लंबा राजनीतिक अनुभव रखने वाला हर व्यक्ति यह कहता है कि राजनीति में कभी किसी को खत्म नहीं मानना चाहिए. राजनीतिक रूप से चुका हुआ माना जाने वाला कोई भी नेता यहां कब बुलंदियों पर पहुंच जाए, कहा नहीं जा सकता. भारत के राजनीतिक इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं और 2018 ने भी एक बार फिर यही बात साबित की है. वे नेता जिनके बारे में यह माना जा रहा था कि उनकी राजनीतिक पूंजी कोई खास नहीं है, उन्होंने इस साल सियासत के क्षेत्र में लंबी छलांग लगाई है. ये पांच उदाहरण ऐसे ही नेताओं के हैं.

एचडी कुमारस्वामी

एचडी कुमारस्वामी वैसे तो पहले भी कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे हैं, लेकिन इस साल की शुरुआत में जब कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिए कुछ ही महीने का वक्त बचा था तो उस वक्त किसी ने दूर-दूर तक नहीं सोचा होगा कि कुमारस्वामी एक बार फिर से मुख्यमंत्री बन जाएंगे. कर्नाटक में असल मुकाबला कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीएस येद्दियुरप्पा के बीच था. ऐसे में कुमारस्वामी और उनकी पार्टी जनता दल - सेक्यूलर (जेडीएस) के लिए कोई संभावना नहीं दिख रही थी.

लेकिन जब चुनावी नतीजे आए तो भाजपा और कांग्रेस से काफी कम सीटें होने के बावजूद एचडी कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बन गए. 37 सीटों वाली पार्टी जेडीएस को 80 विधायकों वाली कांग्रेस ने मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा दिया. दरअसल, कर्नाटक विधानसभा चुनावों का नतीजा ऐसे समय में आया था जब कांग्रेस हर हाल में भाजपा को रोकना चाहती थी. कर्नाटक के रूप में कांग्रेस के पास अपनी सत्ता वाला आखिरी प्रमुख राज्य था. ऐसे में कांग्रेस ने अपनी से आधी से भी कम सीटें होने के बावजूद कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय लिया.

कमलनाथ

कमलनाथ की गिनती कांग्रेस के दिग्गजों में होती आई है. लेकिन उनकी उम्र 70 साल से अधिक है और इसलिए जब 2018 शुरू हो रहा था तो मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों को लेकर कांग्रेस में जो चर्चा चल रही थी, उसके मुताबिक ज्यादातर लोग यही बात कर रहे थे कि शिवराज सिंह चौहान सरकार को उखाड़ फेंकने के मकसद से पार्टी को मध्य प्रदेश में युवा नेतृत्व देना चाहिए. इन चर्चाओं में ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम सबसे आगे चल रहा था.

यह माना जा रहा था कि 70 पार के कमलनाथ अपनी सियासी पारी खेल चुके हैं और अब उन पर दांव लगाना ठीक नहीं होगा. लेकिन 2018 में कमलनाथ ने सियासी उलटफेर किया और रिटायरमेंट की राह पर बढ़ रहा यह कांग्रेसी दिग्गज आज मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री है.

दिलचस्प बात है कि इस साल अप्रैल में जब मध्य प्रदेश में कांग्रेस अध्यक्ष बदलने की बात चली तो सबसे आगे ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम चल रहा था. यह माना जा रहा था जिस तरह से राजस्थान की कमान सचिन पायलट को दी गई है, उसी तरह मध्य प्रदेश की कमान सिंधिया को दी जा सकती है. लेकिन प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ बनाए गए और सिंधिया को चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनाया गया. इसके बाद जब कांग्रेस को विधानसभा चुनावों में सबसे अधिक सीटें हासिल हुईं तो मुख्यमंत्री बनने में भी कमलनाथ सिंधिया पर भारी पड़े.

विप्लब कुमार देब

त्रिपुरा के मुख्यमंत्री विप्लब कुमार देब पहली बार कोई चुनाव 2018 में ही लड़े थे. इसी साल वे पहली बार विधायक बने और हैरानी की बात यह कि मुख्यमंत्री भी बन गए. वैसे विप्लब देब राजनीति में पैर जमाने की कोशिश लंबे समय से कर रहे थे और कुछ साल पहले तक राजनीतिक गलियारों में उनकी पहचान सियासत में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहे युवा की ही थी.

ऐसे में जब पूर्वोत्तर में पैर जमाने की कोशिश कर रही भाजपा ने उन्हें त्रिपुरा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया तो यह उनके लिए उस वक्त तक की सबसे बड़ी जिम्मेदारी थी. फिर भी बहुत कम लोगों को यह उम्मीद थी कि त्रिपुरा में भाजपा चुनाव जीत जाएगी. बहुत लंबे समय से यहां माणिक सरकार सत्ता में थे. लेकिन 2018 में वाम दलों को हराकर भाजपा चुनाव जीत गई और विप्लब देब तीन साल के अंदर राजनीति में जगह बनाने के लिए संघर्ष करने वाले युवा से त्रिपुरा के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए.

नवजोत सिंह सिद्धू

नवजोत सिंह सिद्धू एक नेता के तौर पर अक्सर चर्चा में बने रहते हैं. भाजपा को छोड़कर कांग्रेस में जाने वाले सिद्धू पंजाब की कैप्टन अमरिंदर सिंह की कांग्रेस सरकार में मंत्री हैं. लेकिन सिद्धू को 2018 में चर्चा की वजह सीमा पार पाकिस्तान से मिली. पाकिस्तान में इमरान खान चुनाव जीतकर प्रधानमंत्री बन गए और उनके शपथ ग्रहण के वक्त से ही सिद्धू लगातार चर्चा में बने रहे.

जब इमरान खान ने सिद्धू समेत कुछ और पुराने भारतीय क्रिकेट खिलाड़ियों को शपथ ग्रहण समारोह में आने का न्यौता दिया तो भाजपा के विरोध की वजह से दूसरे खिलाड़ी पीछे हट गए लेकिन सिद्धू पाकिस्तान गए. वहां पाकिस्तानी सेना प्रमुख से उनका गला मिलना भी बहुत विवादों में रहा. भाजपा के लोगों ने उनकी काफी लानत-मलानत की. लेकिन उस गले मिलने का परिणाम जब करतारपुर काॅरीडोर के रूप में सामने आया तो सिद्धू की तारीफ इस रूप में होने लगी कि जो काम सालों की कोशिश के बावजूद राजनयिक और बड़े-बड़े राजनेता नहीं करा पाए, वह काम सिद्धू ने करा दिया. खुद इमरान खान ने इसका श्रेय सिद्धू को दिया.

वैसे तो सिद्धू राज्य सरकार में एक मंत्री भर हैं, लेकिन करतारपुर काॅरीडोर की मंजूरी में भूमिका निभाने की वजह से पाकिस्तान में इसके लिए हुए आयोजन में केंद्रीय मंत्री हरसिमत कौर बादल और हरदीप सिंह पुरी भी उनके सामने फीके पड़ गए.

गोरधन जडाफिया

2002 में गुजरात में जब दंगे हुए हुए थे, उस दौरान गोरधन जडाफिया वहां के गृह राज्य मंत्री थे. नरेंद्र मोदी के बेहद विश्वस्त और करीबी लोगों में उनकी गिनती होती थी. लेकिन बाद में उनके रिश्ते नरेंद्र मोदी से खराब होते गए और जडाफिया भाजपा से निकल गए. उन्होंने अपनी अलग पार्टी बनाई. केशुभाई पटेल के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़े. मोदी के खिलाफ बहुत बुरा-भला कहा. बहुत लोगों ने यह माना कि अब उनका राजनीतिक करियर खत्म हो गया.

भाजपा में 2014 में जडाफिया की वापसी तो हो गई थी, लेकिन कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी उन्हें नहीं दी गई थी. वे गुजरात प्रदेश भाजपा के उपाध्यक्ष जरूर बने, लेकिन भाजपा संगठन को जो लोग भी समझते हैं, उन्हें मालूम है कि इस पद का कोई खास राजनीतिक मतलब नहीं होता. इसके बावजूद 2018 के आखिरी दिनों में जडाफिया को देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाने का निर्णय भाजपा ने लिया. यह एक ऐसा राज्य है जिसने 80 में से 73 सीटें देकर नरेंद्र मोदी को 2014 में प्रधानमंत्री पद की कुर्सी तक पहुंचाया था और 2019 की मोदी की पारी भी काफी हद तक उत्तर प्रदेश पर ही निर्भर करेगी. उत्तर प्रदेश का प्रभार मिलने से जडाफिया राजनीतिक वनवास से भाजपा की मुख्यधारा की राजनीति में आ गए हैं.