अभी बीते महीने ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शाहजहांपुर जिले के गांव नवादा दरोबस्त में थे. वह गांव जिसे इतिहास ने अपने कुछ पन्नों में याद रखा लेकिन राजनीति ने क़रीब-क़रीब भुला ही दिया. और योगी आदित्यनाथ इसे जब याद किया तब ही क्यों किया, ये किसी को ज़्यादा समझ नहीं आया. क्योंकि जिस दिन वे वहां पहुंचे उस दिन की कोई ऐतिहासिक प्रासंगकिता इस गांव से जुड़ती नहीं है. इसीलिए योगी के इस कार्यक्रम के संयोग पर ‘जितने मुंह उतने मतलब’. लिहाज़ा इस पूरे मामले से जुड़ते पहलुओं का ज़िक्र तो बनता है.

नवादा दरोबस्त : काकोरी के क्रांतिकारी शहीद रोशन सिंह का गांव

इतिहास की नज़र से देखें को नवादा दरोबस्त कोई आम गांव नहीं है. इस गांव ने देश की आज़ादी के संघर्ष में एक ऐसा सपूत दिया जिसे पीढ़ियां बीत जाने के बाद भी देश आज तक याद करता है. यह काकोरी कांड के अमर क्रांतिकारी शहीद रोशन सिंह का गांव है. शहीद रोशन सिंह पर आज तक की एकमात्र पुस्तक लिखने वाले सुधीर विद्यार्थी ‘सत्याग्रह’ से ख़ास बातचीत में बताते हैं, ‘उनके सार्वजनिक-राजनैतिक जीवन की शुरूआत असहयोग आंदोलन से हुई. उस दौरान रोशन सिंह पकड़े गए. उन्हें दो साल की सजा हुई. मगर इसी बीच चौरीचौरा कांड के बाद असहयोग आंदोलन निराशजनक ढंग से समाप्त हो गया. तब रोशन सिंह जेल से छूटने के बाद क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल के संपर्क में आए. बिस्मिल से प्रभावित होकर रोशन सिंह उनके ‘हिंदुस्तान प्रजातांत्रिक संघ’ (एचआरए) में शामिल हो गए.’

विद्यार्थी के मुताबिक, ‘असहयोग आंदोलन से पहले रोशन सिंह डकैतियों में शामिल रहते थे. लेकिन क्रांति और आंदोलन ने उन्हें वीरता दिखाने का सही रास्ता बता दिया. हालांकि जब वे बिस्मिल के दल में आए तब तक अधेड़ हो चुके थे. लेकिन जज़्बा जवान था. इसी बीच बिस्मिल और उनके साथियों ने अंग्रेजों का ख़ज़ाना लूटने के लिए काकोरी में ट्रेन लूट की योजना बनाई. रोशन सिंह इस लूट का हिस्सा नहीं थे. उन्होंने काकोरी कांड के मुख्य क़िरदारों का थोड़ा-बहुत सहयोग ही किया था. लेकिन उनका पिछला रिकॉर्ड पुलिस को पता था. इसलिए उन्हें भी ग़िरफ़्तार कर लिया गया. पुलिस को उम्मीद थी कि वे जान बचाने के लिए सरकारी गवाह बन जाएंगे. लेकिन रोशन सिंह से पुलिस की ये उम्मीद पूरी नहीं हुई. उन्हें फ़ांसी होनी नहीं थी. लेकिन वे ख़ुद ऐसा चाहते थे और शायद पुलिस से असहयोग के रवैये ने उनकी यह इच्छा पूरी भी की.’

हालांकि कुछ जानकारियां यह भी बताती हैं कि रोशन सिंह को बमरौली (पीलीभीत जिला) गांव के मोहन लाल नामक पहलवान की हत्या के आरोप में मौत की सज़ा (इस तरह के कई केस काकोरी कांड की अदालती सुनवाई से जोड़ दिए गए थे) सुनाई गई थी. बताते हैं कि यह हत्या उन्होंने एचआरए के लिए पैसे जुटाने के सिलसिले में अमीरों पर लूटपाट की एक कार्रवाई के दौरान की थी. वह 25 दिसंबर 1924 की तारीख़ थी. वह घटना इतिहास में बमरौली कार्रवाई के नाम से दर्ज़ है. इसके अलावा दो और तारीख़ें. पहली- 22 जनवरी 1892, जब रोशन सिंह का जन्म हुआ. दूसरी- 19 दिसंबर 1927, जिस रोज उन्हें इलाहाबाद जेल में फ़ांसी दी गई. ये तारीख़ें ख़ास तौर पर इसलिए याद रखी जा सकती हैं कि जब योगी आदित्यनाथ नवादा पहुंचे तो तारीख़ थी 30 दिसंबर, जो रोशन सिंह से सीधी जुड़ती नहीं.

यहां जब योगी आए तो उनका कार्यक्रम पूरी तरह सियासी रंग में रंगा था

यानी योगी आदित्यनाथ को जब इस गांव की याद आई तब उसे याद करने की कोई पुख़्ता वज़ह कम से कम इतिहास या स्मृति के दृष्टिकोण से तो नहीं थी. हालांकि कहा यह भी जा रहा है कि योगी आदित्यनाथ पहले 19 दिसंबर को नवादा दरोबस्त आने वाले थे. लेकिन उन्हें उस तारीख़ पर अपनी मशरूफ़ियत से फ़ुर्सत नहीं मिली. अलबत्ता जैसे ही पहली फ़ुर्सत मिली, चले आए. सूबे के मुखिया आए थे, सो ज़ाहिर तौर पर जलसा भी बड़ा हुआ. और योगी सियातदां भी हैं इसलिए सियासत भी उनके इस जलसे को छू-छू कर निकलती दिखी.

मसलन- आयोजन के दौरान योगी कुछ बोलते उससे पहले ही एक छोटी सी पुस्तिका का विमोचन हुआ. इसमें बताया गया कि योगी की सरकार ने पूरे जनपद में कितना काम किया है. फिर जब वे बोले तो लगा जैसे कुछ कुरेद रहे हों. उन्हाेंने कहा, ‘आज़ादी के बाद जो शहीदों के लिए होना चाहिए था वह नहीं हो पाया. लेकिन अब हम कोशिश कर रहे हैं. हम गोरखपुर जेल में पंडित राम प्रसाद बिस्मिल (जहां उन्हें फ़ांसी हुई थी) का स्मारक भी बनवा रहे हैं.’ फिर ऐलान और बख़ान का नंबर आया. योगी ने नवादा दरोबस्त में एक डिग्री कॉलेज, नज़दीकी नहर पर पुल बनवाने आदि सहित क़रीब 249 करोड़ रुपए की याेजनाओं की शुरूआत की. साथ ही केंद्र-राज्य सरकारों की उपलब्धियां गिनाईं.

लेकिन बात इतनी ही होती तो भी ठीक था. याेगी आदित्यनाथ के एक क़रीबी नेता हैं स्वामी चिन्मयानंद. केंद्रीय गृह राज्य मंत्री रह चुके हैं. मूल रूप से गोंडा के राजपरिवार से ताल्लुक़ रखते हैं. संन्यास लेने के बाद इन्होंने शाहजहांपुर में अपना आश्रम बनाया है. लिहाज़ा जब पता चला कि योगी आ रहे हैं तो नवादा में होने वाले कार्यक्रम की तैयारियां ख़ुद अपनी देख-रेख में कराईं. साथ में इन्होंने भी ऐलान कर दिया कि जल्द ही इस गांव में शहीद रोशन सिंह का एक मंदिर बनवाया जाएगा. फिर स्थानीय प्रशासन भी कहां पीछे रहने वाला था. योगी के भगवा प्रेम से अब तो सब परिचित हो चुके हैं. लिहाज़ा योगी के आने से पहले ही शहीद रोशन सिंह की प्रतिमा को भी भगवा पहना दिया गया.

लेकिन अब तक गांव तो क्या, शहीद के परिवार को भी कोई पूछने वाला नहीं था

इतने सब के बावज़ूद भी मंशा पर ज़्यादा सवाल न उठते अगर इससे पहले के हालात पूरी तरह उलट नहीं हाेते. मसलन- अभी पिछले साल ही एक ख़बर आई. इसमें बताया गया कि नवादा दरोबस्त को शाहजहांपुर से भाजपा सांसद कृष्णा राज ने गोद ले रखा है. तीन साल से, ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’ के तहत. लेकिन जून-2018 तक उनके इस ‘आदर्श गांव’ में न तो ढंग की सड़क थी, न स्वास्थ्य सेवा. उच्चतर माध्यमिक स्कूल भी कुछ अहम शिक्षकों के बग़ैर चल रहा था. ख़बर में यह भी बताया गया कि हर 22 जनवरी को शहीद रोशन सिंह की जयंती पर गांव में पिछले 16 सालों से किसान मेले का आयोजन हो रहा है. इसके लिए हर साल करीब 12 लाख रुपए सरकार से जिला प्रशासन को मिलते हैं, लेकिन इन 12 लाख में से सिर्फ़ एक-डेढ़ लाख रुपए ही खर्च किए जाते हैं. बाकी पैसों का कोई हिसाब नहीं दिया जाता, ऐसा गांव वालों ने ख़ुद बताया है. अब यहां यह भी याद रखिए कि कृष्णा राज केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में किसान कल्याण और कृषि राज्य मंत्री हैं.

इतना ही नहीं. शहीद रोशन सिंह के परिजन तक चौतरफ़ा उपेक्षा के शिकार रहे हैं, ऐसी भी ख़बरें आईं. कुछ ख़बरों में यह भी बताया गया कि रोशन सिंह की प्रपौत्री इंदू मनरेगा के तहत मिली मज़दूरी से अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण कर रही हैं. और ये भी कि उनके पास सिर छिपाने के लिए छत तक नहीं है. झोपड़ी में रहती हैं.

शायद इसीलिए जात-बिरादरी की ‘चुनावी सियासत’ का सवाल भी जुड़ रहा है?

यही वज़ह है कि नवादा दरोबस्त में योगी आदित्यनाथ के ‘बिनमौसम कार्यक्रम’ (ऐतिहासिक प्रासंगिकता के लिहाज़ से) की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं. हालांकि देखा जाए तो यह कार्यक्रम पूरी तरह ‘बिनमौसम’ भी नहीं था. क्याेंकि चुनावी मौसम की आहट मिलने लगी है. मार्च-अप्रैल में लोक सभा चुनाव होने हैं. इसमें भाजपा एक बार फिर उत्तर प्रदेश में 2014 का प्रदर्शन (कुल 80 में से 72 सीटों पर जीत) दोहराने का मंसूबा बांध रही है. और फिर जब राज्य में भी भाजपा की ही सरकार है तो यह उसके लिए थोड़ा ज़्यादा मायने रखता है. इसीलिए जैसा कि जानकार कहते हैं, राज्य की योगी सरकार को कभी राेशन सिंह जैसे शहीद याद आते हैं तो कभी उनकी बिरादरी.

शहीद रोशन सिंह का ही संदर्भ ले लें. ‘सत्याग्रह’ से बातचीत में सुधीर विद्यार्थी बताते हैं, ‘जेल जाने के बाद उनके जीने का ढंग ही बदल गया था. वे अपना पूरा पठन-पाठन में बिताते. आर्यसमाजी थे इसलिए शुरू में जेल के भीतर हवन आदि बहुत किया करते थे. लेकिन बाद में नौजवान क्रांतिकारियों के प्रभाव में आकर धर्म के प्रदर्शनवादी तरीके से हट गए. हवालात में नई-पुरानी पीढ़ी के क्रांतिकारियों के बीच अनीश्वरवाद और ईश्वरवाद के पक्ष-विपक्ष में होने वाली बहसों-तर्कों में शामिल होने लगे. ऐसे विषयों पर मनन करने लगे थे. वे देश बांटने वाली राजनीति के सख़्त ख़िलाफ़ थे. उन्होंने और उनके साथियों ने जेल के भीतर एक परात में ख़ाना खाकर जाति-धर्म, क्षेत्र-भाषा की सीमाएं भी तोड़ दी थीं.’

ऐसे शहीद रोशन सिंह को योगी आदित्यनाथ के जलसे में लगातार ‘ठाकुर’ बताकर एक बिरादारी ख़ास से बांधने की कोशिश की गई. वज़ह बड़ी सीधी सी. एक अनुमान के अनुसार शाहजहांपुर की छह विधानसभा सीटों पर ठाकुर समुदाय के मतदाताओं की संख्या क़रीब पौने दो लाख बताई जाती है. और सिर्फ़ इन छह पर ही क्यों, पूरे प्रदेश में ठाकुर मतदाताओं की औसत उपस्थिति पांच-छह फ़ीसदी तक है. पूर्वांचल के जिलों में तो ठाकुर-भूमिहार मतदाताओं की हिस्सेदारी 10 फ़ीसदी तक मानी जाती है. तिस पर योगी आदित्यनाथ और उनके मित्र स्वामी चिन्मायनंद ख़ुद भी इसी ठाकुर बिरादरी से ताल्लुक़ रखते हैं. इसीलिए यह भी स्वाभाविक ही है कि मौज़ूदा दौर की सियासत ‘शहीद की ठाकुर पहचान को ज़्यादा रोशन’ कर रही है. उसे चमकाने में जुटी है. उसका रंग बदलने में लगी है.

हालांकि भाजपा के जिलाध्यक्ष राकेश मिश्रा ‘सत्याग्रह’ से बातचीत में कहते हैं, ‘जातीय गोलबंदी भाजपा का मकसद नहीं. हमारी चुनावी रणनीति विकास है और वे काम जो केंद्र-राज्य की भाजपा सरकारों ने किए हैं. रही बात शहीद के गांव की तो हमारी सरकार उसका सर्वांगीण विकास करना करना चाहती है क्योंकि हमारे मन में देश के शहीदों के प्रति श्रद्धा है. इसमें राजनीति नहीं देखनी चाहिए.’

मिश्रा की बात पूरी तरह ग़लत भी नहीं है. श्रद्धा में राजनीति देखी भी नहीं जानी चाहिए, बशर्ते, वह सच्ची हो.