उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (इलाहाबाद) में 15 जनवरी से चार मार्च तक कुंभ का आयोजन होना है. वैसे पौराणिक मान्यताओं पर जाएं तो यह अर्द्ध कुंभ है. लेकिन, राज्य की भाजपा सरकार इसे कुंभ कहकर प्रचारित कर रही है. इससे पहले पूर्ण कुंभ 2013 में हुआ था. हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार पूर्ण कुंभ का आयोजन हर 12 साल बाद होता है.

राज्य की आदित्यनाथ सरकार इस आयोजन का बड़े पैमाने पर न केवल प्रचार कर रही है बल्कि, बड़े जोर-शोर के साथ इसकी तैयारियां भी की जा रही हैं. इसके लिए उसने 2018-19 के बजट में 2,400 करोड़ रुपये की रकम आवंटित की थी. साथ ही, उसने केंद्र से 2,200 करोड़ रुपये मदद की मांग की है. इससे पहले साल 2013 के पूर्ण कुंभ में अखिलेश यादव सरकार ने 1,214 करोड़ रुपये खर्च किए थे.

कुंभ क्षेत्र में सरकारी होर्डिंग | सभी फोटो: हेमंत कुमार पाण्डेय
कुंभ क्षेत्र में सरकारी होर्डिंग | सभी फोटो: हेमंत कुमार पाण्डेय

इस बार कुंभ मेले के लिए बजट के साथ ही इसका क्षेत्र भी बढ़ाया गया है. छह साल पहले जहां इस बड़े आयोजन के लिए संगम क्षेत्र में 1,936 हेक्टेयर जमीन का इस्तेमाल किया गया था वहीं, अब इसे बढ़ाकर 3,200 हेक्टेयर कर दिया गया है. मेला क्षेत्र को कुल 20 सेक्टरों में बांटा गया है. इन सेक्टरों में अलग-अलग अखाड़ों से संबंध रखने वाले साधु-संतों और दूसरे श्रद्धालुओं के लिए रहने की व्यवस्था की जा रही है. साधु-संतों को उनके शिविरों के लिए जमीन दी गई है. हालांकि इनमें से कइयों को इसे हासिल करने के लिए धरने पर बैठना पड़ा.

कुंभ क्षेत्र में जमीन हासिल करने के लिए धरना देते साधु-संत
कुंभ क्षेत्र में जमीन हासिल करने के लिए धरना देते साधु-संत

ऐसे ही एक संत हैं स्वामी श्री श्यामानंद जी महाराज. वे हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला के रहने वाले हैं. पहली बार कुंभ आने वाले स्वामी श्यामानंद दूसरे 27 के साधु-संतों के साथ हैं. सत्याग्रह से बातचीत में उन्होंने बताया, ‘डीएम साहब ने जमीन के लिए आश्वासन दिया है. दो हफ्ते से जमीन के लिए खुली जगह में संघर्ष कर रहे हैं. प्रशासन का कहना था कि जमीन नहीं है. इसके बाद हमने धरना शुरू कर दिया.’ इस रिपोर्ट को लिखे जाने से पहले स्वामी श्यामानंद ने बताया कि उनके साथ के सभी संतों को आखिरकार जमीन मिल गई है.

कुंभ क्षेत्र में जमीन हासिल करने के लिए केवल संत समाज के लोगों को ही कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ रहा. बीते कई वर्षों से संगम के पास पूजा और श्रृंगार की चीजों की दुकान लगाने वाली हिना देवी कहती हैं, ‘यहां (संगम क्षेत्र) 12 महीनों दुकान लगाते आए हैं. माघ मेले में हर साल 528 रुपये की पर्ची कटती है. लेकिन, अब कह रहे हैं कि दुकान हटाना होगा.’

असल में ‘दिव्य कुंभ-भव्य कुंभ’ का नारा देने वाली आदित्यनाथ सरकार ने इस बार मेला क्षेत्र में दुकानों के लिए भू क्षेत्र की नीलामी की व्यवस्था की है. इसके बाद अब छोटे-मोटे दुकानदारों के लिए इसे हासिल करना टेढ़ी-खीर हो गया है. बीते कई वर्षों से अक्षयवट मंदिर और बड़े हनुमान मंदिर के बीच सड़क किनारे दुकान लगाने वाली रीना गोस्वामी कहती हैं, ‘फुटपाथ पर दुकान नहीं रहेगा तो हम लोग कहां जाएंगे? हम लोग कहां से लाएंगे पैसा? पैसे वाले लोग दुकानें खरीद लेते हैं तो आम आदमी कहां से पाएगा?’ क्या पिछले कुंभ में भी ऐसा ही किया गया था? इस सवाल पर वे भावुक होकर कहती हैं, ‘जब 2013 में कुंभ हुआ था तो हम लोगों को जगह दी गई थी. अबकी बार भगाया जा रहा है जबकि इस बार तो जमीन (मेला क्षेत्र) भी बढ़ा दिया गया है.’

कुंभ मेला क्षेत्र में लोहे की चादरों से बनी हुई सड़क
कुंभ मेला क्षेत्र में लोहे की चादरों से बनी हुई सड़क

छोटे दुकानदारों और संतों की इन परेशानियों से आगे बढ़ें तो अभी भी मेला क्षेत्र में जमीन को समतल करने, टेंट लगाने और सड़क बनाने के बुनियादी काम होते दिख रहे हैं. बताया जाता है कि सरकार मेला क्षेत्र में कुल 1,500 किलोमीटर सड़कों का निर्माण कर रही है. इसके लिए लोहे की चादरों का इस्तेमाल किया गया है.

केंद्रीय अस्पताल
केंद्रीय अस्पताल

श्रद्धालुओं को स्नान क्षेत्र में किसी दुर्घटना से बचाने के लिए इस बार मोटी रस्सी की जगह रंग-बिरंगे डिब्बों का इस्तेमाल किया गया है जिससे उन्हें दूर से जल-सीमा की जानकारी हो जाए. इसके अलावा नदी में पहले की तरह जलपुलिस की भी व्यवस्था की गई है. श्रद्धालुओं के लिए मेला क्षेत्र में एक अस्पताल अस्पताल भी बनाया गया है. यहां पर मरीजों के बेड सहित अलग-अलग विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति की गई है. मुफ्त दवाइयों की भी व्यवस्था है.

इसी अस्पताल में हमें अभिषेक सिंह मिले. उन्होंने बताया, ‘पेट में काफी दर्द हुआ तो हम यहां आए. पहले इमरजेंसी में भर्ती करके सुई दिया गया. फिर वार्ड में शिफ्ट किया गया है. अभी आराम है. अच्छी सुविधा है. कोई पैसा नहीं लिया गया.’

श्रद्धालुओं को दुर्घटना से बचाने के लिए जल सीमा का डिब्बों से रेखांकन
श्रद्धालुओं को दुर्घटना से बचाने के लिए जल सीमा का डिब्बों से रेखांकन

दूसरी ओर, इस बार कुंभ क्षेत्र में स्वच्छता पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है. कुंभ मेले की वेबसाइट से हासिल जानकारी के मुताबिक क्षेत्र में कुल 1,22,500 शौचालय बनाए गए हैं. अलग-अलग जगहों पर 20,000 कूड़ेदान रखने का दावा किया गया है. इसके लिए बड़ी संख्या में सफाईकर्मियों की भी अस्थाई बहाली हुई है. वहीं, क्षेत्र के सुंदरीकरण के लिए संगम के रास्तों के साथ-साथ शहर की दीवारों, ओवरब्रिजों और इमारतों पर पेंटिंग की गई है.

सौंदर्यीकरण के तहत एक घर की दीवार पर बनी पेंटिंग
सौंदर्यीकरण के तहत एक घर की दीवार पर बनी पेंटिंग

इन सारी तैयारियों से इतर बीते महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रयागराज में 4,048 करोड़ रुपये की 360 परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया. साथ ही, इलाहाबाद किले में अक्षयवट और सरस्वती कूप को श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया. बताया जाता है कि जैन तीर्थंकर ऋषभदेव ने अक्षयवट के नीचे केशलुंचन (सिर के बालों को उखाड़ना) किया था. वहीं, सरस्वती कूप के बारे में माना जाता है कि इसमें विलुप्त सरस्वती नदी का जल है. आदित्यनाथ सरकार इस कदम को अपनी बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश कर रही है. मेला क्षेत्र में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के बड़े-बड़े होर्डिंग लगे हुए हैं. कई जगहों पर भाजपा के झंडे भी दिखाई दे रहे हैं. यानी भाजपा कुंभ की तैयारियों के ‘संगम’ में डुबकी लगाकर अगले साल आम चुनाव के लिए भी कुछ ‘पुण्य’ बटोरने में जुटी दिखती है.

अक्षयवट मंदिर
अक्षयवट मंदिर

हालांकि, संगम में गंदे पानी का प्रवाह सरकार की परेशानियों को बढ़ाने वाला साबित हो सकता है. संगम पर एक मल्लाह ने पानी की ओर इशारा करते हुए बताया, ‘देखिए, अब तक पानी कितना गंदा है. नदी किनारे नाला-नालियों को अभी भी बंद नहीं किया गया है. वह तो यह गंगा मां है, जो इतना सहकर भी सबको पवित्र कर देती है.’ संगम में मौजूद कई लोगों का कहना है कि इस बार नदी में पानी भी पहले की तुलना में कम है.

सरकारी दावे की मानें तो अगले दो महीने तक गंगा किनारे सभी कल-कारखानों को बंद करने की बात कही गई है, जिससे श्रद्धालु साफ गंगा में स्नान कर पुण्य के भागी बन पाएं. स्नान के दिन बांध से पानी छोड़कर जलस्तर को भी बढ़ाया जा सकता है.

संगम का पानी
संगम का पानी