जब तक सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष रहीं तब तक उनके सबसे विश्वस्त शख्स की छवि अहमद पटेल की ही रही. वे सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार थे और कांग्रेस में अहम निर्णयों के मामले में माना जाता था कि सोनिया गांधी के बाद सबसे ताकतवर वे ही हैं. अभी अहमद पटेल कांग्रेस के कोषाध्यक्ष हैं. राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद यह माना जा रहा था कि अब उनका राजनीतिक रसूख वैसा नहीं रहेगा जैसा सोनिया गांधी के अध्यक्ष रहते हुए होता था.

अगर ऐसा माना जा रहा था, तो इसकी ठोस वजहें भी थीं. राहुल गांधी जब अध्यक्ष बने तो उस वक्त गुजरात विधानसभा चुनाव हो रहे थे. गुजरात अहमद पटेल का गृह राज्य है. इसके बावजूद विधानसभा चुनावों में अहमद पटेल से कहीं अधिक राहुल गांधी ने पार्टी महासचिव और गुजरात के प्रभारी अशोक गहलोत की बातों पर यकीन किया था. बताया जाता है कि गुजरात विधानसभा चुनावों के लिए टिकटों के वितरण में भी अहमद पटेल की खास नहीं चली. यहां तक कि कांग्रेस ने घोषणा पत्र जारी किया था, उसमें सैम पित्रोदा की अहम भूमिका थी न कि अहमद पटेल की.

गृह राज्य में ही अहमद पटेल को राहुल गांधी की ओर से जब सबसे ज्यादा महत्व नहीं मिला तो कांग्रेस के अंदर भी यह कयासबाजी चलने लगी कि नए अध्यक्ष की अगुवाई वाली कांग्रेस में अहमद पटेल उतने ताकतवर नहीं रहेंगे. ऐसा इसलिए भी माना जा रहा था कि जिस तरह से अहमद पटेल सोनिया गांधी के सबसे विश्वस्त थे, उसी तरह से राहुल गांधी के सबसे अधिक विश्वस्त के तौर पर अशोक गहलोत उभरने लगे थे. गुजरात चुनावों में कांग्रेस को जो सफलता मिली, उसका श्रेय अशोक गहलोत को दिया गया. गुजरात कांग्रेस ने भी इसका श्रेय उनको दिया और राष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसा ही हुआ.

गुजरात विधानसभा चुनावों के बाद बतौर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की अशोक गहलोत पर निर्भरता बढ़ने लगी. इसके बाद हुए हर विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी के साथ वे बेहद सक्रिय दिखे. कर्नाटक विधानसभा चुनावों में भी वे सक्रिय दिख रहे थे. टिकट बंटवारे से लेकर चुनावी प्रबंधन तक हर मोर्चे पर अशोक गहलोत प्रमुख भूमिका निभा रहे थे.

लेकिन कर्नाटक के चुनावी नतीजे कांग्रेस के अनुकूल नहीं आए. भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बन गई और कांग्रेस के लिए दोबारा सरकार बनाने की राह बेहद मुश्किल हो गई. लेकिन जनता दल सेकुलर के साथ गठबंधन करने और कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री की कुर्सी देने के लिए बातचीत करके समझौते को अंतिम रूप देने में अशोक गहलोत की प्रमुख भूमिका रही. जाहिर है वे यह सब राहुल गांधी के कहने पर ही कर रहे थे.

ऐसे में इसके आसार बनते दिखने लगे थे कि जो भूमिका सोनिया गांधी के लिए अहमद पटेल निभाते थे वही अशोक गहलोत राहुल गांधी के लिए निभाने वाले हैं. कांग्रेस के ही कुछ नेता कहते हैं कि ऐसी स्थिति में अहमद पटेल की बेचैनी बढ़ने लगी. इन नेताओं ने यह भी बताया कि अहमद पटेल के साथ दिक्कत यह है कि वे चुनावी राजनीति वाले नेता नहीं हैं और न ही वे अपने गृह राज्य गुजरात में पूरी पार्टी के सर्वमान्य नेता हैं. ऐसे में उनके पास प्रबंधन वाली राजनीति का ही विकल्प बचता है.

उधर, दूसरी तरफ अशोक गहलोत हों, कमलनाथ, गुलाम नबी आजाद या फिर दिग्विजय सिंह, ये सभी लंबे समय तक चुनावी राजनीति में रहे हैं और पार्टी प्रबंधन में अहम भूमिका नहीं होने के बावजूद ये प्रासंगिक बने रहते हैं. अहमद पटेल के साथ यह स्थिति नहीं है. अगर उन्हें पार्टी कोई प्रमुख जिम्मेदारी न दे तो फिर उनके लिए राजनीति में खुद को प्रासंगिक बनाए रखना एक​ कठिन काम हो जाएगा.

जानकारों के मुताबिक ऐसे में अहमद पटेल के लिए यह जरूरी हो गया कि अशोक गहलोत को राहुल गांधी और कांग्रेस की दिल्ली की राजनीति से दूर किया जाए. सूत्र बताते हैं कि राजस्थान विधानसभा चुनाव अहमद पटेल के लिए एक मनचाहे अवसर के रूप में आया. राहुल गांधी के साथ अशोक गहलोत की सक्रियता और राजस्थान में प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर सचिन पायलट द्वारा दिन-रात की जा रही मेहनत की वजह से यही लग रहा था कि राजस्थान में वे ही मुख्यमंत्री बनेंगे और अशोक गहलोत राष्ट्रीय राजनीति में राहुल गांधी के संकटमोचक की तरह काम करते रहेंगे. यह स्थिति अहमद पटेल के लिए अनुकूल नहीं थी.

लेकिन जब नतीजे आए तो कांग्रेस को राजस्थान में पूर्ण बहुमत नहीं मिला. यह स्थिति अहमद पटेल के लिए माकूल थी. कांग्रेस के एक नेता तो चुनावों के कुछ दिन पहले से जयपुर में अहमद पटेल के टिके रहने को भी उनकी इसी राजनीति से जोड़कर देखते हैं. इन नतीजों के बाद अहमद पटेल के सामने यह अवसर आ गया कि वे अशोक गहलोत को दिल्ली से दूर करके जयपुर में लाने की दिशा में आगे बढ़ें. कुछ कांग्रेसी नेता अनौपचारिक बातचीत में बताते हैं कि राजस्थान चुनावों के बाद जब अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर खींचतान चल रही थी तो उस वक्त अहमद पटेल ने बेहद चतुराई से गहलोत का समर्थन किया. बताया जा रहा है कि इसके लिए अहमद पटेल ने राजनीतिक स्थिरता और अनुभव जैसे तर्कों का सहारा लिया.

अशोक गहलोत के राजस्थान का मुख्यमंत्री बनने से यह हुआ कि वे दिल्ली से और राहुल गांधी की रोज-रोज की राजनीति से दूर हो गए और राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी के सबसे विश्वस्त के तौर पर अहमद पटेल के आगे बढ़ने का रास्ता साफ हो गया. कांग्रेस के अंदर तो यह चर्चा भी चल रही है कि अगले लोकसभा चुनावों की तैयारियों से लेकर चुनाव लड़ने तक में अहमद पटेल उसी तरह की भूमिका निभाने जा रहे हैं जिस तरह की भूमिका वे सोनिया गांधी के अध्यक्ष रहते निभाते थे.

इसकी झलक मिलने भी लगी है. अहमद पटेल कांग्रेस के साथ सहयोगियों को जोड़ने के काम में लग गए हैं. बिहार की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष उपेेंद्र कुशवाहा ने जब केंद्र के सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से किनारा किया तो अहमद पटेल उनके घर गए और कुछ ही दिनों में उन्हें संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन में लेकर आए. बताया जा रहा है कि कुछ और दलों से भी अहमद पटेल की बातचीत चल रही है. यानी फिलहाल अब कमान उनके हाथ में है.