सरकारी बंगलों में गजब का जादू होता है. जो भी इनमें एक बार रह गया फिर छोड़ने का नाम ही नहीं लेता. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ इसकी गवाह है. ताजिंदगी अपने लिए और मरने के बाद अपने वंशजों के नाम आरक्षित कर बैठे राजनेताओं से बीते साल बड़ी मुश्किल से सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सरकारी बंगले खाली कराए गए थे. अभी भी लखनऊ में लगभग एक हजार से ज्यादा सरकारी बंगले ऐसे हैं जिनमें या तो अपात्र लोग रह रहे हैं या जिन पर अवैध कब्जे हैं. ऐसे लोगों में राजनीतिक दल, नेता, संस्थाएं, नेता, पत्रकार और सरकारी अधिकारी/कर्मचारी सब शामिल हैं.

सरकारी महल खाली न करना पड़े इसके लिए समाजवादी कहे जाने वाले मुख्यमंत्रियों ने किस-किस तरह के हथकंडे अपनाए, यह अभी बहुत पुराना किस्सा नहीं हुआ है. असल में देखा जाए तो सरकारी बंगला लखनऊ में प्रतिष्ठा का ऐसा प्रश्न बन गया है जो उस दौर की याद दिलाता है जब नवाब अपने मनसबदारों को उनकी हैसियत के मुताबिक हवेलियां या कोठियां नजर किया करते थे. इसीलिए योगी सरकार जिसे खुश करना चाहती है, उसे बड़े नेताओं से खाली कराए गए बंगले दे कर उपकृत कर देती है. शिवपाल सिंह यादव को मायावती का बंगला दे दिया गया तो राजा भैया के लिए भी एक शानदार बंगला तैयार कर दिया गया.

बहरहाल, बंगला मोह की ताजा कड़ी में उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त संजय मिश्रा का किस्सा इन दिनों चर्चा में है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद लोकायुक्त बने संजय मिश्रा का लोकायुक्त बनना जितना नाटकीय है, उतना ही नाटकीय है उनका बंगला प्रकरण. इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश संजय मिश्रा ने 31 जनवरी 2016 को पद की शपथ ली थी. वे सुप्रीम कोर्ट के एक विशेषाधिकार के कारण लोकायुक्त नियुक्त हुए थे. दरअसल इस पद पर अखिलेश सरकार जस्टिस वीरेंद्र सिंह को चाहती थी. सुप्रीम कोर्ट ने भी वीरेंद्र सिंह को लोकायुक्त बनाए जाने पर 16 दिसंबर 2015 को अपनी मुहर लगा दी थी.

लेकिन फिर अदालत के सामने यह बात आई कि जस्टिस वीरेंद्र सिंह के नाम पर तो चयन समिति में शामिल इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने गंभीर आपत्तियां जताई थीं. अखिलेश सरकार ने सर्वोच्च अदालत की आंखों में धूल झोंकते हुए इस तथ्य को छुपा कर वीरेंद्र सिंह के नाम पर स्वीकृति ले ली थी. यह जानकारी अपने सामने आने पर सुप्रीम कोर्ट ने वीरेंद्र सिंह के शपथ ग्रहण पर रोक लगा दी और बाद में विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए अखिलेश सरकार द्वारा भेजे गए पांच नामों में से जस्टिस संजय मिश्रा के नाम को मंजूर कर लिया.

ऐसी परिस्थितियों में लोकायुक्त बने संजय मिश्रा अपने लगभग तीन वर्ष के कार्यकाल में अपने काम के लिए तो चर्चा नहीं पा सके लेकिन, एक बड़े बंगले के विवाद ने उन्हें अचानक सुर्खियों में ला दिया. चर्चा की शुरुआत हुई एक बंगले से. राजधानी लखनऊ की गौतमपल्ली कालोनी में टाइप-6 के बड़े बंगले में रहने वाले संजय मिश्रा को तीन दिसंबर 2017 को राज्य संपत्ति विभाग ने उनका टाइप-6 आवंटन रद्द करने की सूचना दी. उन्हें बताया गया कि उन्हें पद के अनुरूप टाइप-5 का बंगला आवंटित किया जा रहा है. लोकायुक्त ने टाइप-6 बंगला खाली नहीं किया. बल्कि वे इस आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट चले गये.

अदालती सुनवाई में राज्य संपत्ति विभाग की दलीलें कमजोर रहीं. हाई कोर्ट ने 20 नवंबर, 2018 को मामले की सुनवाई पूरी करके फैसला सुरक्षित कर लिया था. 22 दिसंबर को उसने फैसला सुनाया. इसमें लोकायुक्त की सेवा शर्तों को हाई कोर्ट को मुख्य न्यायाधीश के समान मानते हुए उनके टाइप-6 के बंगले को खाली करवा कर उन्हें टाइप-5 का बंगला आवंटित करने के राज्य संपत्ति विभाग के आदेश को रद्द कर दिया गया.

आम तौर पर बड़े लान और चार बेडरूम वाले टाइप-6 के बड़े बंगलों की तुलना में तीन बेड रूम और सामान्यतः बिना लान वाले टाइप-5 के छोटे बंगले में जाना उत्तर प्रदेश में शान के खिलाफ माना जाता है. मौजूदा मुख्य सूचना आयुक्त जावेद उस्मानी और राज्य लोक सेवा ट्रिब्यूनल के उपाध्यक्ष रोहित नंदन ने भी अपने टाइप-6 के आवास खाली करके टाइप-5 के आवास आवंटित किए जाने के आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट में दस्तक दी है. राज्य में बड़े बंगलों के स्थान पर छोटे बंगलों के आवंटन के कम से कम 36 मामले अदालत में चल रहे हैं. ऐसे में लोकायुक्त का मामला भी उसी तरह का सामान्य मामला हो सकता था, अगर इसमें लोकायुक्त कार्यालय के बड़े अधिकारी एक प्रेस कांफ्रेंस करके अपनी भड़ास न निकालते.

विवाद की शुरुआत भी असल में यहीं से हुई. 24 दिसंबर को लोकायुक्त के प्रधान सचिव पंकज उपाध्याय, मुख्य जांच अधिकारी राकेश कुमार और संयुक्त सचिव कुंवर खन्ना ने एक प्रेस कांफ्रेंस करके राज्य सरकार पर लोकायुक्त के अपमान का गंभीर आरोप लगा दिया. कहा गया कि जिस तरह पिछले एक वर्ष से आवास के लिए लोकायुक्त जैसे उच्च पदस्थ पदाधिकारी को अपमानित किया गया उससे उत्पन्न मानसिक पीड़ा और क्षोभ से नियमित क्रियाकलापों पर प्रभाव पड़ता है. यह भी कहा गया कि लोकायुक्त जस्टिस संजय मिश्रा का सरकारी आवास दबाव बनाने किए बदला गया.

लोकायुक्त के अधिकारियों ने यह भी बताया कि हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं. उनके मुताबिक कोर्ट ने भी पूछा है कि क्या राज्य संपत्ति विभाग का यह कृत्य लोकायुक्त के पद की गरिमा को नीचे गिराने का प्रयास तो नहीं. लोकायुक्त आधिकारियों ने राज्य सरकार पर यह भी आरोप लगाया कि वह बार-बार लिखे जाने के बाद भी लोकायुक्त संगठन को सुविधाएं और संसाधन नहीं दे रही. उनके मुताबिक सरकार 16 आईपीएस और 25 कांस्टेबलों की उनकी मांग पर भी कोई ध्यान नहीं दे रही.

उत्तर प्रदेश में यह पहली बार हुआ कि लोकायुक्त संगठन ने सरकार के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस की और वह भी लोकायुक्त के बंगले के मुद्दे पर. लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई. प्रेस कॉन्फ्रेंस के अगले ही दिन उत्तर प्रदेश के राज्य संपत्ति अधिकारी योगेश शुक्ला मीडिया के सामने प्रकट हुए. उन्होंने कहा कि राज्य सरकार पर लोकायुक्त के अपमान का आरोप सरासर गलत है. उन्होंने कहा कि न्यायिक सेवा के अधिकारी होने के बावजूद लोकायुक्त संगठन के प्रधान सचिव पंकज कुमार और मुख्य अन्वेषण अधिकारी राकेश कुमार द्वारा राज्य सरकार और राज्य संपत्ति विभाग के विरुद्ध गंभीर टिप्पणियां करने के लिए सरकार हाई कोर्ट को पत्र लिख कर उचित कार्रवाई करने के लिए कहेगी. उन्होंने कहा कि ये टिप्पणियां आचरण और सेवा नियमावली के विरुद्ध हैं. राज्य संपत्ति अधिकारी का यह भी कहना था कि लोकायुक्त आवास पर हाई कोर्ट के फैसले और टिप्पणियों के खिलाफ सरकार सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल करने की तैयारी कर रही है और इस सिलसिले में न्याय विभाग से राय मांगी गई है.

वैसे पूरे प्रकरण में कई झोल भी दिखते हैं. राज्य संपत्ति विभाग का कहना है कि अधिनियम में लोकायुक्त को टाइप-6 आवास देने का प्रावधान नहीं है. यह अधिनियम सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बना था. इसके बावजूद मामला हाई कोर्ट में जाने पर राज्य संपत्ति विभाग ने 12 दिसंबर को ही लोकायुक्त के टाइप-5 आवास आवंटन का आदेश रद्द कर दिया था और इसकी जानकारी एडवोकेट जनरल राकेश कुमार सिंह ने अदालत को भी दे दी थी. इसके बावजूद सरकार और राज्य संपत्ति विभाग के विरुद्ध हाई कोर्ट ने अपने आदेश में अनुचित टिप्पणियां कीं. हालांकि सवाल यह भी उठता है कि जब हाई कोर्ट ने 20 नवंबर को ही आदेश सुरक्षित रख लिया था तो उसके बाद राज्य संपत्ति विभाग के किसी आदेश का क्या औचित्य रह जाता है.

वैसे उत्तर प्रदेश में बंगलों का आवंटन नियमों से ज्यादा कृपा पर आधारित रहता है तभी तो बिना बिना विधायक हुए भी मुलायम सिंह यादव की बहू अपर्णा यादव और भाजपा विधायक पंकज सिंह को टाइप-6 बंगला देते वक्त नियम आड़े नहीं आते. लेकिन लोकायुक्त को बंगला देने में नियमों की बात आ जाती है.