उत्तर प्रदेश की जनता, ख़ास तौर पर किसान और वहां की सरकार भी इन दिनों आवारा पशुओं से परेशान है. इनमें भी बड़ी तादाद गौवंश की है. यानी गाय-बैल, बछड़ा-बछड़ी आदि. चूंकि 2017 में राज्य में बनी भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने गौवध पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया हुआ है. रही-सही कसर गौरक्षक पूरी कर रहे हैं. इसके बाद आवारा छोड़े गए अनुपयोगी गौवंश की तादाद पूरे राज्य में तेजी से बढ़ी है. जबकि राज्य की योगी आदित्यनाथ सरकार अब तक इस समस्या का कोई समाधान कर नहीं पाई है. कहने-सुनने के लिए समाधान की कोशिशें हो ज़रूर रही हैं पर ये बेअसर ही साबित ही हुई हैं. नतीज़ा? बीते दिनों आईं कुछ ख़बरों के आईने में देखिए...

लोग आवारा पशुओं को स्कूलों, अस्पतालों ओर सरकारी दफ़्तरों में बांध रहे हैं

अभी 27 दिसंबर को ही ख़बर आई कि उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ के तमोतिया गांव में ग्रामीणों ने 500 आवारा पशुओं को एक प्राथमिक विद्यालय में बंद कर दिया. इसके चलते दो दिन स्कूल बंद रहा. इसी तरह गोरई गांव के किसानों ने भी 500 आवारा मवेशियों को एक प्राथमिक चिकित्सा केंद्र में बंद कर दिया. इसके बाद केंद्र एक दिन तक बंद रहा. जिला प्रशासन काफ़ी मशक्क़त के बाद इन जगहों से पशुओं को बाहर निकाल कर स्कूल अस्पताल को फिर चालू करा पाया.

इसी तरह की ख़बरें मथुरा, लखीमपुर खीरी और फ़िरोज़ाबाद से भी आईं. फ़िरोज़ाबाद के हरगनपुर में किसानों ने 100 से ज्यादा आवारा पशुओं को सरकारी स्कूल में बांध दिया था. मेरठ में तो ग्रामीण प्रदर्शनकारी सैकड़ों आवारा पशु लेकर तहसील परिसर में घुस आए. इससे कई घंटों तक वहां ख़ासी अव्यवस्था फैली रही.

बताया जाता है कि मथुरा और फ़िरोज़ाबाद में ऐसी घटनाओं पर प्रशासन ने सख़्ती बरती. मथुरा में सात ग्रामीणों को पशु क्रूरता अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया. इसके बाद किसानों ने डीएम (जिला मजिस्ट्रेट) कार्यालय घेर लिया. इसी तरह फिरोजाबाद में बीती 31 दिसंबर को सरकारी स्कूलों से पशुओं को मुक्त कराने पहुंचे एसडीएम (उप जिला मजिस्ट्रेट) पर ग्रामीणों ने पथराव कर दिया. इससे तनाव पैदा हो गया.

किसान-ग्रामीण परेशान हैं और ‘सरकार’ सियासी आरोप-प्रत्यारोप में उलझी है

ये जो ऊपर बताए गए वे तो चंद उदाहरण ही हैं. इस तरह की ख़बरें पूरे प्रदेश से आ रही हैं और ये परेशान लोगों के गुस्से की स्वाभाविक प्रतिक्रिया लगती है. किसानों से बातचीत में आवारा पशुओं की समस्या के दो प्रमुख पहलू सामने आते हैं. एक- अनुपयोगी पशुुओं का क्या किया जाए? और दूसरा- ऐसे पशुओं से होने वाले नुकसान से कैसे बचा जाए? उदाहरण के तौर पर- मेरठ के डबथवा गांव के किसान प्रवीण कुमार बताते हैं, ‘पहले हम अनुपयोगी पशुओं को पांच-छह हजार रुपए में बेच देते थे. मगर अब चूंकि पशुवध को लेकर सरकार बेहद सख़्ती बरत रही है. इसलिए कोई अब ऐसे पशुओं को ख़रीदता नहीं. मज़बूरन हमें उन्हें सड़क पर छोड़ना पड़ता है.

इसी तरह अलीगढ़ के सैपुर गांव के चंद्रमोहन सिंह कहते हैं, ‘हमारे गांव में लगभग 600 बीघा खेती की ज़मीन है. इस पर हम गेहूं उगाने की कोशिश कर रहे हैं. रात-रात भर जागकर हम खेतों की रखवाली करते हैं. इसके बावज़ूद हमारी आधी से ज़्यादा फ़सल आवारा पशु चौपट कर चुके हैं. अब ऐसे में हम क्या करें.’ बताते चलें कि अलीगढ़ के इसी गांव में ग्रामीणों ने आवारा पशुओं को सरकारी स्कूल में बांधा था.

यानी समस्या गढ़ी हुई तो क़तई नहीं लगती जैसा कि सियासत में कई बार होता है. लेकिन फिर भी ‘सरकार’ सियासी आरोप-प्रत्यारोप की आड़ लेती दिख रही है. मसलन- अभी 30 दिसंबर को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शाहजहांपुर जिले में एक कार्यक्रम के दौरान कहा, ‘समाजवादी पार्टी के लोग दूध निकालकर खेतों में पशुओं को छुट्‌टा छोड़ देते हैं.’ वहीं ‘सत्याग्रह’ से ख़ास बातचीत में राज्य के कृषि मंत्री सूर्यप्रताप शाही कहते हैं, ‘पहले की सरकारों ने पशुओं की न तो उन्नत नस्लों के विकास पर ध्यान दिया और न उनके चारा और संरक्षण की व्यवस्था की. इसीलिए अब यह परेशानी दिख रही है. हम (भाजपा) तो 15 साल बाद अभी डेढ़-पौने दो साल पहले सरकार में आए हैं.’

और समाधान के उपाय भी समस्या बनते दिख रहे हैं

हालांकि ऐसा भी नहीं है कि सरकार इस समस्या से पूरी तरह बेफ़िक़्र हो. अगर ऐसा होता तो वह समाधान खोजती नहीं दिखती पर दिख रही है. मसलन- एक जनवरी को ही योगी आदित्यनाथ सरकार ने फ़ैसला किया है कि आवारा पशुओं की उचित देखभाल के लिए शहरी और ग्रामीण नागरिक निकायों के अंतर्गत गौवंश के लिए आश्रय स्थल स्थापित किए जाएंगे. ये आश्रय स्थल कम से कम 1,000 पशुओं की क्षमता वाले होंगे. सरकार के प्रवक्ता और राज्य के ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा ने बताया कि स्थानीय निकायों को इस काम के लिए सरकार ने 100 करोड़ रुपए भी जारी किए हैं. इसके साथ उन्होंने बताया कि पशु आश्रय स्थलों की स्थापना और उनके रखरखाव के लिए सरकार ने दो प्रतिशत ‘गौकल्याण उपकर’ लगाने का भी फ़ैसला किया है. ताकि धन का प्रबंध होता रहे. सरकार यह उपकर आबकारी विभाग के जरिए शराब से और मंडी परिषद व अन्य लाभकारी निगमों के माध्यम से वसूलेगी.

लेकिन सरकार के उपाय भी उसके लिए नया सिरदर्द साबित होने का संकेत अभी से देने लगे हैं. इस बाबत ‘सत्याग्रह’ की पड़ताल से पता चला कि सरकार ने पशु आश्रय स्थलों को ‘कान्हा उपवन’ नाम दिया है. प्रदेश में अभी बरेली जिले में ही ये अस्तित्व में आया है. नगर विकास मंत्री सुरेश खन्ना ने 30 नवंबर को बरेली महानगर के नजदीक सीबीगंज में करीब चार करोड़ रुपए की लागत से बने ‘कान्हा उपवन’ का उद्घाटन किया. इसमें उसी दिन शहर में घूम रही 60 गायों को लाकर बांध दिया गया. लेकिन रात के समय किसानों ने फसल को नुकसान पहुंचा रहे क़रीब 80 सांड़ों को घेरकर वहां पहुंचा दिया. इन सांड़ों ने रातभर में दो बछड़ों को पटककर मार डाला. कई गायों को ज़ख़्मी कर दिया और उन्हें बचाने आए चौकीदार को उठाकर फेंक दिया.

अगले दिन जब इन सांड़ों को ‘कान्हा उपवन’ से बाहर निकालने की कोशिश की गई तो किसान विरोध में उतर आए. फिर भी चार दिसंबर को नगर निगम आयुक्त ने उत्पाती सांड़ों को बाहर निकालने का आदेश दे दिया. उसी रात उन्हें निकालकर बाहर छोड़ दिया गया. लेकिन अगले ही दिन ये खबर आ गई कि एक सांड़ ने हाईवे पर जा रहे मोटरसाइकिल सवार को टक्कर मार दी जिससे उसकी मौत हो गई.

यही नहीं, जब इस मामले की जांच के लिए टीम मौके पर पहुंची तो उसने ‘कान्हा उपवन’ के प्रबंधन में कई ख़ामियां पाईं. इन्हें ठीक करने के सुझाव दिए. लेकिन इन पर अमल नहीं हुआ और 29 दिसंबर की रात दो गायों ने ठंड से दम तोड़ दिया. जांच दल में सिटी मजिस्ट्रेट, जिला पशु चिकित्सा अधिकारी और आईवीआरआई (भारतीय पशु चिकित्सा शोध संस्थान)के वैज्ञानिक शामिल थे. इस दल ने जो 12 प्रमुख सुझाव दिए थे उनमें जानवरों को ठंड से बचाव के लिए त्रिपाल की व्यवस्था करने और नर-मादा पशुओं को अलग रखने का बंदोबस्त करने को कहा गया था.

ऐसे ही दो प्रतिशत ‘गौकल्याण उपकर’ का मसला भी है. इसकी जब वसूली शुरू होगी तो इसका कोई विरोध नहीं होगा यह भी दावे के साथ कहा नहीं जा सकता. हालांकि इस सबके बावज़ूद कृषि मंत्री शाही की मानें तो ‘अभी तो सरकार ने समस्या से निपटना शुरू ही किया है. आगे जैसे-जैसे कमियां दिखेंगी उन्हें सुधारा जाएगा.’

अलबत्ता फिर भी लगातार सामने आ रही घटनाओं के मद्देनज़र यह आशंका अब तक तो बनी ही हुई है कि समस्या, सुधार और समाधान की इस प्रक्रिया में कहीं ज़्यादा देर न हो जाए.