गुजरात में लंबे समय से कांग्रेस पार्टी सत्ता से बाहर है. जब तक नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहे तब तक कांग्रेस संगठन के तौर पर लगातार कमजोर होती गई. लेकिन इसके बाद स्थिति थोड़ी सुधरी. पिछले विधानसभा चुनावों में वह भले ही गुजरात में सरकार नहीं बना पाई हो लेकिन उसके प्रदर्शन में काफी सुधार देखने को मिला.

2017 के विधानसभा चुनावों के बारे में भारतीय जनता पार्टी के नेता भी मानते हैं कि काफी समय बाद कांग्रेस बहुत मजबूती से गुजरात में कोई चुनाव लड़ते हुए दिखी. गुजरात के भाजपा नेता यह भी मानते हैं कि अगर आखिरी दौर में चुनाव अभियान की कमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने हाथों में नहीं ली होती तो भाजपा यह चुनाव हार भी सकती थी.

ऐसे चुनाव के बाद गुजरात कांग्रेस में उत्साह पैदा हुआ और लगा कि 2019 के लोकसभा चुनावों में वह भाजपा को बहुत अच्छे से टक्कर देने की स्थिति में आ सकती है. प्रदेश में लोकसभा की 26 सीटें हैं और 2014 के लोकसभा चुनावों में इन सभी पर भाजपा ने जीत हासिल की थी. लेकिन विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस में यह माहौल पैदा हुआ कि अगर पार्टी ठीक से चुनाव लड़ी तो 2019 में कम से कम 10 से 12 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल कर सकती है. लेकिन उत्साह बढ़ाने वाले चुनावी नतीजे के साल भर के अंदर ही गुजरात कांग्रेस की स्थिति एक बार फिर से बिगड़ने के संकेत मिलने लगे हैं. इसकी वजह पार्टी में चल रही जबर्दस्त खींचतान है.

इस वक्त गुजरात में कांग्रेस की कमान जिन नेताओं के हाथों में है, उनके प्रति पार्टी के एक बड़े वर्ग में नाराजगी का माहौल फैला हुआ है. गुजरात विधानसभा चुनावों के कुछ महीने बाद ही कांग्रेस आलाकमान ने भरत सिंह सोलंकी की जगह अमित चावड़ा को प्रदेश का अध्यक्ष बनाया था. उस वक्त यह कहा गया था कि चावड़ा युवा हैं, इसलिए उन्हें यह मौका दिया जा रहा है. लेकिन वे भरत सिंह सोलंकी के ही रिश्तेदार हैं. ऐसे में असंतुष्ट नेताओं का कहना है कि अब भी प्रदेश में पार्टी से जुड़े सारे फैसले भरत सिंह सोलंकी ही ले रहे हैं. इससे पार्टी पदाधिकारियों, विधायकों और कार्यकर्ताओं की नाराजगी बढ़ने की बात सामने आ रही है.

ऐसी ही स्थिति विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के नेता परेश धनानी को लेकर भी बताई जा रही है. उनके बारे में कहा जा रहा है कि वे पार्टी में सबको साथ लेकर नहीं चल रहे हैं और पार्टी के एक खास गुट को बढ़ावा दे रहे हैं. गुजरात कांग्रेस के एक नेता बताते हैं कि भरत सिंह सोलंकी, अमित चावड़ा और परेश धनानी इस तरह से काम कर रहे हैं कि पार्टी में असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है.

गुजरात कांग्रेस के अंदर इस स्थिति पर चर्चा करने के लिए एक अहम बैठक हुई थी. बताया जा रहा है कि इसमें गुजरात कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अर्जुन मोडवाडिया और सिद्धार्थ पटेल, पूर्व केंद्रीय मंत्री दिनशा पटेल और तुषार चौधरी, कांग्रेस विधायक दल के नेता रहे नरेश रावल, पूर्व सांसद राजू परमार और सागर रायका और मौजूदा विधायक अल्पेश ठाकोर और हिम्मत सिंह पटेल समेत कई कांग्रेसी नेताओं ने हिस्सा लिया था. बैठक में अमित चावड़ा की अगुवाई वाली कांग्रेस की प्रदेश स्तर की टीम के कुछ सदस्य भी थे.

इस बैठक में यह निर्णय लिया गया कि गुजरात कांग्रेस में नेतृत्व के स्तर पर जो दिक्कतें आ रही हैं, उससे अवगत कराने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मिलने का समय मांगा जाएगा. इसमें यह भी तय किया गया कि राहुल गांधी से होने वाली मुलाकात में उन्हें बताया जाए कि भरत सिंह सोलंकी, अमित चावड़ा और परेश धनानी की कार्यशैली की वजह से पार्टी को अगले लोकसभा चुनावों में किस तरह के नुकसान का सामना करना पड़ सकता है. इन नेताओं ने यह उम्मीद जताई कि अगर राहुल गांधी को सारी स्थिति ठीक से बताई जाए तो वे इसमें हस्तक्षेप करेंगे और संगठन के स्तर पर जो दिक्कतें हैं, उन्हें दूर करने की दिशा में जरूरी कदम उठाएंगे.

कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व गुजरात कांग्रेस की इस खींचतान को कैसे सुलझाता है, यह समय आने पर पता चलेगा. लेकिन इतना तय है कि अगले लोकसभा चुनावों में गुजरात से ठीक-ठाक सीटें पाने की आस लगाए बैठी कांग्रेस को ऐसा करने से पहले अपने घर में लगी आग को बुझाने के उपाय करने होंगे. अगर ऐसा नहीं हो पाया तो खेमों में बंटी कांग्रेस भाजपा के उस चुनाव अभियान का मुकाबला करने में सक्षम नहीं हो पाएगी जिसमें गुजरात के नरेंद्र मोदी के लिए दूसरे कार्यकाल के नाम पर भाजपा बेहद आक्रामक ढंग से वोट मांगेगी.