आबादी के लिहाज से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा और सभ्यता-संस्कृति की दृष्टि से सबसे पुराना देश भारत अंग्रेज़ों के चले जाने के बाद भी उनकी दी हुई अंग्रेजी की बड़े गर्व से गुलामी बजा रहा है. उसने सरकारी कामकाज की भाषा बना कर उसे सर्वोच्च सिंहासन पर बिठा रखा है. यहां तक कि भारत का संविधान भी मूल रूप से अंग्रेजी में ही लिखा गया है. विवाद की स्थिति में अंग्रेज़़ी शब्दावली को ही वैध माना जायेगा, हिंदी अनुवाद को नहीं.

संविधान में कहा गया था कि 1965 में अंग्रेज़ी का स्थान हिंदी ले लेगी. तमिलनाडु के कट्टर हिंदी-विरोधियों की कृपा से सरकारी कामकाज आज तक न केवल मूलतः अंग्रेज़़ी में ही हो रहा है. स्वयं हिंदीभाषियों के बीच भी - या तो हीनताग्रंथि के कारण या फिर शेखी बघारने के जोश में - अपना निजी कामकाज भी यथासंभव अंग्रेज़़ी में ही करने की प्रवृत्ति हावी हो गयी है. लोगों के लेटरपैड, विज़िटिंग (परिचय) कार्ड, शादी-ब्याह के निमंत्रणपत्र, दुकानों-कार्यालयों के नामपट्ट और सामान बेचने-ख़रीदने की रसीदें तक, बिना किसी अनिवार्यता के, अंग्रेज़ी में ही लिखने का रिवाज़ बनता गया है.

टुटपुंजिए माता-पिता भी अपने बच्चों को बड़े शौक से अंग्रेज़़ी माध्यम के स्कूलों में भेज रहे हैं. हिंदी लिखने-पढ़ने-बोलने में जिन्हें जितनी शर्म आती है, वे उतने ही ऊंचे स्वर में हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने का नारा लगाते हैं. ख़ुद तो हिंदी को हेठी समझते हैं और चाहते हैं कि सारी दुनिया हिंदी सीखे!

जो देश आज़ादी के सात दशक बाद भी अंग्रेज़ी के मोहजाल में इस तरह फंसा हो कि उसकी अपनी ही सबसे बड़ी भाषा का कथित स्वतंत्र मीडिया भी, वाक्यरचना के समय सहज-स्वाभाविक देशज शब्दों को हटा कर अंग्रेज़ी के शब्द ठूंसने लगे, तो फ़िर विदेशी, बैसाखियों के सहारे चलने वाली एक ऐसी आधी-अधूरी लंगड़ी भाषा सीखने में समय व संसाधन बर्बाद क्यों करें? वे अंग्रेज़ी के अपने अधूरे या पूरे ज्ञान से ही काम चलाने की क्यों न सोचें? कम से कम यूरोपीय तो यही सोचते हैं और प्रायः पूछते भी हैं कि भारतीयों में अपनी भाषा से लगाव और आत्मसम्मान की इतनी कमी क्यों होती है? उन्हें आश्चर्य होता है कि हज़ारों वर्षों की अपनी सभ्यता का दावा करने वाला भारत इन हज़ारों वर्षों में अपनी कोई सर्वमान्य भाषा क्यों नहीं बना पाया? मुझ से जर्मनी में कई बार यही पूछा जाता है.

अंग्रेज़ी के प्रति दास-मानसिकता

अंग्रेज़ी के प्रति भारतीयों की दास-मानसिकता और हिंदी को लेकर हीन-भावना के दो उदाहरण इस संदर्भ में अनुचित न होंगे. बात 1990 वाले दशक के अंत की है. जर्मन विश्वविद्यालयों में हिंदी के छात्र व्यावहारिक अनुभव पाने के लिए ‘रेडियो डॉएचे वेले’ के हिंदी कार्यक्रम में आया करते थे. मैं उस समय हिंदी विभाग का प्रमुख था. हिंदी की एक ऐसी ही छात्रा ने एक दिन मुझे बताया कि दो भारतीयों ने एक बार उसे इसलिए बुरी तरह से डांट दिया कि उसने उन से हिंदी में बात करने की हिम्मत करली!

उसने बताया कि वह एक बार कोलोन के एक व्यापार मेले में होस्टेस और दुभाषिये का काम कर रही थी. हिंदी जानने के कारण उसे एक भारतीय स्टॉल पर भेजा गया. स्टॉल के मालिक दो भारतीय सज्जन थे. उसने हिंदी में जैसे ही अपना परिचय देना शुरू किया, दोनों एकदम बरस पड़े! वह समझती क्या है कि उन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती? वे अनपढ़ हैं कि उनसे हिंदी बोल रही है? उसे माफ़ी मांगनी पड़ी और कहना पड़ा कि वह उनसे अंग्रेज़ी में ही बात करेगी, हिंदी का नाम तक नहीं लेगी. उस छात्रा ने बताया कि देखने-सुनने में दोनों दक्षिण नहीं, उत्तर भारत के ही लगते थे, यानी हिंदी उन्हें ज़रूर आती थी!

‘अंग्रेजी पढ़े-लिखों की, हिंदी गंवारों की भाषा’

भारत में लंबे समय तक बीबीसी के संवाददाता रहे मार्क टली का जन्म भारत में ही हुआ था. वे भारत के नागरिक बन कर वहीं बस भी गये हैं. हिंदी बहुत अच्छी बोलते हैं. उनका अनुभव भी यही है कि भारत में अंग्रेजी को पढ़े-लिखे लोगों की और हिंदी को अनपढ़ गंवारों की भाषा समझा जाता है. एक इंटरव्यू में उनका कहना था, ‘मैं तो लोगों से बात हिंदी में शुरू करता हूं, पर लोग बार-बार अंग्रेज़ी में ही जवाब देते हैं.’’ इससे तंग आकर उन्होंने अब कहना शुरू कर दिया है कि भारतीयों को ‘हिंदी भूल कर अंग्रेज़ी ही बोलनी चाहिये!’ उनका कहना है कि भारतीयों की मानसिकता के लिए यही सही है कि वे अंग्रेज़ी ही पढ़ें-लिखें और बोलें.

यूरोप में ऐसी मानसिकता को दास-मानसिकता कहा जाता है. इस मानसिकता के पीछे भारत की दासता का लंबा इतिहास तो है ही, उसके बने रहने में स्वतंत्रता के बाद सबसे लंबे समय तक राज कर चुकी अंग्रेज़़ी नामधारी ‘कांग्रेस’ पार्टी की भाषा और शिक्षा नीति का भी कुछ कम योगदान नहीं है. किंतु सबसे बड़ा विरोधाभास तो यह है कि अपनी स्वतंत्रता और निर्भीकता का ढिंढोरा पीटने वाला हिंदी मीडिया भी,1990 वाले दशक से, अपनी भाषा में अनायास ही अंग्रेज़ी शब्दों को ठूंस कर हिंदी को हीन दिखाने की दास-मानसिकता का ही परिचय दे रहा है. हिंदी मीडिया ही हिंदी के साथ ‘ग़रीब की जोरू, गांव की भाभी’ जैसा बलात्कारी व्यवहार करने लगता है.

विदेशियों को इससे यही संदेश मिलता है कि भारतीय, अंग्रेज़ी की ग़ुलामी के बिना जी नहीं सकते. उनका यह सोचना भी स्वाभाविक ही है कि जब भारतीय स्वयं ही अपनी भाषा का सम्मान नहीं करते, उसे ठीक से सीखना या बोलना नहीं जानते या नहीं चाहते, तो वे उसे सीखने का कष्ट भला क्यों करें? यूरोप का कोई भी देश कितना भी छोटा हो - चाहे केवल तीन लाख जनसंख्या वाला आइसलैंड हो या छह लाख जनसंख्या वाला लक्सेमबुर्ग - हर देश अपनी ही भाषा में अपने सारे काम करता है और अपनी भाषा की शुद्धता बनाये रखने पर भी पूरा ध्यान देता है. यूरोप के सभी देशों में लोग अंग्रेजी सीखते हैं, पर एक विदेशी भाषा के तौर पर. मात्र तीन देश अंग्रेज़ी में अपना काम करते हैंः ब्रिटेन, आयरलैंड और माल्टा. तीनों की मिली-जुली जनसंख्या केवल 10 करोड़ 80 लाख है.

हिंदी की पूछताछ प्रवासी भारतीयों के बीच ही

भारत से बाहर हिंदी की पूछताछ अऩ्यथा अधिकतर उन्हीं देशों में है, जहां प्रवासी या अनिवासी भारतीयों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक है. उदाहरण के लिए, लघु-भारत कहलाने वाले मॉरीशस के 13 लाख निवासियों में से 68 प्रतिशत भारतवंशी हैं. वहां के महात्मा गांधी संस्थान ने हिंदी की उच्च शिक्षा के लिए 1998 से डिप्लोमा कोर्स, 1990 से बीए ऑनर्स हिंदी, और 2001 से एमए हिंदी की व्यवस्था कर रखी है. तब भी हिंदी को मॉरीशस में आधिकारिक भाषा का दर्जा नहीं मिला है. हिंदी को यह दर्जा भारत के बाहर केवल फ़िजी में मिला हुआ है.

भारत के पड़ोसी देशों में नेपाल के त्रिभुवन विश्वविद्यालय में और श्रीलंका के कोलंबो विश्वविद्यालय में हिंदी का अलग विभाग है. जापान में भी कम से कम आधे दर्जन विश्वविद्यालयों और संस्थानों में हिंदी के पाठ्यक्रम चलते हैं, जिनमें से कई में उच्च शिक्षा की व्यवस्था है.

अमेरिका के 75 विश्वविद्यालयों में हिंदी

अमेरिका के 25 लाख भारतीय वहां रहने वाले मैक्सिको से आये आप्रवासियों के बाद दूसरा सबसे बड़ा प्रवासी समूह हैं. वहां के सभी भारतवंशी हिंदी भाषी नहीं हैं, तब भी वहां हिंदी की अच्छी मांग है. इसी कारण अमेरिका के 75 विश्वविद्यालयों में हिंदी-शिक्षण की व्यवस्था है. भारतीयों की ही तीन प्रमुख संस्थाएं - अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति, विश्व हिंदी समिति और हिंदी न्याय - अमेरिका में हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार का काम करती हैं. कम से कम चार प्रमुख हिंदी पत्रिकाएं भी प्रकाशित होती हैं - विश्व, सौरभ, क्षितिज और हिंदी जगत.

आस्ट्रेलिया में न्यू साउथ वेल्स से मासिक ‘हिंदी समाचार पत्रिका’, ब्रिटेन से त्रैमासिक ‘प्रवासिनी’ और ‘पुरवाई’, म्यांमार (बर्मा) से मासिक ‘ब्रह्मभूमि’, गुयाना से मासिक ‘ज्ञानदान’, सूरीनाम से ‘आर्यदिवाकर’ और मासिक पत्रिका ‘सरस्वती’ आदि का प्रकाशन इन देशों में रहने वाले भारतवंशियों के हिंदी के प्रति लगाव को दिखाता है, न कि यह कि वहां के मूल निवासी भी हिंदी भाषा से परिचित हैं, जैसा कि भारत में आभास दिया जाता है.

हिंदी का कथित सरलीकरण

ग़नीमत है कि 2014 में बीजेपी की सरकार बनने के बाद से भारत में हिंदी की भाषायिक स्वाभाविकता और स्वीकृति में सुधार हो रहा है. अंग्रेज़ी शब्दों की भरमार कुछ कम हुई है. अंग्रेज़ी के बहुप्रचलित सरल शब्दों को अपनाने में कोई दोष नहीं है. दोष है सरलीकरण की आड़ ले कर हिंदी में अंग्रेज़ी, अरबी या फ़ारसी शब्द ठूंसने में. यदि 10, 20 या 30 प्रतिशत अंग्रेज़ी शब्दों से हिंदी सरल बनती है, तो क्यों न इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए 100 प्रतिशत अंग्रेज़ी शब्दों को अपना कर हिंदी का शत-प्रतिशत सरलीकरण कर दिया जाये! क्यों न अंग्रेज़ी को ही शत-प्रतिशत सरलीकृत हिंदी घोषित कर दिया जाये! सरलीकरण के नाम पर हिंदी की यह बलात्कारी विकृति स्वीकार्य नहीं हो सकती.

इसी तरह यह कहना कि अंग्रेज़ी के बिना भारत विज्ञान और तकनीक में तेज़ी से प्रगति नहीं कर सकता, ‘नाच न आए आंगन टेढ़ा’ जैसा बेतुका तर्क है. चीन, जापान, ताइवान और दक्षिण कोरिया ने, हमारे देखते ही देखते, पिछले केवल 30, 40 या 50 वर्षों में उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक, कंप्यूटर हार्डवेयर, ऑटोमोबाइल, आनुवंशिकी और चिकित्सा विज्ञान तथा तेज़गति बुलेट ट्रेनों के मामले में यूरोप-अमेरिका को जिस तरह पीछे छोड़ दिया है, उससे पहले क्या उन्होंने सारे देश को अंग्रेज़ी सिखाई-पढ़ाई? वे अपना सारा सरकारी-ग़ैर सरकारी कामकाज हम भारतीयों की तरह क्या अंग्रेज़ी में करते हैं?

अंग्रेज़़ी ही सब कुछ नहीं

इन सब देशों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद प्रगति की दौड़ लगाई है. वहां के लोग हम भारतीयों से बेहतर अंग्रेज़़ी नहीं जानते. हम भी तो लॉर्ड मैकाले की कृपा से 1835 से, यानी क़रीब दो सदियों से, अंग्रेज़़ी लिख-पढ़ और बोल रहे हैं. अपने आप को बड़ा तीसमार खां समझते हैं, जबकि भारत के किसी भी अंग्रेज़ी-भाषी लेखक को कभी कोई नोबेल पुरस्कार तक नहीं मिला. यदि अंग्रेज़़ी का ज्ञान ही विज्ञान-तकनीक वाले ताले की कुंजी है, तो 200 साल पहले मैकाले से मिली अंग्रेज़़ी वाली कुंजी से हम जापान, ताइवान, कोरिया या चीन से पहले अपनी प्रगति का ताला क्यों नहीं खोल पाये? अंग्रेज़ी में पैदल अपने ही पास के इन एशियाई देशों से, जहां अंग्रेज़ी भाषा से अधिक भारत से ही गये बौद्ध धर्म का प्रभाव है, हम पिछड़ कैसे गये?

सच्चाई यह है कि स्वयं अंग्रेज़़ी मातृभाषा और रोमन लिपि वाले ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भी आज चीन-जापान-कोरिया-ताइवान जैसे उन एशियाई देशों से पिछड़ते जा रहे हैं, जिनकी अंग्रेज़़ी न तो मातृभाषा है और न जिनकी चित्रलिपी रोमन या लैटिन जैसी कोई सरल लिपि है. यदि अंग्रेज़़ी का ज्ञान ही सर्वशक्तिमान होता, तो अंग्रेज़ी मातृभाषी इंग्लैंड-अमेरिका जैसे देशों को हर क्षेत्र में सदा-सर्वदा आगे-ही-आगे रहना चाहिये. पर वे पिछड़ रहे हैं. दूरपूर्व के एशियाई देश इसलिए उनसे आगे बढ़ने लगे हैं, क्योंकि वे अपनी प्रतिभा की अभिव्यक्ति के लिए अपनी मातृभाषा या राष्ट्रभाषा के इस्तेमाल पर अडिग रहे. सबसे पहले अपनी भाषा को ढंग से सीखा-पढ़ा. अंग्रेज़ी को केवल एक विदेशी या अंतरराष्ट्रीय भाषा के तौर पर देखा और जाना.

भाषा न तो किसी जनता की स्वाभाविक प्रतिभा या बौद्धिकता के विकास में बाधक होती है और न ही उन के अभाव को दूर कर सकती है. हम यदि दूसरों से पिछड़े, तो इसमें हमारी ही कोई कमी है, न कि हमारी हिंदी या अन्य स्वदेशी भाषाओं की. कमी यही है कि हम ‘घर के जोगी को जोगड़ा और आन गांव वाले को सिद्ध’ मानने की हीन भावना से पीड़ित हैं. हिंदी अपने घर की भाषा है, अंग्रेज़़ी आन गांव की. हमने मान लिया है कि सिद्धि तो आन गांव की अंग्रेज़ी से ही मिलेगी, अपने गांव की हिंदी से नहीं. हम खुद तो बड़े ताव से अंग्रेज़ी लिखते-पढ़ते हैं, पर चाहते हैं कि बाक़ी दुनिया हिंदी सीखे! राष्ट्रीय स्तर पर तो हिंदी को अपना नहीं पाते, हर साल बड़े धूम-धाम से विश्व हिंदी दिवस मनाते हैं.