूमना चाहती है. चूमती है. आप उसके कोमल और नरम हाथों की गरमाहट महसूस करते हैं.

कल-कल करती हुई वह बात-बेबात हंसती है. और जब आप उससे नाराज़ होने का अभिनय करते हैं, वह और हंसती चली जाती है.’

गांव की जड़ों से जुड़े जितने भी लोग महानगरों में रहते हैं, एक स्तर पर उनकी पीड़ा मिलती है. वे सभी लोग अपने मां-बाप के जीवित रहने तक उनके पास गांव में लंबे समय तक न रह सकने और शहर में उन्हें अपने पास न रख पाने की टीस से गुजरते हैं. यह टीस ज्यादातर शहरी बच्चों के दिलों में अक्सर ही हूक बनकर उठती है. ऐसी बहुत सी चीजें हैं जो तरक्की की रेस में पीछे छूट गए अपने माता-पिता के साथ हम देर तक, टिककर, ठहरकर करना चाहते हैं. लेकिन जिंदगी की आपाधापी उन चीजों को शिद्दत से करने का मौका बहुत कम देती है. थोड़े से समय में ज्यादा से ज्यादा जी लेने की भूख के ऐसे ही कुछ भावुक पलों को बांटते हुए लेखक कहता है -

‘क्या खाना है, कहां जाना है, किस-किस से मिलना है कि सूची में यह भी लिखके आया था कि पापा से बहस नहीं करनी है, मां से वो सब पूछना है कि जो बातें फोन पर नहीं कर पाता, दादी से आज़ादी के दिनों और निपट ग़रीबी की बात करनी है. साल-भर बाद घर आया कि मैं अपने ही घर में चार दिन का मेहमान भर हूं. कल फिर दिल्ली की ट्रेन पकड़नी है...दिल्ली का मानसून कितना भी सुंदर क्यों नहीं हो, पर उसमें वो ताजगी कहां, जिसमें सोंधी मिट्टी की गंध और अधपके फलों और फूलों की ख़ुशबू लिपटी रहती है.’

महानगरों में मानसून अक्सर ही आपदा बनकर आता है. क्या यह कहने का साहस लेखक इसलिए नहीं कर सका, कि फिर कहीं गांव के सौंधे मानसून के बिछड़ने की टीस और गहरा न जाए?

दादी-बाबा, नानी-नाना के साथ बातें करना अक्सर ही इतिहास के पन्ने पलटने जैसा होता है. वह इतिहास जो किताबों में दर्ज नहीं हुआ. जिसे कहीं लिखा नहीं गया, लेकिन जो फिर भी अपने पढ़ने का इंतजार करता है. लेकिन अक्सर ही स्मृतियों में दर्ज वह इतिहास अनदेखा, अनपढ़ा ही रह जाता है, क्योंकि आज की पीढ़ी इतिहास और अतीत के किस्सों का जीवंत वर्णन सुनने से ज्यादा गूगल से मिली जानकारी को पढ़ना पसंद करती है. लेखक अपनी दादी (दाय) के ज्ञान, परख और अनुभव को बांटते हुए हमें बताता है -

‘दाय के पास कोई औपचारिक शिक्षा नहीं थी...लोक अनुभव का ऐसा संसार उसके पास था जहां शास्त्रीय ज्ञान बौना पड़ जाता है!...दाय घड़ी देखकर समय का हिसाब नहीं लगाती. सूर्य को देखकर कहती- एक पहर बीता, दो पहर बीता. अपने जन्म का हिसाब वो 1934 में बिहार में आए भीषण भूकंप से लगाती...

दादी कहती, उस जमाने में गांव में कही-कहीं चूल्हा जलता था, पर लोग मिल-बांटकर खाते थे. जब भी हम उससे आज की ग़रीबी की बात करते तो वह कहती नहीं, पहले जैसी स्थिति नहीं है. अब सब घर में चूल्हा तो जलता है. औपनिवेशिक दौर में पली-बढ़ी उस पीढ़ी के लिए ‘भूख’ सबसे बड़ा सच था.’

पता नहीं लेखक अपनी दादी को क्यों नहीं बता सका कि औपनिवेशिक दौर बीत जाने के बाद वैश्वीकरण के इस दौर में ‘भूख’ पहले से ज्यादा ‘विकराल’ रूप में चारों तरफ फैल गई है.

इस किताब के नोट्सनुमा लेखों को लेखक की डायरी भी कहा जाए तो संभवतः कुछ गलत नहीं होगा. किताब के सभी नोट्स पांच भागों में बंटे हैं. एक खंड में देश-विदेश की यात्राएं, दूसरे में समकालीन मीडिया, तीसरे में कला-संस्कृति, चौथे में रिपोर्ताज और पांचवें व अंतिम खंड में संस्मरण हैं. कुछ नोट्स पढ़कर पाठक काफी भावविभोर से हो जाएंगे, तो कुछ को पढ़ना किसी अनचाहे संवाद का हिस्सा बनने जैसा लगेगा. हां, लेकिन ज्यादातर नोट्स जानकारी के स्वास्थ्यवर्धक डोज से भरे हैं. सहज भाषा में लिखे गए इन लेखों को पढ़ना अलग-अलग स्वाद की छोटी-छोटी मीठी गोलियों को चूसने जैसा सा लगता है जो झट से खत्म हो जाती हैं...और यदि कोई गोली पसंद न आए तो झट से दूसरी को फांककर जायका बदला जा सकता है.