राजस्थान की नवगठित कांग्रेस सरकार ने हरिदेव जोशी पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय (एचजेयूजे) और आंबेडकर विधि विश्वविद्यालय को फिर से शुरू करने का फैसला किया है. इन दोनों विश्वविद्यालयों की स्थापना अशोक गहलोत सरकार के पिछले कार्यकाल (2008-13) में की गई थी, जिन्हें वसुंधरा सरकार के समय (2013-18) बंद कर दिया गया. इन दोनों संस्थानों के बारे में खास बात है कि ये पूरी तरह से एक ही क्षेत्र में पठन-पाठन और शोध के लिए स्थापित राजस्थान के पहले संस्थान थे. इनमें से हरिदेव जोशी विवि में पूरा स्टाफ होने के साथ लगातार तीसरे सत्र में भी विद्यार्थियों के दाखिले हो गए थे. इसलिए बाद में इसका विलय राजस्थान विवि में कर दिया गया.

एचजेयूजे को बंद करने के फैसले के पीछे भाजपा सरकार की दलील थी कि इसके संचालन में लग रही लागत, विद्यार्थियों की संख्या की तुलना में कहीं ज्यादा थी. लेकिन सूत्र इसके पीछे कुछ और ही कारण बताते हैं. उनके मुताबिक प्रदेश के एक वरिष्ठ पत्रकार पीएचडी के लिए हरिदेव जोशी विवि में दाखिला चाहते थे, लेकिन असफल रहे. यह इत्तेफाक से कुछ बढ़कर ही था कि इसके तुरंत बाद से मुख्यमंत्री राजे के इर्दगिर्द इस विश्वविद्यालय के ‘भाजपा विरोधी केंद्र’ होने की चर्चाएं एकदम से गर्म हो गईं. स्थानीय पत्रकारों के मुताबिक चूंकि राजस्थान में भाजपा का मतलब वसुंधरा राजे ही हैं, इसलिए यह विवि उनकी नज़रों में खटक गया. और, यदि आंबेडकर विवि की बात करें तो जानकार उसकी तुलना गेंहू के साथ घुन पिस जाने से करते हैं.

भारतीय प्रशासनिक सेवाओं से जुड़े रह चुके पूर्व जनसंपर्क अधिकारी सत्यनारायण सिंह सत्याग्रह से बातचीत में कहते हैं, ‘कांग्रेस के कार्यकाल में शुरू होने की वजह से भाजपा आशंकित थी कि कहीं हरिदेव जोशी विवि, उसकी विचारधारा के प्रतिकूल जाने वालों का केंद्र न बन जाए.’ वे जोर देकर दोहराते हैं कि पत्रकारिता जैसे क्षेत्रों से जुड़े उच्च शिक्षण संस्थानों में वैचारिक बहस की गुंजाइश पैदा होती है जो शायद वसुंधरा सरकार को मंजूर नहीं था. सिंह उन प्रमुख लोगों में शुमार थे जिन्होंने सरकार के इस फैसले के खिलाफ़ कानूनन जमकर लोहा लिया था. लेकिन विधानसभा में बिल पास कर सरकार ने इसकी काट निकाल ली.

इस तरह नियम-कायदों से संचालित हो रहे विश्वविद्यालय को जबरन बंद कर देने को शिक्षाविद, देश के शैक्षणिक इतिहास पर एक काले धब्बे के तौर पर देखते हैं. इस मामले में भाजपा की किरकरी इसलिए भी ज्यादा हुई क्योंकि एक तरफ संगठन का शीर्ष नेतृत्व प्रतिवर्ष कई लाख नए रोज़गार देने के आश्वासन देता रहा है, वहीं राजस्थान में पार्टी की ही सरकार ने प्रोफेशनल कोर्स चला रहे इन दोनों संस्थानों पर ताले जड़ दिए. आरटीआई के तहत मिली जानकारी के आधार पर राजस्थान विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर राजीव गुप्ता कहते हैं, ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के इतिहास में यह पहला उदाहरण था जब सरकार ने ही सरकारी संस्थानों का गला घोंटा हो.’

हरिदेव जोशी विवि के पूर्व प्रोफेसर और वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ इस बारे में कहते हैं, ‘देशभर के तमाम राज्य सार्वजनिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए निवेश कर रहे हैं. लेकिन राजस्थान में विपरीत रुख देखने को मिला. इस विश्वविद्यालय में लोककलाओं के संरक्षण की बात कही गई थी. यहां मॉडर्न कम्युनिकेशन को भी बढ़ावा दिया जा सकता था. थिएटर जैसी विधाओं को मौके मिलते. यहां पॉलिटिक्स, स्पोर्ट्स, एंटरटेनमेंट जर्नलिज्म से जुड़े विभाग खोले जाने थे, इनसे विवि की प्रतिष्ठा बढ़ती. लेकिन सरकार ने सारी संभावनाओं एक झटके में खत्म कर दिया.’

बारेठ आगे जोड़ते हैं, ‘यदि संस्थान में कुलपति या प्रोफेसर कुछ गलत कर रहे थे तो सरकार को उचित कार्यवाही करनी चाहिए थी. यदि विवि के संचालन में कोई ख़ामी थी तो उसे दुरुस्त किया जा सकता था. लेकिन उसे बंद कर सरकार ने संस्थान के प्रति अपने द्वेष को ज़ाहिर कर दिया.’

हरिदेव जोशी विवि के पूर्व निर्दलीय महासचिव व पत्रकार योगेश पारीक कहते हैं कि इस संस्थान में कभी किसी विद्यार्थी पर किसी विचार को थोपने की कोशिश नहीं की गई. पारिक के शब्दों में, ‘कभी, बहुत जरूरी भी हुआ तो जो विद्यार्थी जिस विचारधारा में विश्वास रखता था, उसे उसी विचारधारा के सकारात्मक पहलुओं को थामे रखने की ही सलाह मिली.’ बकौल पारीक, ‘हमारे पहले छात्र संगठन चुनावों में चारों पदों पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्र नेताओं ने जीत हासिल की. लेकिन विचारधारा के आधार पर प्रशासन या प्राध्यापकों के साथ रत्तीभर भी मतभेद देखने को नहीं मिला.’

विवि के बंद हो जाने की वजह से पैदा हुई चुनौतियों के बारे में पारीक कहते हैं, ‘सरकार के फैसले ने सैकड़ों विद्यार्थियों की शैक्षणिक पहचान, योग्यता और भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए थे. इसके चलते हम में से कईयों को नौकरी हासिल करने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा.’

जानकार बताते हैं कि जिस तरह आरोपों के लंबे दौर के बाद हरिदेव जोशी विश्वविद्यालय को बंद किया गया, उसे प्रदेश कांग्रेस और खासतौर पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपनी साख से जोड़ लिया था. राजस्थान विधानसभा चुनावों से पहले सत्याग्रह से हुई बातचीत में गहलोत ने इशारा दिया था कि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने पर इन शिक्षण संस्थानों को फिर से शुरू किया जाएगा. इस बात के पीछे उनकी गंभीरता इससे समझी जा सकती है कि पिछले सप्ताह हुई सरकार की पहली ही कैबिनेट बैठक में इन संस्थानों को खोले जाने का फैसला लिया गया है.

इस बारे में गहलोत हमें बताते हैं, ‘ये कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा से ज्यादा आदर्शों से जुड़ा मामला था. हमने इन संस्थानों को ये नाम इसलिए दिए क्योंकि आंबेडकर संविधानविद थे, और पूर्व मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी प्रतिष्ठित पत्रकार थे. इससे पहले हमारे बच्चों को बाहर पढ़ने जाना पड़ता था, लेकिन पिछली सरकार ने उन बच्चों का हक़ मारने का काम किया. यह राज्य की जिम्मेदारी है कि सार्वजनिक शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए ताकि पंक्ति के आखिरी छोर पर खड़ा बच्चा भी उच्च शिक्षा हासिल कर सके. इसी नाते हमने, हमारे पूर्ववती निर्णय को बहाल करना अपना दायित्व समझा है.’