राहुल गांधी पहला लोकसभा चुनाव 2004 में जीते थे. भारत के सबसे रसूखदार राजनीतिक परिवार से होने के बावजूद उनके राजनीतिक प्रशिक्षण में अपेक्षाकृत बहुत अधिक वक्त लगा. हालांकि, बतौर नेता राहुल गांधी के शुरुआती दस सालों में उनकी ही पार्टी कांग्रेस की सरकार केंद्र में रही. लेकिन राहुल गांधी से जिस राजनीतिक परिपक्वता की उम्मीद खुद कांग्रेस पार्टी को थी, वह उनमें नहीं दिखी. 2014 का लोकसभा चुनाव आते-आते राहुल गांधी के साथ ‘पप्पू’ उपनाम चिपक गया था. 2014 के बाद भी कुछ सालों तक राहुल गांधी की यही स्थिति रही. हालांकि, वे इस बीच पार्टी उपाध्यक्ष के पद तक पहुंच गए थे.

राहुल गांधी में परिपक्व नेता के मजबूत संकेत 2017 के गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान दिखने शुरू हुए. उन चुनावों में कांग्रेस भले ही भारतीय जनता पार्टी को हराकर गुजरात की सत्ता में नहीं आ पाई लेकिन, उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की अगुवाई वाली भाजपा को बहुत कड़ी टक्कर दी. इसका नतीजा यह हुआ कि चुनाव प्रचार के आखिरी दौर में प्रधानमंत्री होने के बावजूद नरेंद्र मोदी को गुजरात का मोर्चा खुद संभालना पड़ा और जैसे-तैसे वहां भाजपा की सरकार बच पाई.

ऐसा लगता है कि गुजरात चुनावों ने राहुल गांधी को आत्मविश्वास भी दिया. क्योंकि इसके पहले कई मौके ऐसे आए थे, जब राहुल गांधी जिम्मेदारियों से पीछे हटते दिखे. लेकिन गुजरात चुनावों के दौरान ही सोनिया गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी राहुल गांधी के लिए खाली की. बतौर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कार्यभार तो 2017 के दिसंबर में ही संभाल लिया था लेकिन 2018 में वे इस भूमिका निर्वहन पूरी परिपक्वता से करते हुए दिखे.

राहुल गांधी के लिए बतौर पार्टी अध्यक्ष पहली बड़ी चुनौती कर्नाटक विधानसभा चुनाव थे. कर्नाटक की स्थिति यह थी कि कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया एक मजबूत क्षत्रप की भूमिका में थे. लेकिन भाजपा भी अपने पुराने दिग्गज बीएस येदियुरप्पा को फिर से चेहरा बनाकर कर्नाटक चुनाव जीतने की सबसे बड़ी दावेदार बनी हुई थी. वहीं जनता दल सेकुलर भी चुनावों में तीसरा कोण जोड़ रहा था.

कर्नाटक में राहुल गांधी की राजनीतिक परिपक्वता पहले तो इस बात में दिखी कि उन्होंने कांग्रेस के अंदर सिद्धारमैया और उनके विरोधियों के बीच सुलह-समझौता कराया. डीके शिवकुमार को भी प्रमुख भूमिका दी. इससे कांग्रेस मजबूती से चुनाव में उतरी. इसके बावजूद नतीजों में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. अब ऐसे में राहुल गांधी के सामने यह चुनौती थी कि कैसे जनता दल सेकुलर को वह अपने साथ लाएं लेकिन एचडी कुमारस्वामी को उपमुख्यमंत्री के पद का प्रस्ताव पहले ही भाजपा दे चुकी थी. ऐसे में राहुल गांधी ने कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री के पद का प्रस्ताव देकर भाजपा की पूरी रणनीति पर पानी फेरने का काम कर दिया. अधिक सीटें, केंद्र की सरकार और अनुकूल राज्यपाल के बावजूद भाजपा कर्नाटक में सरकार नहीं बना पाई.

राहुल गांधी की राजनीतिक परिपक्वता इस साल के उनके भाषणों में भी स्पष्ट तौर पर दिखी. वह चाहे अविश्वास प्रस्ताव के दौरान संसद में उनका भाषण हो या फिर देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग विषयों पर दिए गए उनके सार्वजनिक संबोधन. किसानों के मुद्दे पर और रफाल विवाद पर वे बहुत प्रभावी ढंग से पूरे साल मोदी सरकार को घेरते हुए नजर आए. हिंदी में दिए गए उनके भाषणों में लोगों से सीधा संवाद स्थापित करने की क्षमता 2018 में जितनी दिखी, उतनी पहले कभी नहीं दिखी थी.

कभी राजनीति में ‘पप्पू’ के नाम से बदनाम राहुल गांधी की राजनीतिक परिपक्वता सबसे अधिक कहीं दिखी तो वह मध्य प्रदेश और राजस्थान के चुनावों में और चुनावी नतीजों के बाद के प्रबंधन में. मध्य प्रदेश में कांग्रेस लंबे समय से सत्ता से बाहर थी. आम तौर पर राजनीतिक दलों में यह देखा जाता है कि जहां वह सत्ता से लंबे समय तक बाहर रहती है, वहां पार्टी कई खेमों में बंट जाती है. मध्य प्रदेश में भी यही स्थिति थी. दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के अपने-अपने खेमे साफ दिख रहे थे. राहुल गांधी ने इन सभी को एकजुट होने के लिए बाध्य कर दिया. आपसी संतुलन स्थापित करने के लिए उन्होंने जहां कमलनाथ जैसे अनुभवी व्यक्ति को प्रदेश कांग्रेस समिति की कमान सौंपी तो ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनाया. वहीं संगठन के अंदर आंतरिक भूमिका दिग्विजय सिंह की भी तय की गई.

इन सबका नतीजा यह हुआ कि शिवराज सिंह चौहान की तथाकथित भारी लोकप्रियता के बावजूद कांग्रेस मध्य प्रदेश में सबसे अधिक सीटें लेकर आई. अब जंग मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर थी. कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के समर्थक आमने-सामने थे. इस स्थिति से निपटने में भी राहुल गांधी ने परिपक्वता दिखाई और दोनों को साथ बैठाकर पार्टी हितों को देखते हुए कमलनाथ के नाम पर सहमति बनाई.

यही स्थिति राजस्थान में भी थी. सचिन पायलट काफी पहले प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष बना दिए गए थे, लेकिन अशोक गहलोत का खेमा भी पूरी तरह सक्रिय था. यहां भी टिकट बंटवारे से लेकर चुनाव प्रचार तक में राहुल गांधी ने दोनों खेमों के बीच संतुलन सुनिश्चित कराया. इसके बाद जब मुख्यमंत्री पद के लिए दोनों के बीच खींचतान की स्थिति पैदा हो गई और दोनों के समर्थकों के बीच लड़ने-भिड़ने की स्थिति पैदा हो गई तो इसमें भी राहुल गांधी ने राजनीतिक परिपक्वता के साथ स्थिति को संभाला. अपेक्षाकृत कम सीटें होने की वजह से राहुल गांधी ने जहां मुख्यमंत्री का पद अशोक गहलोत को दिया तो वहीं सचिन पायलट को उपमुख्यमंत्री बनाकर उन्होंने प्रदेश के युवाओं को अपने साथ बनाए रखने की कोशिश की.

कुल मिलाकर देखा जाए तो 2018 में राहुल गांधी एक परिपक्व नेता की तरह काम करते दिखे हैं. दूसरे दलों के साथ राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के नेतृत्व में एक गठबंधन तैयार करने की दिशा में की गई कोशिशों से भी यही दिखता है. लेकिन 2019 का लोकसभा चुनाव राहुल गांधी के लिए उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी चुनौती है. गठबंधन तैयार करने से लेकर राजनीतिक मुद्दे तय करने में इस दौरान उन्हें कड़ी परीक्षा के दौर से गुजरना होगा.