साल 2018 ख़त्म होने से दो-तीन दिन पहले एक मीडिया रिपोर्ट देश के बेरोज़गारों के लिए एक अच्छी ख़बर लेकर आई. इसके मुताबिक़ केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार यूनिवर्सल बेसिक इनकम (यूबीआई) योजना लाकर बेरोज़गारों को नए साल का तोहफ़ा दे सकती है. ख़बरों के मुताबिक़ इस योजना के तहत सरकार देश के हरेक बेरोज़गार को 2,000 से 2,500 रुपये का बेरोज़गारी भत्ता दे सकती है.

सूत्रों के हवाले से बताया गया कि मोदी सरकार दो साल से इस योजना को लागू करने की तैयारी में है. पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम भी 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण में यूबीआई स्कीम लागू करने की सलाह दे चुके हैं. संभावना जताई जा रही है कि इस साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले सरकार इसे लागू करेगी. कुछ मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ सरकार फ़रवरी में पेश होने वाले अंतरिम बजट में इस योजना की घोषणा कर सकती है.

कई मीडिया विश्लेषकों का कहना है कि अगर सरकार ऐसा करती है तो चुनाव के लिहाज़ से उसका यह क़दम गेम चेंजर साबित हो सकता है. यानी उसे आम चुनाव में इसका फ़ायदा मिल सकता है. लेकिन, आलोचकों का कहना है कि सरकार जब भी यह घोषणा करेगी, तब उसके सामने कुछ सवाल चुनौती बनकर खड़े होंगे. ये सवाल रोज़गार के मुद्दे पर मोदी सरकार के प्रदर्शन से लेकर इस योजना में होने वाले ख़र्च और भत्ते की रक़म की पर्याप्तता से जुड़े हो सकते हैं.

रोज़गार सृजन से जुड़े सवालों से बचने के लिए यूबीआई?

आलोचकों का कहना है कि यूबीआई स्कीम लाना मोदी सरकार की कल्याणकारी नीति नहीं बल्कि राजनीतिक मजबूरी होगी. वे इसका कारण देते हुए कहते हैं कि सरकार अपने अभी तक के कार्यकाल में रोज़गार के मोर्चे पर कोई उल्लेखनीय काम नहीं कर पाई है. उनके मुताबिक़ बेरोज़गारी की वजह से लोगों में बढ़ते रोष के कारण ही हाल में पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन निराशाजनक रहा.

पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने सत्ता में आने पर हर साल एक से दो करोड़ नौकरियां देने का वादा किया था. वह बड़ी संख्या में रोज़गार देने का दावा भी करती है, और मुद्रा योजना और कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफ़ओ) के आंकड़े दिखाकर इसे सही साबित करने की कोशिश करती है.

लेकिन विशेषज्ञ उससे कभी भी सहमत नहीं दिखे हैं. वे उस पर आंकड़ों में हेरा-फेरी करने के आरोप लगाते हैं. इसके साथ ही सवाल भी उठाते हैं कि अगर सरकार ने लाखों रोजगार के अवसर पैदा किए हैं तो पिछले साल प्रधानमंत्री कार्यालय ने आनन-फ़ानन में सरकार के सभी मंत्रालयों को रोज़गार से जुड़े आंकड़े इकट्ठा करने को क्यों कहा था और ये आंकड़े अभी तक सार्वजनिक क्यों नहीं हुए. वहीं, आलोचक कहते हैं कि ख़ुद नरेंद्र मोदी अनुमानों के आधार पर दावा करते हैं कि उनकी सरकार ने लाखों लोगों को रोज़गार दिया है.

दूसरी तरफ कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टें भी भारत में बढ़ती बेरोज़गारी की तस्दीक करती हैं. लेबर ब्यूरो एंप्लॉयमेंट-अनएंप्लॉयमेंट सर्वे के मुताबिक 2013-14 में भारत में बेरोज़गारी दर 3.4 प्रतिशत थी जो 2015-16 में चार प्रतिशत हो गई. वहीं, सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईए) के मुताबिक़ नवंबर, 2018 में यह दर 8.5 प्रतिशत तक पहुंच गई थी.

रिपोर्टें बताती हैं कि सरकार की आर्थिक नीतियों ने नौकरी पैदा करने का काम कम और ख़त्म करने का काम ज़्यादा किया है. ऑल इंडिया मैन्युफैक्चरर्स ऑर्गनाइजेशन के सर्वे के मुताबिक़ 2014 के बाद लघु और मध्यम उद्योगों की नौकरियों में कमी आई है. वहीं, नोटबंदी और जीएसटी जैसे क़दम उठाकर सरकार ने इन उद्योगों की कमर तोड़ दी. सर्वे के मुताबिक़ इन उद्योगों में काम करने वाले लाखों लोगों ने अपनी नौकरियां गंवाई हैं.

माना जा रहा है कि इन्हीं वजहों के चलते मोदी सरकार यूबीआई स्कीम ला रही है. और इसके जरिए वह रोज़गार के मोर्चे पर अपने ख़राब प्रदर्शन को ढंकने और इस मुद्दे से जुड़े सवालों से बचने की कोशिश करेगी.

कितना ख़ाली होगा सरकारी ख़ज़ाना?

जानकार कहते हैं कि यूबीआई स्कीम की ज़रूरत तो है लेकिन यह काफ़ी महंगी है, इसलिए यह देखा जाना चाहिए इसे लागू करने से सरकार के ख़ज़ाने पर क्या असर पड़ेगा. इसे समझने के लिए एक आंकड़ा लेते हैं.

पिछले साल अंतरराष्ट्रीय मज़दूर संगठन (आईएलओ) के हवाले से आई एक ख़बर के मुताबिक इस साल भारत में बेरोज़गारों की संख्या बढ़ कर 1.89 करोड़ हो जाएगी. अगर इस संख्या को सही मानकर चलें तो इसे 2,500 से गुणा करने पर जो संख्या आती है वह है 4,725 करोड़. इसका मतलब है कि सरकार को बेरोज़गारी भत्ता देने के लिए सरकारी ख़ज़ाने से हर महीने 4,725 करोड़ रुपये ख़र्च करने पड़ेंगे. वहीं, साल के 12 महीनों के हिसाब से यह रक़म बढ़कर 56,700 करोड़ रुपये बनती है. यानी देश के बेरोज़गारों को घर बैठे पैसे देने के लिए सरकार करीब-करीब इतनी ही रकम आवंटित करेगी.

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि आम चुनाव के मद्देनज़र सरकार पहले से किसानों को लेकर गंभीर है और उन्हें बड़ी राहतें देने पर विचार कर रही है. हाल में विधानसभा चुनावों के बाद किसान असंतोष को लेकर उसकी चिंता और बढ़ी है. यही वजह है कि उसने किसानों को बड़ी राहत देने के कई संकेत दिए हैं. उदाहरण के लिए वह उन किसानों से कृषि क़र्ज़ पर ब्याज लेना बंद कर सकती है जो समय पर अपनी क़िस्त का भुगतान करते हैं. खाद्यान्न फ़सलों के बीमा पर प्रीमियम को भी पूरी तरह से माफ़ करने का प्रस्ताव है और बागवानी फ़सलों की बीमा का प्रीमियम भी कम किया जा सकता है. पीटीआई के मुताबिक अगर ऐसा होता है तो इससे सरकारी ख़ज़ाने पर 15 हजार करोड़ रुपये से ज़्यादा का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा.

इसके अलावा मोदी सरकार जिन क़दमों पर विचार कर रही है कि उनमें किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) के तहत मिलने वाले अनुषांगिक क़र्ज़ को एक लाख रुपये से बढ़ाकर दो लाख रुपये किए जाने का विकल्प शामिल है. सरकार भले ही क़र्ज़ माफ़ी को लेकर कांग्रेस पर हमलावर हो, लेकिन इकनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट बताती है कि नीति आयोग जिन योजनाओं को लेकर सभी मंत्रालयों से विचार-विमर्श कर रहा है, उनमें क़र्ज़ माफ़ी भी शामिल है.

सरकार ने सैनिकों की वेतन बढ़ोतरी की मांग ख़ारिज क्यों की?

मोदी सरकार किसानों और बेरोज़गारों को राहत देने के लिए योजनाएं लाने जा रही है, लेकिन देश की सेना के जवान ऐसी योजनाओं से महरूम हैं. आलोचक कहते हैं कि भाजपा के ‘राष्ट्रवादी’ एजेंडे में सेना का इस्तेमाल किए जाने से सभी परिचित हैं, लेकिन सैनिकों की मांगों पर यह सरकार टाल-मटोल वाला रवैया रखती है.

पिछले महीने ही केंद्र सरकार ने दुर्गम स्थानों पर तैनात सैन्यकर्मियों की वेतन बढ़ाए जाने से संबंधित मांग को ख़ारिज कर दिया था. मुश्किल हालात में काम कर रहे जवान, जूनियर कमांडिंग ऑफ़िसर (जेसीओ) और समान रैंक के नौसेना व वायुसेना के सैन्यकर्मी मिलिट्री सर्विस पे (एमएसपी) बढ़ाए जाने की मांग कर रहे थे. यह मांग काफ़ी समय से वित्त मंत्रालय में लंबित पड़ी थी जिसे आख़िरकार सरकार ने स्वीकार नहीं किया.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़ इन जवानों की संख्या केवल एक लाख के आसपास है, यानी करोड़ों किसानों और बेरोज़गारी की संख्या के मुक़ाबले ये सैनिक काफ़ी कम हैं. बेशक किसानों और बेरोज़गारों की समस्याओं को कमतर नहीं आंका जा सकता, लेकिन क्या सैनिकों की समस्याओं को नज़रअंदाज़ करना सही है. वह भी ऐसी सरकार द्वारा जो सेना को लेकर हमेशा अति-संवेदनशील होने का दावा करती हो!

बाक़ी योजनाओं का क्या?

कई विशेषज्ञ यूबीआई स्कीम को क़र्ज़ माफ़ी के चुनावी वादे से बेहतर विकल्प मानते हैं. सरकार और उसके आर्थिक विशेषज्ञ व सलाहकार भी क़र्ज माफ़ी को लेकर नकारात्मक रुख़ बनाए हुए हैं, क्योंकि इससे राजकोषीय लक्ष्य हासिल करने में मुश्किल हो सकती है जिसका सीधा असर अर्थव्यवस्था व निवेश पर पड़ सकता है.

लेकिन दिक़्क़त यूबीआई के साथ भी है. कई जानकार इसके समर्थन में हैं, लेकिन इस पर ख़र्च होने वाली रक़म को देखते हुए वे यह भी कहते हैं कि इसे लागू करने के लिए सरकार को मौजूदा योजनाओं में से कुछ को ख़त्म करना पड़ सकता है. यूपीए सरकार के समय की मनरेगा योजना के अलावा मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में कई नई योजनाएं शुरू की हैं जिनमें हज़ारों करोड़ रुपये ख़र्च हुए हैं और हो रहे हैं. सवाल है कि सरकार इनमें से किन योजनाओं को अचानक रोकने या ख़त्म करने का ख़तरा उठाएगी, और क्या उसके पास ऐसा करने के लिए समय है.

हालांकि उसके पास एक विकल्प है. वह चाहे तो यूबीआई को राष्ट्रीय स्तर पर लागू न करके कुछ ख़ास ज़िलों में पायलट प्रोजेक्ट के तहत शुरू करने की घोषणा कर सकती है. वह लोगों से कह सकती है कि प्रोजेक्ट कामयाब हुआ तो बाद में इसे पूरे देश में लागू किया जाएगा. यह कहने के लिए उसके पास आधार भी होगा, क्योंकि पूर्व में ऐसे प्रोजेक्ट काम रहे हैं.

भत्ते की रक़म कितनी उचित?

आख़िरी सवाल यूबीआई के तहत मिलने वाली रक़म से जुड़ा है. सरकार इस योजना के तहत हरेक बेरोज़गार को दो से ढाई हज़ार रुपये दे सकती है. क्या यह रक़म रोज़ाना की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए काफ़ी होगी.

यूरोप समेत दुनिया के कई विकसित देशों में यूबीआई स्कीम लागू है. लेकिन वहां के बेरोज़गारो को इसके तहत मिलने वाली ‘सैलरी’ कई गुना ज़्यादा है. जैसे फ़्रांस में सरकार अपने यहां के बेरोज़गारों को सालाना 7,000 यूरो देती है. भारतीय रुपये के हिसाब से यह रक़म साढ़े पांच लाख से ज़्यादा बैठती है. यानी फ़्रांस के बेरोज़गारों को हर महीने 45,000 रुपये के आसपास यूबीआई सैलरी मिलती है. जर्मनी में यह रक़म 390 यूरो है. यानी वहां के बेरोज़गार को हर महीने क़रीब 30 हज़ार रुपये मिलते हैं. इटली में तो बेरोज़गारों को प्रति माह 1,180 यूरो मिलते हैं जो क़रीब 90,000 रुपये हैं.

लेकिन यह पैसा बिना शर्तों के नहीं दिया जाता. जर्मनी में नियम है कि बेरोज़गारी भत्ता लेने वाले को तीन महीने के अंदर नौकरी ढूंढनी होगी. अगर वह तय मियाद के अंदर ऐसा नहीं कर पाता तो भत्ते की रक़म में कटौती हो जाती है. फिर भी शेष राशि बेरोज़गार के गुज़ारे के लिए काफ़ी होती है और वह नौकरी मिलने तक उससे काम चला सकता है. तो सवाल यही है कि क्या भारत के बेरोज़गार को एक महीना काटने के लिए 2,500 रुपये काफ़ी होंगे?